क्रिकेट प्रेम और वे भी निष्पक्ष नही !

अभी पिछले दिनों भारतीय महिला क्रिकेट की कप्तान की उस बयान की खूब चर्चा हुई जिसमें उन्होंने पत्रकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि आप ऐसे सवाल (आपका पंसदीदा महिला क्रिकेटर कौन हैं ? ) पुरुष क्रिकेट टीम के किसी खिलाड़ी से क्यों नही पूछते ? मिताली राज की यह फटकार सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरी , सोशल मीडिया पर नेता से लेकर अभिनेता तक सबने उनके बयान की प्रशंसा की । पर अधिकांश लोगों ने बयान को सिर्फ पत्रकार की फटकार समझकर छोड़ दिया लेकिन यह फटकार सिर्फ उस पत्रकार पर नही थी यह फटकार हमारे पूरे समाज के लिए थी , हमारी मानसिक पर थी ।

हम महिलाओं को समान अधिकार देने की बात करने के लिए सबसे पहले आवाज बुलंद करते है लेकिन हमारी ये बुलंदी चार दिन की चाँदनी के समान ही होती है । हमारे समाज मे आज भी महिलाएं समान अधिकार मिलने की बात बाद मे सोचती है क्योंकि वे अब भी अपने अधिकार मिलने की स्थिति को लेकर ही संशय में है ।

शनिवार से महिला टीमों की चैम्पियन ट्राफी का मैच शुरू हो गया है । वहीं चैम्पियन ट्राफी जिसमें पुरुष टीम की जीत के लिए न जाने मन्दिरों मे कितने का प्रसाद चढ़ाया गया और न जाने नमाज़ मे कितनी बार दुआ मांगी गई ? लेकिन महिला क्रिकेट टीम के लिए दुआ और प्रार्थना करने के लिए समय कहाँ है , हमारे पास । हाँ , पर पुरुष क्रिकेट टीम का टेस्ट मैच देखने का समय जरूर है । कहने को हम क्रिकेट प्रेमी पर यहाँ भी हमारा प्रेम निष्पक्ष नही रह पाता  हमारे समाज मे क्रिकेट प्रेमी का मतलब केवल और केवल पुरुष क्रिकेट टीम के प्रति प्रेम से है ।

समाज का तथाकथित आईना कहीं जाने वाली मीडिया का दोगलापन भी गजब है । आप तो समाज के आईनें है तो आप को निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन आपके पास कोहली और कुम्बले का मतभेद दिखाने के लिए समय होता है परन्तु महिला क्रिकेट टीम के लिए एक बुलेटिन लिखने का भी समय नही होता है । मीडिया पुरुष क्रिकेट टीम के टेस्ट मैच पर स्पेशल एपिसोड बना सकती है पर महिला क्रिकेट टीम के लिए उनके पास समय का अभाव हो जाता है ।

हमारी यदादाशत की तो बात ही निराली है । हमें पुरुष क्रिकेट टिम न केवल अपने देश खिलाडियों के बल्कि विदेशीं खिलाडियों के नाम भी मुँहजुबानी याद है पर अफसोस यह स्मरण शक्ति को तब जोर का झटका लग जाता है जब एक दो महिला क्रिकेट टीम के खिलाडियों के नाम याद करने की स्थिति आ जाती है । अपने बचाव मे मीडिया ने बहुत से तर्क प्रस्तुत किए , उनमें से एक तर्क यह दिया जाता था कि जनता जो देखना ही नही चाहती है , उसे हम क्यों दिखाए ? तोयह भी सोचने वाली बात है कुछ समय पहले तक जनता हॉकी और कबड्डी भी नही देखना चाहती थी परन्तु मीडिया के प्रचार – प्रसार के कारण जनता का रुझान इन खेलों के प्रति भी हुआ है ।

हमें एक बात समझनी चाहिए कि अगर हम क्रिकेट प्रेमी है तो हमारा प्रेम निष्पक्ष होना चाहिए और अगर हम तथाकथित समानता के पक्षधर है तो हमारी खुद की भी सोच समान होनी चाहिए ।

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