लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

हर उम्र वैसे अजीब होती है

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ये सत्तर की उम्र भी अजीब होती है, बुढ़ापे की दहलीज़ होती है, इसके आगे जितनी मिल जाये, सूद पर व्याज होती है।     सत्तर की उम्र में भी रोमांस होता है, अंदाज़ ज़रा सा अलग होता है तुमने दवाई खाई अब आराम करलो, ऐसी बातें होती है।     किसको कितनी दवाइयां निगलनी… Read more »

चोर चोर मौसेरे भाई

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चोर चोर मौसेरे भाई मिले चुनावी वक़्त मोलभाव सीटों का करें इधर उधर भटकें। लोग जो आज इधर हैं कल मिल जायें उधर, आज जिन्हे अच्छा कहें, कल खोजेंगे नुक्स, जो कुर्सी की आस दे, उसके होंगे भक्त। ना कोई आदर्श है ना कोई सिद्धान्त झूठे दस्तावेज़ हैं, इनके घोषणापत्र, राजनीति बस हो रही, सत्ता… Read more »



कुछ और उठो सत्यार्थी

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इंसान ज्वालामुखी बन चुके थे, पहले ही, इंसानो के बच्चे भी मासूमियत छोड़कर, ज्वालामुखी बनने लगे हैं, जो कभी भी फट कर सब कुछ जला सकते हैं। कोई चार साल की उम्र में हैवानियत कर गया, किसी किशोर ने बच्चे को मार दिया, इमतिहान के डर ने गुनाह करवा डाला! दोष किसे दूँ सीखा तो… Read more »

कुछ नया, कुछ पुराना

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  पुरानी धुनों पे नये गीत लिखना, पुराने गीतों को नई ताल देना, नई ताल पर पांवो का थिरकना, बुरा तो नहीं है पर , पुराने को पुराना ही रहने देना। पुरानी नीव पर नया घर बनाना, पुराने की ख़ुशबू मगर रहने देना। नये को स्वीकारो, पुराना नकारो ऐसा नहीं कभी भी होने देना। जो आज नया है, कल पुराना लगेगा पुराने को हमने कुछ यों संवारा, पुराने नये में अंतर न जाना। समय की पर्तों मे है जो पुराना, नये ढंग में लायेगा वो ज़माना, ना कुछ नया है ना ही पुराना बदलाव करने का है बहाना। ना पुराना सब सही था मैने न जाना ना नया सब गलत है,ये भी ना माना समझ जाओ तो, नयों को समझाना पुरानों और नयों को अब है पीढ़ियों का अंतर मिटाना, दोनो को जोड़कर समन्वय बनाना।

जब नींद नहीं आँखों में

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बेवजह रात को जब भी मुझे नींद नहीं आती है करवटें बदल बदल कर रात गुज़र जाती है। चादर की हर सिलवट तब, कोई कहानी अपनी, यों ही कह जाती है। जब घर में आँगन होता था और नींद नहीं आती थी चँदा से बाते होती थीं, तारों को गिनने में वो रात गुज़र जाती थी। हल्की सी बयार का झोंका जब तन को छूकर जाता था, उसकी हल्की सी थपकी, नींद बुला लाती थी। अब बंद कमरों मे जब नींद नहीं आँखों में यादों के झरोखे से अब रात के तीसरे पहर में नींद के बादल आते हैं जो मुझे सुला जाते हैं।

नींद नैन में बस जाती है

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  नींद हमे जब ना आती है चलती घड़ी रुक सी जाती है। कलम उठाकर लिखना चाहूँ भूली बीसरी याद आती है। कलम जब कभी रुक जाती है नींद कंहा फिर तब आती है। कोई कहानी मुकम्मल होकर जब काग़ज पे उतर आती है, नींद नैन में बस जाती है। शब्द कभी कहीं खो जाते हैं भाव रुलाने लग जाते हैं किसी पुराने गाने की लय पर कोई कविता जब बन जाती है। नींद हमें फिर आ जाती है। राह में जब रोड़े आते है, चलते चलते थक जाते हैं पैरों में छाले पड़ जाते ऐसे सपने हमें आते है, कोई नई कहानी तब सपनो में ही गढ़ी जाती है, नींद चौंक कर खुल जाती है।

ज्वालामुखी

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हर आदमी आज यहाँ, ज्वालामुखी बन चुका है। क्रोध कुंठा ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर सुलग रही है। कोई फटने को तैयार बैठा हैं, कोई आग को दबाये बैठा है, किसी के मन की भीतरी परत में, चिंगारियां लग चुकी हैं। कोई ज्वालामुखी सुप्त है, कोई कब फट पड़े कोई नहीं जानता। समाज की विद्रूपताओं का सामना करने वाले या उनको बदलने वाले अब नहीं रहे क्योंकि सब जल रहे हैं भीतर से और बाहर से. क्योंकि वो ज्वालामुखी बन चुके हैं। ज्वालामुखी का पूरा समूह फटता है , तो कई निर्दोष मरते है, जब बम फटते है, नाइन इलैवन या ट्वैनटी सिक्स इलैवन होता है। किसी बड़े ज्वालामुखी के फटने से प्रद्युम्न मरते है या निर्भया, गुड़िया,या किसी मीना की इज्जत पर डाके पड़ते है, फिर हाल बेहाल, वो कही सड़क पर कहीं फेंक चलते है। कभी कार मे छोटी सी खरोंच आनेपर चाकू छुरी या देसी कट्टे चलतेहैं क्योंकि वो आदमी नहीं है ज्वालामुखी बन चुके हैं क्रोध कहीं से लिया और कहीं दाग़ दिया क्रोध कुँठा से ही ज्वालामुख बनते हैं औरों के साथ ख़ुद के लियें भी ,ख़तरा बनते हैं। कुछ ज्वालामुखी भीतर ही भीतर धदकते है ये भड़कर फटते भी नहीं हैं, अपनी ही जान लेते हैं। कोई गरीबी में जलता है, कोई प्रेम त्रिकोण में फंसता है कोई परीक्षा में असफल है, कोई उपेक्षित महसूस करता है या फिर अवसाद रोग से जलता रहा है कुछ कह नहीं रहा…,.,……. किसी की प्रेमिका ने किसी और के संग करली है सगाई……….. ये सब ज्वालामुखी धधक रहे हैं शायद ही किसी की आग कोई बुझा सके तो अच्छा हो, वरना ये ज्वालामुखी, अन्दर ही फटते है कोई पंखे पे लटक गया कोई नवीं, मंजिल से कूदा है इन ज्वालामुखियों के फटने से रोज खून इतना बहता है कि अखबार के चार पन्ने लाल होते हैं यहाँ हर आदमी ज्वालामुखी बन चुका है अब, हम जी तो रह है, पर डर के साये में, कौन कब फटे बस यही किसी को नहीं पता!

हरसिंगार

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हरसिंगार की  ख़ुशबू कितनी ही निराली हो चाहें रात खिले और सुबह झड़ गये बस इतनी ज़िन्दगानी है। जीवन छोटा सा हो या हो लम्बा, ये बात ज़रा बेमानी है, ख़ुशबू बिखेर कर चले गये या घुट घुट के जीलें चाहें जितना। जो देकर ही कुछ चले गये उनकी ही बनती कहानी है। प्राजक्ता कहलो या पारितोष कहो केसरिया डंडी श्वेत फूल की चादर बिछी पेड़ के नीचे वर्षा रितु कीबिदाई  है शरद रितु की अगवानी है। अब शाम सुबह सुहानी हैं।

हिन्दी दिवस आने को है

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सितम्बर का महीना शुरू हो चुका है,हिन्दी दिवस आने कोहै। हम ज़ोर शोर से हिन्दी दिवस मनायेंगे कुछ भाषण होंगे कुछ सैमिनार होंगे और हिन्दी जहाँ है वहीं खड़ी रह जायेगी। हम हिन्दी को आज तक वो स्थान नहीं दे पाये जो उसको मिलना चाहिये था। हम कारणो की खोज न करके एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे और कुछ नहीं।… Read more »

ये नौकर

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  घर का कोई पुराना नौकर, ईमानदार वफ़ादार सा नौकर, हर व्यक्ति की सेवा करता मुश्किल से मिलता था ये नौकर लैण्ड लाइन सा ना कोई नौकर अब बूढा होकर ये नौकर पड़ा है इक कौने में नौकर कितना सुन्दर था ये नौकर मालिक का सर गर्व से उठता जिसके घर होता ये नौकर। मेज़पर… Read more »