राजनीति

विकसित भारत : मंजिल तक कैसे पहुंचेंगे हम?

प्रो. महेश चंद गुप्ता

किसी देश के भविष्य के बारे में बात करते हुए उसके सामने कोई बड़ा लक्ष्य रख देना आसान है लेकिन यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ऐसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश ने अब तक कितनी तैयारी की है और जिस रास्ते पर वह चल रहा है, वह वास्तव में उसे वहां ले भी जाएगा या नहीं? भारत के सामने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य है, यानी आजादी के सौ साल पूरे होने तक भारत को उस स्थिति में पहुंचाना है, जहां उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी और मजबूत हो, नागरिकों का जीवन बेहतर हो और देश दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी निर्णायक जगह बना चुका हो।

 अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले एक शिक्षक के रूप में मुझे लगता है कि विकसित भारत का लक्ष्य सुनने में जितना आकर्षक है, उसकी गंभीरता उतनी ही अधिक है। आखिर विकसित राष्ट्र होना केवल इतना नहीं है कि जीडीपी का आकार बढ़ जाए या देश दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आ जाए। बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसा कोई आर्थिक विस्तार होता है तो उसका असर देश के सामान्य नागरिक के जीवन पर कितना पड़ेगा?  इसी सवाल के उत्तर में विकसित भारत की चर्चा को केवल राजनीतिक नारे या सरकारी उपलब्धियों की सूची से अलग करके देखने की जरूरत महसूस होती है।
 पिछले दस-बारह सालों में देश में कई सार्थक बदलाव हुए हैं। डिजिटल तकनीक का विस्तार इसका सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण है। जिस देश में कभी बैंक खाता, पहचान और सरकारी सुविधा तक पहुंच अपने आप में बड़ी समस्या हुआ करती थी, वहां डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे ने करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के जीवन को किस प्रकार बदल दिया है, यह हमारे सामने है। सडक़ों, रेल, बंदरगाहों और हवाई अड्डों के निर्माण की गति भी तीव्र हुई है। रक्षा उत्पादन में घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश हुई है। ऊर्जा के क्षेत्र में नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बदलाव उस सोच का है जिसमें भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में देखने के बजाय उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की कोशिश दिखाई देती है।

यह बदलाव साधारण नहीं है। आजादी के बाद लंबे समय तक भारत की आर्थिक बहस में कृषि का संकट और फिर सर्विस सेक्टर की सफलता प्रमुख विषय रहे। मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर अपेक्षित मजबूती से नहीं उभर पाया। चीन की आर्थिक सफलता महत्वपूर्ण है, इसमें  हम देख सकते हैं कि बड़े पैमाने पर रोजगार और औद्योगिक क्षमता पैदा किए बिना किसी विशाल आबादी वाले देश को ऊंची आय वाले समाज में बदलना कठिन है। इसलिए सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा और दूसरी बुनियादी औद्योगिक क्षमताओं में निवेश को केवल कुछ नई फैक्ट्रियों तक सीमित मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे एक बड़े आर्थिक बदलाव की आवश्यकता है। यह आवश्यक है कि देश अपने लिए जरूरी चीजें बनाने की क्षमता विकसित करे, वैश्विक उत्पादन श्रृंखलाओं में जगह बनाए और ऐसा औद्योगिक ढांचा खड़ा करे जो आने वाले दशकों में लाखों लोगों के लिए अवसर पैदा कर सके। विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तो अपरिहार्य है। जब हम विकसित भारत की बात करते हैं तो हमें ऊर्जा को महत्व देकर देखना चाहिए। जाहिर है, औद्योगिकीकरण होगा तो ऊर्जा चाहिए। शहर बढ़ेंगे तो बिजली चाहिए। रेलों को बिजली से चलाने आदि में ट्रांसपोर्ट सिस्टम बदलेगा तो ऊर्जा की दरकार बढ़ेगी। इसलिए परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और दूसरे स्रोतों पर एक साथ विचार करना पड़ेगा। एल्युमिनियम, स्टील जैसी बुनियादी धातुओं और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल की क्षमता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
 

नि:संदेह देश को विकसित बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत काम करना पड़ेगा। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी बहुत कम है। चीन और विकसित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ तुलना करें तो यह अंतर साफ दिखाई देता है। प्रति व्यक्ति आय का यह अंतर कई समस्याओं की जड़ है। हम 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लक्ष्य पर एकजुट हो कर काम करें, यह सही है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी तो सोचना होगा कि आर्थिक विकास के प्रकाश को उस बिंदु तक कैसे ले जाया जाए जहां उसकी रोशनी समाज के उन अंधकार भरे हिस्सों तक भी पहुंचे जो आज उससे पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो रहे हैं? इसमें दो-राय नहीं है कि देश मेंं गरीबी कम हुई है, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी है, उपभोग का बाजार फैला है। यह परिवर्तन वास्तविक है लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वच्छता जैसे क्षेत्र हैं जहां अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अगर एक परिवार की आय बढ़ जाए लेकिन उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा न मिले, उसके पास मोबाइल और इंटरनेट हो लेकिन गंभीर बीमारी के इलाज के लिए उसे जमीन बेचनी पड़े तो क्या हम इसे विकसित समाज कहेंगे? इसलिए विकसित भारत का सवाल सिर्फ अर्थव्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह हमारे लिए सामाजिक जीवन का सवाल भी है।


हमारे देश में जब बेरोजगारी की बात करते हैं तो रोजगार का प्रश्न सबसे ज्यादा असहज करने वाला होता है। भारत उन देशों में है, जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। अगर इस युवा आबादी को लाभ के स्रोत में परिवर्तित करना है तो उसके लिए शिक्षा चाहिए, कौशल चाहिए और  ऐसे रोजगार चाहिए जिनसे व्यक्ति अपने जीवन को आगे ले जा सके। अगर उद्योग बढ़ता है लेकिन रोजगार पर्याप्त नहीं बढ़ता तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है। जहां तक इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना है तो इस पर गंभीरता से काम होना चाहिए। देश में कितने बड़े कारखाने लगे, यह महत्वपूर्ण है लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनके आसपास कितने छोटे उद्योग खड़े हुए, कितने लोगों को स्थायी काम मिला, कितने कस्बे आर्थिक गतिविधि के नए केंद्र बने और कितने ग्रामीण परिवारों के जीवन में इसका असर पहुंचा।


   लाल किले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन ‘सप्त धाराओं’ की बात की है, उन्हें इसी बड़े लक्ष्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसे केवल किसी भाषण या सरकार की उपलब्धियों की सूची तक सीमित करना इस विचार को छोटा कर देगा। विकसित भारत मूलत: एक लंबी राष्ट्रीय यात्रा है, जिसमें सरकार के साथ उद्योग, किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक, उद्यमी और सामान्य नागरिक सबकी भूमिका है। 2047 का लक्ष्य किसी एक सरकार के पांच साल के कार्यकाल का लक्ष्य भी नहीं है। अगले बीस वर्षों में सरकारें बदलेंगी, आर्थिक परिस्थितियां बदलेंगी और दुनिया का राजनीतिक तथा व्यापारिक नक्शा भी बदलेगा। इसलिए विकसित भारत की कल्पना को दलगत कार्यक्रम से ऊपर उठाकर दीर्घकालीन राष्ट्रीय परियोजना के रूप में देखना होगा। भारत के अतीत में इसके उदाहरण मौजूद हैं। कभी देश खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था, दूध की कमी थी। हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक की यात्राएं प्रमाण हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद निरंतर प्रयास और संस्थागत क्षमता से देश अपनी स्थिति बदल सकता है लेकिन आज की चुनौती उससे कहीं बड़ी है। हमें केवल अभाव से बाहर नहीं निकलना बल्कि उच्च आय वाले और अधिक न्यायपूर्ण समाज की ओर बढऩा है। इसके लिए अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक तेज गति से बढ़ाना होगा। निर्यात बढ़ाना होगा, घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा, निवेश को गति देनी होगी और साथ ही आम नागरिक की आय तथा क्रय शक्ति भी बढ़ानी होगी।


यह काम केवल सरकार नहीं कर सकती। सरकार नीतियां बना सकती है, बुनियादी ढांचा खड़ा कर सकती है और निवेश का वातावरण तैयार कर सकती है। उद्योगों को निवेश करना होगा, उद्यमियों को जोखिम उठाना होगा, वैज्ञानिकों को नई तकनीक विकसित करनी होगी और विश्वविद्यालयों को बेहतर मानव संसाधन तैयार करना होगा। विकसित भारत का दायित्व जितना सरकार का है, उतना ही समाज का भी है। हम अपनी उपलब्धियों पर गर्व करें लेकिन उनसे आत्ममुग्ध न हों। जो काम हुआ है उसे कम करके आंकना गलत है लेकिन जो नहीं हुआ उस पर पर्दा डालना भी सही नहीं है। बड़े लक्ष्य केवल उत्साह से हासिल नहीं होते। उनके लिए आंकड़ों के प्रति ईमानदारी, नीतियों में निरंतरता और गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की क्षमता चाहिए।


हमें तय करना होगा कि 2047 में हम किस तरह का विकसित भारत देखना चाहते हैं।  2047 दूर दिखाई देता है, लेकिन किसी राष्ट्र के लिए बीस वर्ष बहुत लंबा समय नहीं होता। आज जो स्कूल बनेगा, जो उद्योग लगेगा, जो तकनीक विकसित होगी और जो बच्चा आज स्कूल में पढ़ रहा है, वही 2047 का भारत बनाएगा। इसलिए भारत को तेज ऐसा विकास चाहिए जो टिकाऊ हो, रोजगार पैदा करे और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करे। आधुनिक उद्योग चाहिए लेकिन मजबूत कृषि भी। नई तकनीक चाहिए लेकिन ऐसी शिक्षा भी जो उसे समझने और बनाने वाले नागरिक तैयार करे। बड़ी अर्थव्यवस्था चाहिए लेकिन ऐसी अर्थव्यवस्था भी जिसमें सामान्य आदमी की आय और सुरक्षा दोनों बढ़ें। विकसित भारत की कसौटी यह देखना नहीं होगा कि आर्थिक शक्ति कितनी बढ़ी  बल्कि उस शक्ति ने नागरिक के जीवन को कितना बदला। 2047 कोई जादुई तारीख नहीं है, जिस दिन देश अचानक विकसित हो जाएगा। वह आज के फैसलों और प्राथमिकताओं का परिणाम होगा। इसलिए जरूरी है कि लक्ष्य बड़ा हो लेकिन उसकी राह के सवालों से मुंह न मोड़ा जाए; उपलब्धियां गिनाई जाएं लेकिन कमियों को छिपाया न जाए, विकास तेज हो लेकिन उसका लाभ व्यापक हो। ऐसा होने पर ही 2047 का विकसित भारत का सपना एक राजनीतिक संकल्प से ऊपर उठ कर करोड़ों भारतीयों के जीवन का वास्तविक अनुभव बन सकेगा।

प्रो. महेश चंद गुप्ता