शख्सियत समाज

देवकीनन्दन खत्री थे हिन्दी के पहले तिलिस्मी लेखक 

मोहन मंगलम

बाबू देवकीनन्दन खत्री एक दूरदर्शी लेखक थे। अपनी अद्भुत कल्पना और सरल लेखन शैली से उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा दी। भारतीय जनमानस की कल्पना को उन्होंने तिलिस्म और ऐयारी के माध्यम से साकार रूप दिया और हिन्दी को एक लोकप्रिय भाषा के रूप में स्थापित किया। हिन्दी के औपन्यासिक क्षेत्र का उन्होंने आरंभ ही नहीं किया, उसमें बहुत ही उच्च और अनुपम स्थान भी प्राप्त कर लिया था।  

देवकीनन्दन का जन्म जून 1861 में बिहार के मौजूदा समस्तीपुर जिले के मालीनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला ईश्वरदास था। उनके पूर्वज पंजाब के निवासी थे तथा मुगलों के शासनकाल में उच्च पदों पर कार्य करते थे। देवकीनन्दन खत्री की प्रारम्भिक शिक्षा हिन्दी और संस्कृत में हुई। अठारह वर्ष की अवस्था में, जब वे गया स्थित टिकारी राज्य से सम्बद्ध अपने पिता के व्यवसाय में स्वतंत्र रूप से हाथ बंटाने लगे तो उन्होंने फारसी और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। इन भाषाओं का ज्ञान बाद में चलकर उनकी लेखन शैली को समृद्ध करने में सहायक सिद्ध हुआ।

देवकीनन्दन खत्री स्वभाव से मस्तमौला, यारबाश और शक्ति के उपासक थे। सैर-सपाटे, पतंगबाजी और शतरंज के बेहद शौकीन। बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन खंडहरों से गहरा आत्मीय लगाव रखने वाले। रोमांचप्रेमी, अद्भुत स्मरण-शक्ति और उर्वर, कल्पनाशील मस्तिष्क के धनी। 24 वर्ष की आयु में व्यवसाय सम्बन्धी उलट-फेर के कारण वे काशी आ गए और काशी नरेश के कृपापात्र बन गए। काशी नरेश की बदौलत ही वे चकिया और नौगढ़ के जंगलों का ठेका पा गए। इस ठेकेदारी के काम से उन्हें पर्याप्त आय होने के साथ ही साथ उनका सैर-सपाटे का शौक भी पूरा होता रहा। वे लगातार कई-कई दिनों तक चकिया एवं नौगढ़ के बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की खाक छानते रहते थे। इन्हीं जंगलों और खंडहरों से देवकीनन्दन खत्री को लिखने की प्रेरणा मिली। कालान्तर में जब उनसे जंगलों के ठेके छिन गये, तब इन्हीं जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की पृष्ठभूमि में तिलिस्म तथा ऐयारी के कारनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने ‘चन्द्रकान्ता’ उपन्यास की रचना की।  

हिन्दी के पहले तिलिस्मी लेखकबाबू देवकीनन्दन खत्री ने जिस दौर में ‘चन्द्रकान्ता’ उपन्यास लिखना शुरू किया था, उस जमाने में अधिकतर लोग उर्दू भाषा भाषी ही थे। ऐसे में खत्री का मुख्य लक्ष्य ऐसी कृति की रचना करना था जिससे देवनागरी हिन्दी का व्यापक प्रचार-प्रसार हो। ‘चंद्रकान्ता’ का प्रकाशन सन 1888 में हुआ था और इसने हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्वयं को मील का पत्थर साबित कर दिया। इस उपन्यास में तिलिस्मी किले, रहस्यमयी सुरंगें, रूप बदलने वाले जासूस (ऐयार), प्रेम, धोखा, युद्ध और चतुराई की कहानियों को इस तरह पिरोया गया कि पाठक इसकी दुनिया में खो जाते थे। देवकीनन्दन खत्री की कलम के जादू की लोकप्रियता का आलम यह था कि गांवों में ‘चंद्रकान्ता’ उपन्‍यास के सार्वजनिक पाठ किए जाते थे। जो लोग हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे या अन्य भाषाएं जानते थे, उन्होंने केवल ‘चंद्रकान्ता’ उपन्यास को पढ़ने के लिए हिन्दी सीखी। इस उपन्यास ने हिन्दी को केवल विद्वानों की भाषा से निकालकर आम जनता की भाषा बना दिया। इस तरह हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में ‘चंद्रकान्ता’ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। 

‘चंद्रकान्ता’ से उत्साहित होकर तथा इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए बाबू देवकीनन्दन खत्री ने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए चौबीस भागों वाला दूसरा विशाल उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ लिखा जो ‘चन्द्रकान्ता’ की अपेक्षा कई गुणा रोचक था। इन उपन्यासों को पढ़ते वक्त लोग खाना-पीना भी भूल जाते थे। दस वर्षों में ही अपार कीर्ति और यश प्राप्त कर चुकने और अपनी रचनाओं का इतना अधिक प्रचार देखने के बाद सन 1898 ई में उन्होंने अपने प्रेस की स्थापना की। चूंकि वे स्वभावत: बहुत ही ‘लहरी’ अर्थात् मनमौजी और विनोदप्रिय थे। इसीलिए उन्होंने अपने प्रेस का नाम ‘लहरी प्रेस’ रखा था। खत्री ने उपरोक्त दोनों कृतियों ‘चंद्रकांता’ और ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ के अलावा ‘अनूठी बेगम’, ‘काजर की कोठरी’, ‘नरेंद्र-मोहिनी’, ‘कुसुम कुमारी’, ‘वीरेंद्र वीर उर्फ कटोरा भर खून’, ‘गुप्त गोदना’, ‘भूतनाथ’ जैसी रचनाएं भी लिखीं। ‘भूतनाथ’ को उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने पूरा किया था। देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों में कई ऐय्यारों और पात्रों के जो नाम आए हैं, वे सब उन्होंने अपनी मित्रमंडली में से ही चुने थे और इस प्रकार अपने अनेक घनिष्ठ मित्रों और संगी-साथियों को अपनी रचनाओं के द्वारा अमर बना दिया। 

देवकीनन्दन खत्री का हिन्दी साहित्य पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा। उन्होंने हिन्दी उपन्यास विधा को एक नई पहचान और लोकप्रियता दी। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरल और सहज भाषा थी। वे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के बजाय बोलचाल की भाषा का उपयोग करते थे, जो आम पाठकों को आसानी से समझ में आती थी। उनकी शैली में हास्य, व्यंग्य, तर्क और भावनाओं का सुंदर मिश्रण था, जो कहानियों को और भी रोचक बनाता था। उनके संवादों में एक प्रवाह था जो पात्रों को जीवंत कर देता था। दुर्भाग्यवश बाबू देवकीनन्दन खत्री ने अधिक आयु नहीं पाई और जीवन का अर्द्धशतक पूरा करने के कुछ ही महीनों बाद 1 अगस्त, 1913 को परलोकवासी हो गए मगर उनका रचना संसार आज भी साहित्यप्रेमियों को आनंदित कर रहा है। 


मोहन मंगलम