उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें दिल्ली दरबार के लिए गेट-वे कही जाती हैं तो इसलिए यहां की सीटें ही केंद्र में सरकार बनाने का आधार तैयार करती हैं। आमतौर पर दिल्ली की गद्दीनशीं तय करने वाले इस सूबे में खासकर भाजपा की साख दांव पर होगी, वहीं सपा-बसपा गठबंधन के लिए भी यह चुनाव किसी लिटमस परीक्षण से कम नहीं होगा। वर्ष 2014 में भाजपा ने 71 और उसके सहयोगी दल ने दो सीटें जीती थीं। खुद अमित शाह ने इस बार 73 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया है। हमें नहीं लगता कि भाजपा 2014 को यूपी में दोहरा सकेगी। ऐसे में भाजपा की साख सबसे ज्यादा दांव पर है। कभी घोर प्रतिद्वंद्वी रहे सपा और बसपा ने अपने तमाम गिले-शिकवे भुलाकर इस चुनाव में भाजपा को हराने के लिए हाथ मिलाया है। 26 साल बाद यहां सपा-बसपा ने गठबंधन कर चुनाव को रोमांचक बनाया है तो भाजपा अपने नेटवर्क के सहारे पिछले ऐतिहासिक प्रदर्शन को दोहराने की कोशिश में है। प्रियंका गांधी वाड्रा के आगमन के बाद कांग्रेस नए हौंसले के साथ चुनावी रथ पर सवार है। इस तरह लगता यह है कि उत्तर प्रदेश में तिकोना मुकाबला होगा। हां अगर सपा-बसपा और कांग्रेस का गठबंधन हो जाता तो मुकाबला भाजपा बनाम गठबंधन हो जाता। अगर 2014 के चुनाव पर नजर डालें तो भाजपा ने 71 सीटें जीती थीं और उसका वोट प्रतिशत 42.64 प्रतिशत था। अपना दल ने दो सीटें जीतकर 0.02 प्रतिशत वोट पाया था। सपा को पांच सीटें मिलीं और उसे 22.35 प्रतिशत वोट मिला था। बसपा को कोई सीट नहीं मिली थी पर तब भी उसे 19.77 प्रतिशत वोट मिला था। कांग्रेस दो सीटें जीतकर 07.55 प्रतिशत वोट लेने में कामयाब हुई थी। रालोद को कोई सीट नहीं मिली थी और उसे 00.86 प्रतिशत वोट मिला था। इस प्रकार सपा-बसपा-रालोद और कांग्रेस का वोट प्रतिशत 49.67 प्रतिशत बनता है जोकि भाजपा के 42.65 प्रतिशत से ज्यादा है। देखना यह होगा कि विपक्षी गठबंधन कितनी मजबूती से वोट डलवाता है? बिहार की कुल 40 सीटों के लिए जो राजनीतिक परिदृश्य बनकर तैयार हो रहा है, उससे स्पष्ट है कि यहां भाजपा, जदयू और लोजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और राजद, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा), हम और वीआईपी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच महासंग्राम होगा। राजग के पक्ष में यह बात महत्वपूर्ण है कि इसका चुनावी गठजोड़ न सिर्फ समय से हो गया, बल्कि सीटों के बंटवारे को लेकर किसी प्रकार की किचकिच नहीं हुई। भाजपा और जदयू को 17-17 जबकि लोजपा को छह सीटें देने का फार्मूला तय हुआ है। नोट करने वाली बात यह है कि भाजपा को पिछली बार अपनी कई जीती हुईं सीटें छोड़नी पड़ रही हैं। इन सबके बावजूद राजग की राह को एकदम आसान नहीं कहा जा सकता। सीटों का बंटवारा बेशक हो गया हो, लेकिन कई संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जहां गठबंधन की एकता से ज्यादा जाति का फैक्टर हावी दिखाई देता है। दूसरी ओर यदि विपक्षी महागठबंधन की बात करें तो वहां अभी सब कुछ तय नहीं दिखाई दे रहा है। सीटों का फार्मूला क्या होगा, राजद अन्य घटक दलों, खासकर कांग्रेस को किस हद तक समायोजित करेगा, यह अभी तय नहीं हो पाया है। प्रदेश की 40 सीटों में भाजपा को 2014 में 22 सीटें मिली थीं और वोट प्रतिशत था 29.86 प्रतिशत। राजद को चार और वोट 20.46 प्रतिशत, जदयू दो और वोट प्रतिशत 16.04, कांग्रेस को दो और वोट 8.56 प्रतिशत, लोजपा को छह सीटें और 6.50 प्रतिशत वोट, रालोसपा को तीन और वोट प्रतिशत भी तीन ही था और एनसीपी को एक सीट मिली थी और वोट प्रतिशत 1.22 था। लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज से तीसरे सबसे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में 2019 का चुनावी महासंग्राम बहुत दिलचस्प होने वाला है। 42 सीटों वाले इस राज्य में तृणमूल कांग्रेस ने अपने सभी 42 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है। वहीं भाजपा भी दूसरे दलों के बड़े नेताओं को तोड़कर अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस चार, भाकपा दो, भाजपा दो सीटों पर सफल रही थी। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राज्य का मुकाबला चतुष्कोणीय न हो इसलिए कांग्रेस और वामदलों में गठबंधन की बात भी चल रही है। हालांकि यह दोनों दल इस पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोल नहीं रहे हैं, फिलहाल सीधी लड़ाई मोदी लहर में भी 34 सीटें जीतने वाली दीदी और एयर स्ट्राइक और राष्ट्रवाद की तेज आंधी बहाने वाली भाजपा के बीच रही है। विपक्षी महागठबंधन का चेहरा बनने का प्रयास कर रही टीएमसी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी मजबूत करने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर भाजपा उत्तर भारतीय राज्यों में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बंगाल पर निगाहें लगाए हुए है। लोकसभा व विधानसभा चुनाव में मिले मत के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच अंतर बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि वामदल और कांग्रेस को तीसरे और चौथे नम्बर पर धकेलने के बाद पार्टी त्रिपुरा की तर्ज पर यहां भी चमत्कार कर सकती है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कम से कम 23 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। आगामी लोकसभा चुनाव में जहां 200 से अधिक सीटों पर क्षेत्रीय क्षत्रप भाजपा और कांग्रेस को सीधी टक्कर देंगे, वहीं चुनाव के बाद भी यही दिग्गज देश की अगली सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। देश की कुल लोकसभा सीटों में से उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली की 218 लोकसभा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई इन क्षत्रपों से होगी। इन राज्यों में यह क्षत्रप नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों के खिलाफ खंभ ठोंकने को तैयार हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती-अखिलेश, आंध्र में चन्द्रबाबू नायडू, वाईएसआर के जगनमोहन रेड्डी, दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी मोदी को सीधी चुनौती देना चाहेंगे। यूपी, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, केरल, तेलंगाना, पंजाब, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में त्रिकोणीय मुकाबला है। इन राज्यों में 332 सीटें हैं। यही सरकार बनाने-गिराने के समीकरण बन रहे हैं। 144 सीटों वाले आठ राज्यों में भाजपा व कांग्रेस के मध्यप्रदेश, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़ से भाजपा को कड़ी चुनौती मिलेगी। अगर सीधी लड़ाई होती है तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं पर इन क्षत्रपों की अपनी निजी महत्वाकांक्षाएं कहीं इस लड़ाई पर हावी न हो जाएं?

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