लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under विविधा.


दिलपज़ीर अहमद

2जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य से आर्म्‍ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट यानि अफस्पा हटाने या इसमें संशोधन की बात कर फिर से मुद्दे को गर्मा दिया है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें किसी भी प्रकार की बयानबाज़ी से परहेज़ करने वाली सेना भी अपनी चुप्पी तोड़कर विरोध पर उतर आती है। दूसरी ओर राज्य में सक्रिय विभिन्न आतंकी संगठनों के साझा मंच ने अमन की फिज़ा को जब चाहे खराब करने की धमकी देकर अपनी नापाक कोशिश को एक बार फिर से ज़ाहिर कर दिया है। यह धमकी ऐसे वक्त में आई है जब राज्य में हालात धीरे धीरे पटरी पर आने लगे हैं। पर्यटक फिर से धरती के इस स्वर्ग का आनंद लेने के लिए रूख करने लगे हैं। व्यापार गति पकड़ने लगी है। सेना और जनता के बीच अविष्वास की गहरी खाई में कमी आने लगी है। सीमा पार से होने वाले घुसपैठ पहले की अपेक्षा कम हुई है। ऐसे में यह अवष्य कहा जा सकता है कि राज्य में आंतक के खौफ में कमी जरूर हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई है। जबकि इसे जड़ से मिटाने का फार्मूला खुद राज्य की राजनीतिक इच्छाशक्ति में मौजूद है।

राज्य में मिलिटेंटों को जड़ से खत्म करने के लिए सबसे बड़ी आवष्यकता दूर दराज़ विशेषकर सीमा से लगने वाले क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को क्रियान्वित करना है। स्थानीय निवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजगार जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं के साधन उपलब्ध करवाने होंगे। इससे एक तरफ जहां क्षेत्र का विकास संभव होगा वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर मिलिटेंटों को मिलने वाले समर्थन को भी समाप्त किया जा सकता है। लेकिन अभी तक ऐसा संभव नहीं हुआ है। पाकिस्तान की सीमा से लगने वाले राज्य के ऐसे कई इलाके़ हैं जहां आज भी लोगों को अस्पताल और स्कूल जैसी सुविधाओं के अभाव में ही जीना पड़ रहा है। जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र पुंछ जि़ला स्थित सुरनकोट तहसील का हिलकाका भी ऐसा ही एक क्षेत्र है। चारों ओर पहाड़ों से घिरा यह इलाक़ा अधिकतर समय बर्फ की चादर से लिपटा रहता है। हिलकाका के बारे में एक आम हिंदुस्तानी को बहुत कम जानकारी होगी। कुछ दशक पूर्व यह क्षेत्र पाक प्रशिक्षित मिलिटेंटों के लिए कश्‍मीर तक पहुंचने का सुरक्षित शरणस्थली बन चुका था। हिलकाका में उनकी गतिविधियां इतनी मजबूत हो चुकी थी कि सेना को उनके खिलाफ ‘ऑपरेशन सर्पविनाश‘ चलाना पड़ा था। इसे सफल बनाने में स्थानीय निवासियों ने भी प्रमुख भूमिका अदा की थी। दस दिनों तक चले इस अभियान में दर्जनों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस दौरान दोनों ओर से हुई गालीबारी में सैकड़ों मकानों को नुकसान पहुंचा और बड़े पैमाने पर आर्थिक क्षति भी हुई। जिसकी भरपाई के लिए सात करोड़ चालीस लाख रूपये के मुआवज़े का एलान भी किया गया था और लेकिन कुछ ही लोगों को इसका फायदा मिला था। इसके अतिरिक्त प्रशासन ने एक स्वर में हिलकाका के विकास की बात भी कही थी। ऐसा लगा था कि देश के पिछड़े क्षेत्रों में एक हिलकाका का भी विकास होगा।

लेकिन दस वर्ष बीत जाने के बाद भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पुंछ जिला स्थित सुरनकोट ब्लॉक के अंतर्गत हिलकाका आज भी यह बुनियादी आवष्यकताओं की सभी श्रेणियों में पिछड़ा हुआ है। यहां पहुंचने के लिए कोई सड़क संपर्क भी नहीं है। बल्कि पहाड़ों को काट कर अस्थाई मार्ग बनाया गया है। सुरनकोट और ब्फलियाज़ होते हुए मढ़ा और कलाई से इस रास्ते की शुरूआत होती है। जो करीब 30 किमी की दूरी पर स्थित है। इस बीच बीस किलोमीटर के क्षेत्र में कोई इंसानी आबादी नहीं है और पूरा क्षेत्र जंगल है। यदि स्वास्थ्य की बात की जाए तो सरकारी रिकार्ड के अनुसार यहां एक स्वास्थ्य केंद्र चल रहा है लेकिन ज़मीन पर कहां है, इसका पता किसी को भी नहीं है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने के कारण लोगों को प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाता है। जिसका खामियाजा कई बार उन्हें जान देकर चुकाना पड़ा है। अब तक गांव के कई लोग इसकी कमी के कारण मौत के शिकार हो चुके हैं। बर्फबारी और बारिश के दिनों में यहां की टूटी फूटी सड़क का हाल और भी खस्ता हो जाता है। गांव के नम्बरदार आशिक हुसैन के अनुसार ‘ऑपरेशन सर्पविनाश के दौरान विस्थापन के बावजूद हिलकाका में इस समय 90 से अधिक परिवार आबाद हैं। ऐसे में अस्पताल का नहीं होना एक प्रमुख और प्रथम आवश्यिकता बन चुकी है।‘

हालांकि इस समय केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद इसी राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इसी वर्ष जम्मू-कश्मीसर को स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्धि के लिए अवार्ड दिया गया है। इसके बावजूद यहां के लोगों को इसी सुविधा से वंचित रहना पड़ता है। सबसे अधिक कठिनाई नवजात बच्चे और गर्भवती महिलाओं को होती है। जिन्हें समय पर उपचार नहीं मिल पाता है। आशिक हुसैन बताते हैं कि प्रसव के समय गर्भवती महिला को 20 किमी दूर ब्फलियाज़ लाया जाता है। जिसका आधा रास्ता पहाड़ को काट कर बनाए गए अस्थाई संकरी रास्ते से पैदल ही तय करना होता है। जिसे बारिश और बर्फबारी के दौरान पार करना अत्याधिक कठिन हो जाता है। ऐसे में कई बार महिला और जन्म लेने वाले नवजात की रास्ते में ही मौत हो जाती है। पिछले वर्ष रजि़या बेगम नाम की एक गर्भवती महिला की इसी कारण मौत हो गई थी। स्थानीय निवासियों के अनुसार भारी बर्फबारी के बीच उसे खाट से बांध कर ब्फलियाज़ ले जाया गया लेकिन अत्याधिक तकलीफ और प्राथमिक उपचार नहीं मिलने के कारण रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। कुछ ऐसी ही स्थिती यहां के शिक्षा व्यवस्था की है। हाल यह है कि यहां एक कमरे में पूरी स्कूल चलती है। जबकि देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए तीन वर्ष हो चुके हैं और सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था सुधरी है। पिछले कुछ महीनों में देखा जाए तो इक्कादुक्का वारदात को छोड़ कर राज्य में कोई बड़ी आंतकी घटना नहीं हुई है। लेकिन ऐसे संगठन अब भी अवसरों की तलाश में हैं जिससे कि राज्य की जनता की भावनाओं को भड़काया जा सके। यदि उपेक्षा का यही आलम रहा तो मिलिटेंटों की इस क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ते देर नहीं लगेगी। यदि इसे रोकना है तो वास्तव में यहां विकास का काम कागज से निकलकर धरातल पर दिखना चाहिए। (चरखा फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *