समाज

संसार के कोलाहल और द्वंद्व के बीच संतुलन साधने का शाश्वत कृष्ण-सूत्र

उमेश कुमार साहू

भाद्रपद की अंधेरी अष्टमी को कारागार की सलाखों के पीछे जब एक बालक की पहली किलकारी गूंजी थी, तब बाहर घनघोर वर्षा थी और यमुना उफान पर थी। परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा किए बिना प्रतिकूलताओं के सीने पर पैर रखकर अवतरित होना ही श्रीकृष्ण के जीवन का पहला पाठ था।

आज जब हम जन्माष्टमी मनाते हैं, तो प्रायः हमारी दृष्टि मंदिरों की रोशनी, माखन-मिश्री के भोग और पालने में झूलते बाल-गोपाल तक ही सिमट कर रह जाती है। किंतु विचार कीजिए – क्या कृष्ण केवल पूजा-अर्चना के देव हैं? या वे जीवन के हर अंधेरे मोड़ पर रास्ता दिखाने वाले सबसे जीवंत मार्गदर्शक हैं?

श्रीकृष्ण का जीवन कोई एकांगी वैराग्य नहीं, बल्कि संसार के संघर्षों, संबंधों और जिम्मेदारियों के बीच मुस्कुराते हुए जीने की अद्भुत कला है। आज की भागदौड़, अवसाद, रिश्तों के खोखलेपन और अनिश्चितता के युग में कृष्ण के जीवन से निकली ये पाँच बातें हर व्यक्ति के लिए जीवन-संजीवनी हैं :

1. परिणाम की फिक्र छोड़िए, कर्म की गुणवत्ता संभालिए

आज के दौर की सबसे बड़ी बीमारी है – ‘एंजाइटी’ यानी भविष्य की चिंता। हर कोई परिणाम को लेकर इतना डरा हुआ है कि वह वर्तमान में अपना शत-प्रतिशत दे ही नहीं पाता। छात्र परीक्षा के परिणाम से घबराया हुआ है, युवा नौकरी और पदोन्नति की होड़ में हांफ रहा है और कारोबारी कल के मुनाफे की चिंता में आज की नींद गंवा रहा है।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन की मनोदशा भी ऐसी ही थी। सामने खड़े स्वजनों को देखकर अर्जुन का गांडीव हाथ से छूट गया था। तब कृष्ण ने उससे यह नहीं कहा कि “तुम निश्चिंत रहो, विजय तुम्हारी ही होगी।” कृष्ण ने उसे सबसे व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक सत्य समझाया –

“तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। फल की चिंता में अकर्मण्य मत बनो।”

कृष्ण कहते हैं कि जब तक तुम्हारा ध्यान केवल लक्ष्य के ‘फल’ पर रहेगा, तब तक तुम्हारी गति डगमगाती रहेगी। जिस क्षण तुम मन से परिणाम का लालच और असफलता का भय निकाल दोगे, तुम्हारी समूची ऊर्जा कर्म में लग जाएगी। आधुनिक तनाव-प्रबंधन (Stress Management) का इससे बड़ा कोई व्यावहारिक मंत्र नहीं हो सकता।

2. अतीत के आंसुओं को अपराध का बहाना मत बनाइए

हममें से कितने ही लोग जीवन भर इसी शिकायत में घुटते रहते हैं कि “मेरे साथ बचपन में अन्याय हुआ”, “मुझे अवसर नहीं मिला”, “अपनों ने मुझे धोखा दिया।” और इसी कुंठा की आड़ में हम दूसरों के प्रति कड़वे, स्वार्थी या अन्यायी हो जाते हैं।

महाभारत में कर्ण का चरित्र यही आईना दिखाता है। कर्ण सदा यही विलाप करता रहा कि उसे कुल और समाज ने ठुकराया, इसलिए वह दुर्योधन के अधर्म के साथ खड़ा होने को विवश है। किंतु जीवन के अंतिम क्षणों में जब कर्ण धर्म और नीति की दुहाई देता है, तब श्रीकृष्ण उसे झकझोरते हुए पूछते हैं –

“कर्ण! जब भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हो रहा था और तुमने उपहास उड़ाया था, जब निहत्थे बालक अभिमन्यु को छह महारथियों ने घेरा था, तब तुम्हारी नैतिकता कहाँ सो रही थी?”

कृष्ण का जीवन सिखाता है कि चुनौतियां और अपमान किसे नहीं झेलने पड़े? कृष्ण कारागार में जन्मे, जन्मते ही माता-पिता छूटे, बचपन में पूतना से लेकर बकासुर तक कई प्राणघातक हमले झेले, युवावस्था में अपनी ही बसाई मथुरा छोड़नी पड़ी – लेकिन कृष्ण ने कभी अपने अतीत के आंसुओं को अधर्म की ढाल नहीं बनाया। उनका स्पष्ट संदेश है: अन्याय सहने का अर्थ कभी यह नहीं हो सकता कि आप खुद अन्यायी बन जाएं, भाग्य को कोसने के बजाय अपने पुरुषार्थ से अपना भविष्य स्वयं रचिए।

3. बिना किसी स्वार्थ और हैसियत के रिश्ते निभाइए

आज हमारे रिश्ते कितने खोखले हो गए हैं? हम फोन भी उसी का उठाते हैं जिससे कोई काम निकलने की उम्मीद हो। सोशल मीडिया पर सैकड़ों ‘फ्रेंड्स’ होने के बावजूद मनुष्य आज भयंकर अकेलेपन में जी रहा है। ऐसे समय में कृष्ण के दो रिश्ते हमें सच्ची आत्मीयता का पाठ पढ़ाते हैं:

·    सुदामा का आतिथ्य (निःस्वार्थ प्रेम) : जब द्वारकाधीश कृष्ण के राजमहल में फटेहाल और साधनहीन सुदामा पहुंचे, तो कृष्ण ने न उनकी गरीबी देखी, न सामाजिक हैसियत। उन्होंने सिंहासन छोड़ सुदामा को गले से लगाया और अपने आंसुओं से उनके चरण धोए। कृष्ण सिखाते हैं कि संबंध धन, पद और लेन-देन से नहीं, मन की पवित्रता से निभाए जाते हैं।

·    द्रौपदी का संबल (नारी सम्मान की ढाल) : जब भरी सभा में सारे कुलश्रेष्ठ और महाज्ञानी सिर झुकाए बैठे थे, तब केवल कृष्ण द्रौपदी का स्वाभिमान बनकर खड़े हुए। कृष्ण का यह प्रसंग सिखाता है कि संकट के समय केवल सहानुभूति जताना काफी नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध ढाल बनकर खड़े होना ही सच्ची मित्रता है।

4. सिखाने वाला वह, जो सोचने की आजादी दे

आज हमारे परिवारों में, स्कूलों में और दफ्तरों में अक्सर बड़ों या नेतृत्वकर्ताओं की यह जिद होती है कि “जैसा मैंने कहा, आंख मूंदकर वैसा ही करो।” यह सोच इंसान को कठपुतली बनाती है, स्वावलंबी नहीं।

श्रीकृष्ण दुनिया के इकलौते ऐसे मार्गदर्शक हैं, जिन्होंने गीता के 18 अध्यायों में अर्जुन के हर संशय का समाधान किया, किंतु अंत में उस पर अपना निर्णय थोपा नहीं। कृष्ण ने अर्जुन से अंत में कहा :

“विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु”

(अर्थात: मैंने तुम्हें सब समझा दिया, अब तुम अपने विवेक से विचार करो और तुम्हें जो उचित लगे, वही करो।)

यह संवाद हमें सिखाता है कि एक अच्छे अभिभावक, शिक्षक या अधिकारी को हुक्म चलाने वाला नहीं, बल्कि सामने वाले की सोचने की क्षमता को जगाने वाला होना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं सोचकर निर्णय लेता है, तभी वह अपने जीवन की जिम्मेदारी उठाने योग्य बनता है।

5. बंशी और चक्र का संतुलन : यही है संपूर्ण जीवन

श्रीकृष्ण के चरित्र की सबसे अनूठी सुंदरता यह है कि वे किसी एक सांचे में नहीं बंधते। जब वे वृंदावन में होते हैं, तो प्रेम और उल्लास से बंशी बजाते हैं, प्रकृति की गोद में जीते हैं और गोपियों संग रास रचाते हैं। लेकिन जब समाज में कंस और जरासंध जैसे आतताइयों का अत्याचार बढ़ता है, तो वही बंशीधर हाथ में सुदर्शन चक्र उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करते।

कृष्ण सिखाते हैं कि जीवन किसी एकांगी पलायन का नाम नहीं है। न तो आपको दुनिया छोड़कर जंगल भागने की जरूरत है, और न ही दिन-रात केवल तनाव में घुटने की। जीवन का असली आनंद इस बात में है कि आप उत्सव भी पूरे उल्लास से मनाएं और अपने सामाजिक दायित्वों को भी पूरी निष्ठा से निभाएं। कीचड़ में रहकर कमल की तरह निर्लिप्त खिलना ही कृष्ण का असली योग है।

जीवन-सार : हमारे भीतर का कुरुक्षेत्र

महाभारत केवल अतीत का कोई युद्ध नहीं है; हममें से प्रत्येक व्यक्ति रोज सुबह उठकर अपने भीतर एक कुरुक्षेत्र में उतरता है। जहाँ एक तरफ आलस्य, निराशा और स्वार्थ का दल खड़ा होता है, और दूसरी तरफ कर्तव्य, सत्य और संघर्ष।

इस द्वंद्व में जब भी हालात देखकर आपके हाथ से हिम्मत का गांडीव छूटने लगे, तो अपने भीतर बैठे उस मुस्कुराते हुए सारथि की आवाज सुनिए जो कहती है –“उठो, संकोच छोड़ो और अपने हिस्से का युद्ध पूरी निष्ठा से लड़ो।”

जन्माष्टमी की सच्ची बधाई इसी में है कि हम कृष्ण को केवल मंदिरों की दीवारों में न पूजें, बल्कि उनके इन जीवंत सूत्रों को अपने चरित्र में उतारें। तभी हमारे भीतर भी उस योगेश्वर का प्राकट्य होगा जो हर निराशा को उत्सव में और हर संघर्ष को विजय में बदलने का सामर्थ्य रखता है।

उमेश कुमार साहू