कविता

बहिर-बधिर

“सूर्य
अपने तपते आदर्शों का
निरंतर प्रवचन करता है—
आकाश के ऊँचे मंच से।

काले बादल
अपनी गरम चुप्पियों में
बिजली की भाषा लिखते हैं,
और बारिश
धरती की जड़ों तक
धीरे-धीरे उतरती है।

पर एक मनुष्य है—
जो केवल इन्हीं को सुनने के लिए
अपने कान खुले रखता है,
मानो संसार की बाकी आवाज़ें
उसके लिए
मूक हो चुकी हों।

समय
रेत-घड़ी की छाया में
उँगलियों से फिसलती
क्षणिक रेत बन जाता है।

और यह एकाकी जीवन—
जो कभी
वसंत के बगीचे तक नहीं पहुँचता,

समुद्र और रेगिस्तान को
एक ही पलक में
मिला देता है—

जैसे
गर्मियों का वर्ष
क्षण भर में
पूरी उम्र बन जाता हो।”