परिवारवाद

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राजनीति के मंच पर,
कुछ भी संभव हो सकता है,
सबसे बड़ा परिवार,
तिनकों सा बिखर सकता है।
यहाँ किसका कौन दोस्त है ,
कौन है रिश्तेदार,
बाप बेटे की तकरार है,
कोन संभाले पतवार।
चाचा भतीजे लड़पड़े,
ज़बान की तकरार थी,
अब हाथ पैर तक चल पड़े।
राजनीति में परिवारवाद का दंश,
यदि ऐसे ही मिटना है तो,
अगली बार राम करे ,
लालू पुत्र भी लड़ पड़े,
राजनीति से विदा ले,
एक और परिवार।
विदा कहाँ होते हैं पर,
सत्ता के ठेकेदार,
नये रूप नये वेश मे,
वही आते है हर बार।

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बीनू भटनागर
मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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