-ः ललित गर्ग:-
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि संवाद, असहमति और संवैधानिक मर्यादाओं का जीवंत तंत्र है। इस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी मांगों और विचारों को शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार प्राप्त है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार दिया है, लेकिन यह अधिकार कभी भी हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश या सुरक्षा बलों पर हमले का लाइसेंस नहीं बन सकता। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह विरोध को भी सम्मान देता है, किंतु विरोध की भी अपनी सीमाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। हाल के वर्षों में कुछ आंदोलनों ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा किया है कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में कानून और व्यवस्था को चुनौती देना स्वीकार्य हो सकता है? यदि कोई प्रदर्शन बैरिकेड तोड़ने, पुलिस पर हमला करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान की ओर जबरन बढ़ने का प्रयास करे, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल मूकदर्शक बनी रहें। राज्य का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करना है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए यह कहना कि असाधारण परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है, इसी संतुलित दृष्टिकोण का परिचायक है। न्यायालय ने किसी भी प्रकार के असीमित बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया, बल्कि यह स्पष्ट संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य के पास आवश्यक साधन भी होने चाहिए। यदि सुरक्षा बलों से हर प्रभावी उपाय छीन लिया जाएगा, तो हिंसक भीड़ पर नियंत्रण कैसे स्थापित होगा? यह प्रश्न केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों को असीमित अधिकार मिल जाने चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक कार्रवाई न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही के दायरे में रहती है। यदि कहीं बल प्रयोग आवश्यकता से अधिक हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार तथ्य होने चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं। जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों की पीड़ा सुनी जानी चाहिए, उसी प्रकार घायल हुए पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों का पक्ष भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आंदोलन की संस्कृति पर पुनर्विचार किया जाए। स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की ऐसी परंपरा विकसित की थी, जिसमें नैतिक बल सबसे बड़ा हथियार था। सत्याग्रह में विरोध था, परंतु वैमनस्य नहीं। संघर्ष था, परंतु हिंसा नहीं। दृढ़ता थी, परंतु अराजकता नहीं। दुर्भाग्य से आज कुछ आंदोलनों में संवाद की जगह टकराव, संयम की जगह उग्रता और तर्क की जगह भीड़ की शक्ति को महत्व दिया जाने लगा है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में परिवर्तन सड़क पर पत्थर फेंकने से नहीं, बल्कि विचार, संगठन, जनजागरण और संवैधानिक प्रक्रियाओं से आता है। यदि हर असहमति हिंसक रूप ले लेगी, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं युवाओं का होगा, जिनके भविष्य के नाम पर आंदोलन किए जाते हैं। लोकतंत्र की रक्षा भावनाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन और उत्तरदायित्व से होती है।
यदि यह मान लिया जाए कि किसी राजनीतिक दल या उसके समर्थकों द्वारा आयोजित आंदोलन में कुछ असामाजिक और हिंसक तत्वों ने प्रवेश कर उसे अराजक दिशा देने का प्रयास किया, तो ऐसी स्थिति में सरकार का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। समय रहते प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई, भले ही उससे कुछ अप्रिय घटनाएं हुई हों, व्यापक अराजकता और राष्ट्रीय संस्थानों को संभावित क्षति से बचाने के उद्देश्य से देखी जा सकती है। साथ ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी अपेक्षित है कि विपक्ष जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंसा और तोड़फोड़ से स्पष्ट दूरी बनाए तथा वैध मांगों के समर्थन और अवैध कृत्यों के विरोध के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होता है जब सरकार कानून के शासन का पालन करे, विपक्ष जिम्मेदार आचरण करे और आंदोलन संविधान की मर्यादाओं एवं शांतिपूर्ण तरीकों के भीतर संचालित हों।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी दल का यह दायित्व है कि वह जनभावनाओं को सकारात्मक दिशा दे। यदि कोई राजनीतिक संगठन या उसके समर्थक आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या कानून हाथ में लेने को प्रोत्साहित करते हैं, तो उसकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है, लेकिन उसका धर्म केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि किसी भी पक्ष द्वारा जनआंदोलनों का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, तो अंततः लोकतंत्र ही कमजोर होता है। सरकारों को भी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि जनआक्रोश की स्थितियां क्यों बनती हैं। संवाद के द्वार हमेशा खुले रहने चाहिए। पारदर्शी निर्णय, समय पर संवाद और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था अनेक आंदोलनों को उग्र होने से पहले ही शांत कर सकती है। लोकतंत्र में शासन का अर्थ केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि विश्वास अर्जित करना भी है।
भविष्य के लिए कुछ स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किए जाने चाहिए। प्रत्येक बड़े आंदोलन के लिए पूर्व अनुमति, निर्धारित मार्ग, आयोजकों की स्पष्ट जवाबदेही, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, हिंसा की स्थिति में त्वरित पहचान और दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो। साथ ही पुलिस को भी भीड़ नियंत्रण के आधुनिक, वैज्ञानिक और न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांतों पर निरंतर प्रशिक्षित किया जाए। इससे नागरिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच बेहतर संतुलन स्थापित होगा। लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में नहीं कि कितनी जोर से नारे लगाए गए, बल्कि इस बात में है कि कितनी गंभीरता से संवाद हुआ। संसद जनता की आकांक्षाओं का मंदिर है। यदि कोई समूह अपनी बात संसद तक पहुंचाना चाहता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन संसद पर दबाव बनाने या उसे घेरने की संस्कृति लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करती है। लोकतंत्र में जनमत सर्वोपरि है, भीड़तंत्र नहीं।
आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ विश्वगुरु बनने की दिशा में भी अग्रसर है। ऐसे समय में हमें विरोध की भी ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जो विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करे। हमारे आंदोलन व्यवस्था को तोड़ने के नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने के माध्यम बनें। हमारे प्रदर्शन राष्ट्र को विभाजित करने के नहीं, लोकतांत्रिक चेतना को समृद्ध करने के साधन बनें। अंततः यह स्मरण रखना होगा कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन किया जाए। यदि आंदोलन संविधान की मर्यादाओं में रहकर होंगे, तो सरकार भी अधिक उत्तरदायी बनेगी और लोकतंत्र भी अधिक सशक्त होगा। भारत को ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता है जो व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय उसे सुधारने की प्रेरणा दें। जो युवाओं को उग्रता नहीं, उत्तरदायित्व सिखाएं और जो राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखकर लोकतंत्र को और अधिक परिपक्व, अनुशासित तथा जनोन्मुख बनाने का मार्ग प्रशस्त करें।