देश की एकता व अखण्डता के लिए अविरुद्ध व समान धार्मिक एवं राजनैतिक विचारधारा का होना आवश्यक

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मनमोहन कुमार आर्य

               ऋग्वेद 10/191 में संगठन सूक्त के चार मंत्रों में कहा गया है कि हमारे मन, हृदय, दिल, विचार, भावनायें, सोच, चिन्तन, संकल्प आदि सब एक समान हों। ऐसा होने पर ही हम एकता व अखण्डता के सूत्र में बन्ध सकते हैं। यह एक सामान्य बात है कि यदि मनुष्यों की भिन्न-भिन्न विचारधारायें होंगी तो उनमें एकता नहीं हो सकती। प्रश्न यह है कि क्या मत, विचार, संकल्पों, मन व चित्त आदि का एक समान होना सम्भव है? इसका उत्तर वेद ही देते हैं कि कठिन अवश्य है परन्तु असम्भव नहीं। विवाह के एक मन्त्र में भगवान ने कहा है कि समापो हृदयानि नौ’ अर्थात् हमारे हृदय वा दिल जल की भांति मिलें हुए हों। जिस प्रकार दो नदियों के जल को मिला देने पर वह एक हो जाते हैं, उन्हें पुनः पृथक नहीं किया जा सकता, ऐसे ही हमारे दिल, विचार व भावनायें परस्पर एक समान होवें। भिन्न-भिन्न विचारों व विचारधाराओं के होने के पीछे कारण क्या है? इस पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि किन्हीं दो मनुष्यों का धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक ज्ञान एक समान नहीं होता। इसका मुख्य कारण उनका ईश्वर तथा अपनी आत्मा विषयक ज्ञान एक समान न होना होता है। जिनकी शिक्षा व संस्कार एक जैसे होंगे उनके विचार भी एक जैसे हो सकते हैं। यदि सभी वेद पढ़े और वेदानुसार ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप, उसके कार्यों व व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करें तो उनमें इस विषय में समानता हो सकती है जैसी कि ऋषियों व वैदिक विद्वानों में होती है।

ऋषि दयानन्द ने वेद को सत्य ज्ञान की कसौटी वा स्वतः प्रमाण माना है। इसको कसौटी मानने से पूर्व उन्होंने वेद की मान्यताओं को तर्क व युक्ति की कसौटी पर कसा और जो बातें यथार्थ व सत्य सिद्ध हुई उसी को उन्होंने स्वीकार किया और उसका ही प्रचार देश-देशान्तर में अपने व्याख्यानों व ग्रन्थों द्वारा किया। संसार वा ब्रह्माण्ड में ईश्वर एक है तो उसका स्वरूप भी एक ही होगा। आत्मा सब एक प्रकार की हैं तो उनका स्वरूप, ज्ञान व सामर्थ्य भी एक जैसा व समान ही होगा। आश्चर्य है कि आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में मत-मतान्तरों के आचार्य व उनके अनुयायी ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव आदि पर एक मत नहीं हो पा रहे हैं और अनेक इस विषय में छल-कपट का व्यवहार करते हुए दीखते हैं। ऋषि दयानन्द ने वेदों व विस्तृत वैदिक साहित्य का अध्ययन कर उसके आधार पर ईश्वर व जीवात्मा सहित सभी विषयों पर सत्य व यथार्थ सिद्धान्त दिये हैं। उन्होंने अपने अध्ययन में जिन हस्तलिखित महत्वपूर्ण ग्रन्थों का उपयोग किया था, व जिन उच्च कोटि के विद्वानों का सान्निध्य प्राप्त किया था, अभाग्य से हमें वह सब ग्रन्थ व महात्मा उपलब्ध नहीं हैं। ऋषि दयानन्द के वेद व वेदानुकाल निजी सिद्धान्तों को अति संक्षिप्त रूप में जानना हो तो उन्हें उनके लघु ग्रन्थ आर्योद्देश्यरत्नमाला और स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश से जाना जा सकता है। सभी मत-मतान्तर के लोग ईश्वर की उपासना को करना स्वीकार करते हैं, सभी करते भी हैं परन्तु सबकी उपासना पद्धतियों में भेद व अन्तर है। ईश्वर की उपासना का अर्थ ईश्वर को जानकर उसके गुणों, कर्मों व स्वभावों की स्तुति कर उससे प्रार्थना करना है। ईश्वर के गुण अपरिवर्तनीय हैं। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सभी प्रमुख गुणों का निर्धारण भी वेद व वैदिक साहित्य के आधार पर कर दिया है परन्तु लोग न तो इसे स्वीकार करते हैं और न ही इसका खण्डन करने की योग्यता रखते हैं।

यदि कोई व्यक्ति किसी बात को स्वीकार व अस्वीकार दोनों ही न करे, ऐसे व्यक्ति को विद्वान व ज्ञानी नहीं कहा जा सकता है। उसे भ्रमित व अज्ञान से युक्त ही कहा जा सकता है। हमारी दृष्टि में ईश्वर विषयक ज्ञान से मत-मतान्तर के लोग भ्रमित हैं और उनके अपने मतो से निजी हित जुड़े होने के कारण वह सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं कर पाते। यह बात धार्मिक जगत में देखी जाती है कि लोग किसी विषय में एक मत होने का प्रयास ही नहीं करते। सब अपनी सत्य व असत्य बात को भी सत्य मानते हैं और दूसरे मत की सत्य बातों का तिरस्कार करते हैं व उसे जानने समझने की कोशिश ही नहीं करते। इस दृष्टि से हमारे सभी वैज्ञानिक साधुवाद के पात्र हैं जो किसी वैज्ञानिक द्वारा किसी पुराने प्रचलित वैज्ञानिक सिद्धान्त में कमी बताकर उसका सुधार व संशोधन करते हैं और उसे प्रयोगों द्वारा व आकड़ों से सिद्ध करते हैं तो उसकी बात को सारा वैज्ञानिक जगत स्वीकार कर लेता है। हम समझते हैं कि यही दृष्टि, भावना और प्रवृत्ति हमारे धार्मिक व राजनैतिक विचारधारा के लोगों में भी होनी चाहिये। राजनैतिक दल देश के हित के लिये कार्य करने के लिये गठित किये जाते हैं परन्तु यदि उनमें सत्ता प्राप्ति की होड़ लग जाये और यदि वह ज्ञान व अज्ञानवश उससे अपने अनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति में लग जायें तो यह उचित नहीं माना जा सकता। समय समय पर राजनीतिक नेताओं व शीर्ष पदों के लोगों के भ्रष्टाचार के कार्य सामने आते रहते हैं। ऐसा होना देश व समाज के लिये घातक होता है। आज के समय में धार्मिक व राजनैतिक क्षेत्रों सर्वत्र मर्यादाओं का पतन होता देखा जाता है। पिछले वर्षों में देश में बड़े बड़े घोटालां व भ्रष्टाचार के मामले सामने आये परन्तु इससे देश ने कोई सबक नहीं सीखा। आज भी भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ है। हमारे देश के लोग जो विदेशों में काम करते हैं, वह देश में इसी कारण आना नहीं चाहते कि वहां भ्रष्टाचार रहित स्चच्छ वातावरण है और यहां नहीं है। हमारे देश में भ्रष्टाचार के अनेक मामले समाने आते हैं परन्तु किसी से धन की वसूली नहीं होती। येन केन प्रकारेण मामला उलझा रहता है और वह आरोपी व्यक्ति पदों पर बना रहता है। यह भी सब जानते हैं कि राजनीति में किसी पद के लिये किसी शैक्षिक व चारित्रिक योग्यता की कोई आवश्यकता व सीमा तय नही ंहै। यह आंकलन ही नही किया जाता कि जिस व्यक्ति को जो पद दिया जा रहा है वह उस पद के योग्य है भी या नहीं। पदों की बंदरबाट होती सब देखते हैं परन्तु व्यवस्था ही ऐसी है कि शिक्षित जनता इन दृश्यों को देखने के अलावा कुछ कर नहीं सकती। यह स्थिति उन्नत यूरोप आदि के देशों में नहीं है। इसी कारण वह तेजी से उन्नति कर रहे हैं।

सत्य ज्ञान वेदों के अनुसार देश में सबसे अच्छा समय तभी होगा जब सब लोग धार्मिक व राजनैतिक सभी विषयों में एक विचारधारा में सहमति रखने वाले हांगे, सब शैक्षिक दृष्टि से योग्य होंगे और चारित्रिक तथा नैतिक दृष्टि से भी श्रेष्ठ व उत्तम होंगे। महर्षि दयानन्द का कार्य इसी स्थिति को उत्पन्न करने का था। देशवासियों द्वारा उनके कार्यों में सहयोग न करने वा उससे लाभ न उठाने के कारण वह कार्य अभीष्ट परिणाम प्राप्त न करा सका। ऐसा होने पर भी विद्वानों व ज्ञानियों का कर्तव्य हैं कि वह वेद की सत्य मान्तयाओं का प्रचार प्रसार कर देशवासियों को वेद की मान्यताओं से सहमत कर सबको एक मत, एक विचार व एक समान हृदय वाला बनाने का प्रयास करें। यही देश को गौरव प्रदान कर सकता है। यह काम असम्भव सा है परन्तु ऐसे लोग होते हैं जो बड़ी चुनौतियों को स्वीकार करते हैं। उनमें मृत्यु का डर नहीं होता। देश को आजाद कराना आसान काम नहीं था। हमारे वीर युवाओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया था और साहस का परिचय देते हुए अपना बलिदान दिया। ऋषि दयानन्द ने जानते हुए भी कि अंग्रेज अप्रसन्न होंगे, जान भी जा सकती है फिर भी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में देश की आजादी अर्थात् स्वदेशी राज्य की महत्ता को उद्घोषित करने वाले शब्द लिखे और इसके कुछ ही दिनों बाद वह एक षडयन्त्र का शिकार होकर मृत्यु धाम पहुंच गये या पहुंचा दिये गये। वैदिक विचारधारा में सामर्थ्य है कि वह संसार के लोगों को प्रभावित कर सकती है। उसके सम्यक रीति से प्रचार की आवश्यकता है। हमारे देश में शास्त्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते नानृतं’ अर्थात् सदैव सर्वत्र सत्य की विजय होती है असत्य की नहीं, की ध्वनि सुनने को मिलती है। वैदिक सिद्धान्त व मान्यतायें सत्य होने के कारण इनकी जय निश्चित कही जा सकती है। इसके लिये अपेक्षित पुरुषार्थ की आवश्यकता है। मार्ग में अनेक अवरोध हैं जिन्हें हटाना होगा। जिस प्रकार विज्ञान में सत्य की प्रतिष्ठा है, हम आशा करते हैं कि भविष्य में धार्मिक व राजनीतिक जगत में भी सत्य की प्रतिष्ठा अवश्य होगी। देश में एक विचारधारा, एक जैसी भावना व समान सुख-दुःख के भाव का होना देश की उन्नति व देशवासियों के सुख के लिए आवश्यक है। ईश्वर इस कार्य को पूरा करने में देशवासियों को प्रेरणा करें। ओ३म् शम्।

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