लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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diabetesडा अरुण चन्दन

भारत के जिस ज्ञान का डंका पूरी दुनियां में बजता है वह सारा ज्ञान हमारे शास्त्रों, ग्रंथों से ही तो प्रसारित हुआ है. उठाइए भारत सरकर के अनुसन्धान संसथानों के शोध कार्यों के पेटेंट का डाटाबेस, अनुसन्धान के कामों को देख कर लगता है की हर जगह लोगों के ज्ञान, सूझबूझ की चोरी होती है या शास्त्रों के ज्ञान को तोड़ मरोड़ कर शोध कार्यों को अमलीजामा पहनाया जाता है. फिर नीम के पेटेंट की लड़ाई हो या फिर हल्दी के ज्ञान की चोरी का किस्सा। लेकिन आम आदमी को इस सब बातों से क्या लेना देना उसे तो आज के युग में बीमारी से ठीक होने का मतलब है ज्ञान का स्रोत कोई भी हो. बौधिक सम्पदा अधिकारों का मकडजाल इतना गंभीर है, देश के ज्ञान को लुप्त प्राय: होने के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है। हमारे देश देश में ऐसे ज्ञान के भण्डार हैं लेकिन अभी तक इस ज्ञान को केवल अवैज्ञानिक समझ कर नजरअंदाज किया जा रहा है।

आजकल हर घर में डायबिटीस याने मधुमेह याने शूगर के रोगी आमतौर पर मिलने लग गये है. शास्त्रों का कथन है मधुमेह से राहत संभव है यदि यदि कुछ ख़ास रोटी का सेवन किया जाये. दूध, दही से पूरा हो परहेज हो , न ज्यादा सोना न लेटना न ही ज्यादा बैठना। दो समय 125 मिलीग्राम अभ्रक भस्म का शहद के साथ सेवन किया जाये और रात को सोते समय 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण सादे जल के साथ सेवन किया जाये चैत्र से भाद्रपद महीने तक जौ की रोटी और आश्विन महीने से फाल्गुन मास तक बाजरे की रोटी ही खाएं, मूंग की दाल, मेथी की सब्जी, पालक, बथुआ और चोलाई का साग का श्रध्दापूर्वक सेवन किया जाये तो मधुमेह से राहत की सम्भावना है। हमारे धर्मशास्त्रों में इसे अनियमित और स्वछन्द यौनाचार के कारण उत्पन्न हुआ भी मानते हैं जिस का उपाय इस कर्मों का प्रायश्चित करना कहा गया है। लिहाज इस रोग के होने के तो अनेकों कारण हैं फिर भी यदि शास्त्रों के सूत्र हमें नैतिकता के साथ कुदरत के पास रहने को प्रेरित करें और मनुष्य उन का पालन करके स्वस्थ्य लाभ कर सके तो क्या बात है।

 

2 Responses to “मधुमेह से राहत दिलाये-जौ, बाजरा की रोटी”

  1. mahendra gupta

    पर शास्त्रों में लिखी बातें लोगों को दकियानूसी लगती हैं,आयुर्वेद सदियों से इन वर्णित चीजों का इस्तेमाल करता आया है ,ऐसा तो है नहीं की यह कोई नयी बीमारी है,पहले भी यह मर्ज लोगों को होता था,पर विलासी जीवन जीने वालों को.और वे ठीक भी होते थे इस उपचार से .आज भी कुछ लोग इसका प्रयोग कर रहें हैं,पर पाश्चात्य देशो की खोज पर और उन्हें ज्यादा विश्वशनीय समझने के कारण हम इस और देखते ही नहीं जब की यह सर्वसुलभ कम खर्च वाली पद्धति है.
    .आप द्वारा दी गयी जानकारी बहुत ही लाभकारी है,शुक्रिया.

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  2. मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

    MANOJ MAUN

    लेख अति उत्तम है प्रयास अच्छा है
    धन्यवाद

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