राजबाला
हरियाणा के कई गांवों में “बाहरी बहू” अब कोई अनसुना शब्द नहीं रह गया है। महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब, बंगाल जैसे राज्यों से आई महिलाएं यहां एक नई जिंदगी की उम्मीद लेकर आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें सच में “बहू” का दर्जा मिलता है, या वे सिर्फ एक खरीदी हुई ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं? करनाल के एक गांव में महाराष्ट्र से लाई गई एक महिला की कहानी इस सच्चाई को उजागर करती है। शादी के कुछ समय बाद ही उसे एहसास हो गया कि वह इस घर में रिश्ते से नहीं, बल्कि पैसे देकर लाई गई है। उसे अपनी बात रखने की तो बात दूर, बोलने तक की आज़ादी नहीं है। जब उसने विरोध करने की कोशिश की, तो उसे तिरस्कार भरे शब्द सुनने पड़े—
“तू महाराष्ट्र की है, अपनी दादागिरी वहीं दिखाना…” यह केवल एक अपमानजनक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस गहरी मानसिकता का प्रतीक है, जिसमें उसे परिवार का हिस्सा नहीं माना जाता। दूसरी महिला, जो पंजाब से लाई गई, पिछले 8–9 वर्षों से इस घर में रह रही है। इसके बावजूद आज तक उसके पास अपनी पहचान का कोई दस्तावेज़ नहीं है—न आधार कार्ड, न राशन कार्ड। जब वह खुद दस्तावेज़ बनवाने की कोशिश करती है, तो उससे शादी का प्रमाण मांगा जाता है, जिसकी कोई तस्वीर या पुख्ता सबूत उसके पास नहीं है। परिवार भी इस दिशा में कोई पहल नहीं करता, क्योंकि उन्हें आशंका है कि कहीं वह भविष्य में संपत्ति पर अपना अधिकार न जता दे। एक अन्य महिला की कहानी आर्थिक निर्भरता की त्रासदी को सामने लाती है। उसके लिए मायके जाना एक दुर्लभ अवसर बन चुका है। चार लोगों के सफर का खर्च वहन करना उसके बस में नहीं है। जब कभी 4–5 वर्षों में मायके जाने का अवसर मिलता भी है, तो उसे अपना मंगलसूत्र गिरवी रखना पड़ता है या ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है। यह विडंबना ही है कि जिस परिवार ने उसे जन्म दिया, उससे मिलने के लिए उसे अपनी अंतिम पूंजी तक दांव पर लगानी पड़ती है।बिहार से आई एक महिला, जिसकी शादी को लगभग एक दशक बीत चुका है, आज भी सरकारी रिकॉर्ड में “मौजूद” नहीं है। हर बार उससे मायके का प्रमाण मांगा जाता है—एक ऐसा प्रमाण, जो उसके पास नहीं है। बिना पहचान के वह किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं उठा सकती। वह इस घर में रहती है, काम करती है, बच्चों की परवरिश करती है, लेकिन कागजों में उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
इन अलग-अलग कहानियों को जब एक साथ रखा जाता है, तो एक भयावह तस्वीर उभरती है—ब्राइड ट्रैफिकिंग की। यह वह सच्चाई है, जहां दलालों के माध्यम से लड़कियों को लाया जाता है, उन्हें झूठे सपने दिखाए जाते हैं और फिर एक ऐसी जिंदगी में धकेल दिया जाता है, जहां अधिकार, पहचान और सम्मान—तीनों का अभाव होता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन महिलाओं के दस्तावेज़ तक नहीं बनने दिए जाते। कारण स्पष्ट है—पहचान मिलने पर वे अपने अधिकारों की मांग कर सकती हैं, संपत्ति में हिस्सा मांग सकती हैं और अपने अस्तित्व को प्रमाणित कर सकती हैं। बिना दस्तावेज़ के वे न केवल सरकारी योजनाओं से वंचित रहती हैं, बल्कि एक तरह से “अदृश्य नागरिक” बन जाती हैं। आर्थिक निर्भरता इस शोषण को और गहरा करती है। स्वयं की कोई आमदनी नहीं, मायके जाने तक के लिए संसाधनों का अभाव—ऐसी स्थिति में वे पूरी तरह परिवार पर निर्भर हो जाती हैं। यह निर्भरता उन्हें एक तरह की बंधुआ स्थिति में कैद कर देती है, जहां विरोध की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का असर केवल सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि गहरा मानसिक भी है। लगातार यह अहसास कराया जाना कि वे “बाहरी” हैं, उनकी आवाज का कोई महत्व नहीं है, और उनकी पहचान अधूरी है—यह सब उन्हें भीतर से तोड़ देता है। अब सवाल केवल समाज से नहीं, बल्कि व्यवस्था से भी है— अगर इन महिलाओं को बहू बनाकर लाया जाता है, तो क्या उन्हें वही अधिकार नहीं मिलने चाहिए, जो एक स्थानीय महिला को मिलते हैं? क्या पति के आधार पर उनके पहचान-पत्र नहीं बनाए जा सकते? क्या उन्हें अपने मायके जाने, अपनी पहचान स्थापित करने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का अधिकार नहीं है? ये “बाहरी बहुएं” दरअसल हमारे समाज का वह आईना हैं, जिसे हम देखना नहीं चाहते। जब तक इन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक “शादी” के नाम पर चल रहा यह सिलसिला दरअसल छिपी हुई मानव तस्करी ही बना रहेगा।
लेखिका: लंबे समय से ‘इम्पॉवर पिपुल’ संस्था के साथ जुड़कर ब्राइड ट्रैफिकिंग के खिलाफ काम कर रही हैं और प्रभावित महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रयासरत हैं।