लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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डॉ. विनायक सेन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गए हैं। गौरतलब है कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. सेन को रायपुर जिला एवं सेशन न्‍यायालय के न्‍यायाधीश बीपी वर्मा ने 24 दिसंबर को देशद्रोह और साजिश रचने का दोषी करार दिया। न्‍यायालय ने डा. सेन के साथ ही प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) पोलित ब्‍यूरो के सदस्‍य नारायण सान्याल व पीजूष गुहा को उम्रकैद की सजा सुनाई। तीनों पर यह आरोप सिद्ध हुआ कि उन्होंने राज्य के खिलाफ षड्यंत्र किया था। आईपीसी की धारा 124 ए के तहत राज्य के खिलाफ षड्यंत्र करने का आरोप लगा। छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम की धारा 1, 2, 3 व 5 के तहत डा. सेन को दोषी करार दिया गया। राज्य के खिलाफ गतिविधियों के तहत धारा 39-2 के तहत भी उन्हें दोषी करार दिया गया।

डॉ. विनायक सेन के विरोध में

• न्‍यायाधीश बीपी वर्मा ने डॉ. सेन को देश के खिलाफ युद्ध छे़डने, लोगों को भ़डकाने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए काम करने को दोषी करार दिया। उन्‍होंने अपने फैसले में लिखा कि आरोपी नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को बढ़ावा देकर शहरों में हिंसक वारदात करवाना चाहते थे।

• फैसले में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नारायण सान्याल नक्सली माओवादियों की सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य है, वह बिनायक सेन व पीजूष गुहा के माध्यम से जेल में रहकर ही शहरी क्षेत्रों में हिंसक वारदातों को अंजाम देने की कोशिश में था। पुलिस को जब यह पता चला तो सबसे पहले शहर में बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में होटल, लाज, धर्मशाला व ढाबों पर दबिश दी गई। दबिश के कारण ही पीजूष गुहा पुलिस के हत्थे चढ़ा।

• यह भी पाया गया है कि बिनायक सेन नारायण सान्याल के पत्र पीजूष गुहा को गोपनीय कोड के माध्यम से प्रेषित किया करता था। तीनों अभियुक्तों की मंशा नक्सलियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन सलवा जुड़ूम को समाप्त करने की भी थी।

• डा. बिनायक सेन के मकान की तलाशी में नारायण सान्याल का लिखा पत्र, सेंट्रल जेल बिलासपुर में बंद नक्सली कमांडर मदन बरकड़े का डा. सेन को कामरेड के नाम से संबोधित किया पत्र व 8 सीडी जिसमें सलवा जुडूम की क्लीपिंग व नारायणपुर के गांवों में डा. सेन के द्वारा गांव वासियों व महिलाओं के मध्य बातचीत के अंश मिले हैं।

• डॉ. सेन ने 17 महीनों के दौरान माओवादी नेता सान्याल से 33 मुलाकातें कीं।

पक्ष में

• डॉक्टर विनायक सेन ने आदिवासी बहुल इलाके छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच काम करने की शुरुआत स्वर्गीय शंकर गुहा नियोगी के साथ की थी। पेशे से बाल चिकित्सक सेन ने वहां मजदूरों के लिए बनाए शहीद अस्पताल में लोगों का इलाज करना शुरू कर दिया। साथ ही छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में सस्ते इलाज के लिए योजनाएं बनाने की भी उन्होंने शुरुआत की।

• पीयूसीएल के उपाध्यक्ष के तौर पर उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौतों और कुपोषण का सवाल उठाया। उनका सबसे बड़ा अपराध सरकार की निगाहों में यह माना गया कि उन्होंने सलवा जुडुम को आदिवासियों के खिलाफ बताया था। राज्य की भाजपा सरकार द्वारा चलाए गए इस आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल खड़े किए थे। भाजपा ने जब 2005 में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम लागू किया तो विनायक सेन ने इसका कड़ा विरोध किया था। और इसी कानून के तहत सेन को छत्तीसगढ़ सरकार ने 2007 में गिरफ्तार किया।

• एक डाक्टर एवं एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में समाज के दबे-कुचले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम किया।

• सेन कभी हिंसा में शामिल नहीं रहे या किसी को हिंसा के लिए नहीं उकसाया।

• देशद्रोह का अपराध तभी साबित होता है, जब राज्य के खिलाफ बगावत फैलाने का असर सीधे तौर पर हिंसा और कानून-व्यवस्था के गंभीर उल्लंघन के रूप में सामने आए।

• इससे कम कुछ भी किया गया या कहा गया, देशद्रोह नहीं माना जा सकता। सेशन कोर्ट के फैसले में डॉ. सेन को लेकर यह तय नहीं हो पाया कि उन्होंने आखिर ऐसा क्या किया, जिससे राज्य में हिंसा और कानून-व्यवस्था का खतरा पैदा हो गया।

• डॉ. विनायक सेन के समर्थन में पूरी दुनिया में आवाजें उठ रही है। मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने डॉ. सेन को अपना समर्थन दिया। अमेरिका में उन्‍हें भारी समर्थन मिल रहा है। वहां के भारतीय मूल के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। भारत में भी वाम झुकाव वाले बुद्धिजीवी उनके पक्ष में सड़कों पर उतर रहे हैं। हालांकि देश की दो प्रमुख राष्‍ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर चुप्‍पी साधी हुई है।

रायपुर जिला एवं सेशन न्‍यायालय द्वारा डॉ. विनायक सेन को प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए काम करने के आधार पर उन्‍हें देशद्रोह व साजिश रचने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने पर आप क्‍या कहेंगे ? इस बार ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ के परिचर्चा का विषय यही है कि ‘क्या विनायक सेन देशद्रोही हैं?’

44 Responses to “परिचर्चा : क्या डॉ. विनायक सेन देशद्रोही हैं?”

  1. santosh

    बहस में पड़ना अच्छी बात है परन्तु हमें यह भी नही भुलना चाहिए की कानून अपना काम करे. यही लोकतंत्र की विजय होगी. अपने सुविधानुसार किसी को दोषी या दोषमुक्त करना अच्छी बात नहीं होगी.

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  2. Ajay Dange

    आप ने लेख की शुरुआत इस वाक्य से की है की डॉ. सेन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गए हैं. मै समझ नहीं पा रहा हूँ की पूरी दुनिया से आप का मतलब क्या है. क्या आप कुछ मानवाधिकार की बात कने वालो को, या हिंसा के समर्थको को, या न्यायलय के आदेश के विरूध्ह सार्वजनिक बयानबाजी करने वालो को या भारत को न समझने वाले अमरीकी संगठनों को पूरी दुनिया कह रहे हैं. बेचारे पिजुश गुहा, बेचारे नारायण सान्याल और बेचारे डॉ. सेन. पूरी दुनिया का समर्थन पा कर भी जेल में हैं. शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सेन बीमार नारायण सान्याल के इलाज के लिए बार बार जेल में मिलने जा रहे थे. क्या शासन या जेल प्रशासन ने बीमार नारायण सान्याल के इलाज के कोई व्यवस्था नहीं की थी. अरे भाई जो कर्म किये है उनका भोग मिल रहा है अब बेकार क्रंदन करने से कोई लाभ नहीं होगा. जो निर्दोष आप के नक्सलियों ने मरे है उनके परिजनों की हाय तो लगेगी ही.

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  3. Ravindra Nath

    माननीय सीताराम तिवारी जी रामजेठमलानी ने तो इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस भी लडा था, मनु शर्मा क केस भी लड रहे थे, यह तो द्वीतीय विश्व युद्ध के समय इनको मौका नही मिला नही तो हिटलर का केस भी लड लेते, इनका क्या है, भगवान ने बहुत पैसा दे रखा है, बस नाम के लिए कुछ करने की चाहत मे जूझ रहे हैं बुढापे में, अच्छे काम करने वालों को कितने जानते हैं, जानते होते तो रामजेठमलानी से ज्यादा नाम बाबा आम्टे का होता।

    अब यह तो समझने वाले की बुद्धि पर है कि वो सच को समझता है या वामपंथी चश्मा चढा कर रंगीन दुनिया देखता है।

    संपादक महोदय दिनेशराय जी से सहमत – प्रवक्ता मंच एक जागरूक लोगो का मंच माना जाता है, हमे अपना विवेक भी प्रयोग करना चाहिए, अगर समाचार पत्रों मे गलत छपा भी है तो हमे सही करने का सिर्फ अधिकार ही नही है अपितु यह हमारा कर्तव्य भी है।

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  4. Binod Kumar Lal

    न्यायालय के बहार जीस तरह विनायक सेन पक्ष में तर्क दे रहें हैं और हो हॉलला कर रहें हैं वही तर्क आप न्यायालय में क्यों नहीं दिया. और अभी आप उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय पास जा सकते हैं.
    लेकीन आपको जो लेकिन हाय रे तथाकथित मानवाधिकारवादी लोग आप तो देश-विदेश में मीडीया टरायल करेंगे. विदेश में भारत का जमकर गाली दो थैली भर कर फंड लो.
    इस से तो यही लगता है आप की मानवाधिकार देशद्रोही या आतंकवादी की िलए है.

    वेचारे आम आदमी!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  5. bhagat singh

    agar binayak desh drohi hain to bharat me koi desh bhakt nahi ho sakta.binayak ko fansi dene ki bat, vallh aaplko bhi desh yad rakhega,.sansad par hamle me prof.gilani ko fansi ki saja di thi aur supreem court ne unhe ba ijjat riha kar diya.ab bataye ki jo pahle unhe gaddar kahte nahi thakte the ve sab ab kahan hain.
    mitro sarkare itihas se sabak nahi leti.ye vahi kanoon hain jo mahatma gandhi aur bhagat singh ke khilaf istemal kiya gaqya tha.naslvadiyo me mande3la ko jaIL bheja,sang suu key ko tanashaho ne jail bhreja aur duniya ki sabse bade loktantra ne binayak ko jail bheja.

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  6. दीपा शर्मा

    आपके मेल करने का धन्यवाद .. संपादक महोदय,
    स्वस्थ बहस ही लोकतंत्र का प्राण होती है। यहां आप समसामयिक प्रश्‍नों पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। …….
    आपका ये कथन याद रखना, क्योंकि जब यहाँ जवाब नहीं होगा, तो मेल आई डी और आई पी एड्रेस सार्वजनिक कर दिए जाते हैं .. उस पर एक और तुर्रा ..की अलग अलग देशो से टिपण्णी? …. अगर कोई छुपी शर्त है तो बता दीजिये …. क्योंकि आप बेहतर समझ सकते हैं …

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  7. दिनेशराय द्विवेदी

    आप ने मेरी आपत्ति का प्रतिवाद यह किया है कि यह आलेख आपने कतिपय समाचार पत्रों के समाचार के आधार पर तैयार किया है जिन में राजद्रोह का नहीं देशद्रोह शब्द का प्रयोग किया है। जहाँ तक मैं ने देखा है भास्कर ने तो राजद्रोह शब्द का ही प्रयोग किया है। फिर इस का अर्थ यह है कि समाचार पत्र यदि गलती करेंगे तो आप भी उस गलती को दोहराएंगे। यदि गलती का पता लगता है तो उसे ठीक किया जाना चाहिए। अन्यथा यही समझा जाएगा कि इस गलती को दोहराने में आप की टीम की व्यक्तिगत रुचि है।

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  8. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    भाजपा सांसद {राज्य सभा सदस्य}श्री राम जेठमलानी जी ने २८दिसंबर को दिल्ली में कहा है की ” विनायक सेन
    राष्ट्रद्रोही नहीं हैं ,मैं उनका मुक़द्दमा मुफ़्त मैं लडूँगा ,मुझे फक्र होगा की मैं विनायक सेन जैसे महान व्यक्ति के कुच्छ काम आ सकूँगा .
    कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय सिंग अभिषेक मनु सिंघवी ओर प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन ने डाक्टर विनायक सेन के पक्ष में अपील जारी की है अब प्रवक्ता .कॉम में बहस करने से कोर्ट की नज़ीर तो बदलने से रही .वर्तमान उपलब्ध क़ानून में ऐसी कोई धारा नहीं जिसका
    उलंघन हम में से किसी ने कभी ना किया हो .इस नाते की नक्सलवादियों को हथियार डालने ओर सरकार से आदीवासी क्षेत्रों
    में विकाश की अपील के अलावा विनायक सेन ने क्या अपराध किए वे तो अदालत जाने किंतु यह त्हई की यदि विनायक सेन
    अपराधी हैं तो हम सब भी अपने गिरेवान में झाँकर देखे की ह्म कितने दूध के धुले हैं .

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  9. RAJ SINH

    साफ है की इस परिचर्चा में देशद्रोही और देशप्रेमी पहचाने जा रहे हैं .मैं देश के साथ हूँ.विनायक को फाँसी मिलनी चहिये.छत्तीसगढ़ की सरकार को विनायक को कम सजा देने के खिलाफ अपील करनी चाहिए .देश जान ले की मानवाधिकार की आड़ में भारत के खिलाफ एक सोची समझी योजनाबद्ध अंतरराष्ट्रिय साजिश चल रही है और गद्दार देश के अलग अलग मुखौटों में उसमे शामिल हैं .उनकी पहचान भी कई टिप्पनिओं में आ गयी है .

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  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    किं करोति एव पाण्डित्यम्, अस्थाने विनियोजितम्‌ ?
    अन्धकार प्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः॥
    ॥पंच तन्त्र॥
    क्या करेगी, पण्डिताई भी ?
    (अस्थाने) अनुचित स्थान लगी हुई? ॥
    (जैसे) अंधेरे भरे, घडे पर, दीपक,
    अंधेरा कैसे दूर करें?॥

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  11. Hari Paswan

    गणतांत्रिक भारत से कई लोग का आशय यह है की ऐसा भारत जहा गण (Gun) का तंत्र चले. विनायक जैसे लोग बन्दुक की सर्वोच्चता के लिए ही तो काम कर रहे है.

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  12. Hari Paswan

    @GOPI KANTA GHOSH
    गणतांत्रिक भारत यानी ऐसा भारत जहा गण (Gun) का तंत्र चले. आपने ठीक ही कहा की विनायक जैसे लोग बन्दुक की सर्वोच्चता के लिए काम कर रहे है.

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  13. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    शायद आपको मालूम हो कि मार्क्र्सवादी और नक्सली पुरुष भी गर्भधारण कर लेते है ! पैदा होने के बाद शिशु नक्सली कैसा होगा श्रीमती एलीना सेन शायद यही पता करने बार-बार जेल जाती होंगी. ये विनायक सेन नायक नही खलनायक है. देशद्रोहियो और खलनायको के साथ उनके समर्थको का दमन और सर्वनाश भी होना चाहिये, तभी कुछ बात बनेगी. लेकिन इस राजसत्ता का क्या करे जो बार-बार अपनी कमजोरी दिखाती है. लेकिन एक अच्छी बात यह हो रही है कि देश दो खेमे – देशभक्तो और देशद्रोहियो और उनके समर्थको मे बंट रहा है.

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  14. Jay Singh Rawat

    बन्धुओ,

    हो सकता है कि सेन साहब देशद्रोही न हों। मगर मैं सेन साहब के उन अन्ध समर्थकों को याद दिलाना चाहता हॅं कि हमारी अपराधिक न्याय व्यवस्था या क्रिमिनल जस्टिस स्स्टिम की मूल भावना यह है कि भले ही कोई अपराधी बरी हो जाय मगर किसी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिये। हमारे मित्रों को यह भी याद रखना चाहिये कि संदेह का लाभ उठा कर कई मुल्जिम अदालत से बरी हो जाते हैं। इसका मतलब साफ है कि अदालत भी तब तक सजा नहीं दे सकती जब तक कि उसे पक्का विश्वास न हो जाय कि मल्जिम सचमुच अपराधी है। इसी व्यवस्था के कारण अक्सर अपराधी छूट जाते हैं। फिर विनायक सेन साहब के बारे में न्याय पर इतनी उंगलियां क्यों उठ रही हैं, यह समझ से परे है।

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  15. आर. सिंह

    R.Singh

    निचली अदालत ने सजा दी है.अतः यह अंतिम नहीं है.हमलोग अपना फैसला सुनाने के पहले उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का भी फैसला सुन ले.फिर टिपण्णी करना ज्यादा अच्छा रहेगा.ऐसे विनायक सेन का गरीबों की सेवा करना कोई अपराध नहीं है,पर अगर इसकी आड़ में वे कुछ और कर रहे थे तो वह अपराध हो सकता है.पर इंतज़ार तो कर लिया जाये. देखे उच्च न्यायालयऔर उच्चतम न्यायालय क्या फैसला देते हैं?

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  16. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सुरेश जी ने विषय को सही दृष्टी से देखा है.ये दोहरे मापदंड बतला रहे हैं की इस मुद्दे को उछालने के पीछे भी कोई शरारती सोच छुपी है. ये समझने की आदत तो डालनी पड़ेगी.

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  17. Nand Kashyap

    देश के मेहनतकश लोगो के हिस्से को अपने निजी हित साधने वाले भ्रष्ट लोगों को आज तक किस अदालत ने सजा दिया है .इन्ही भ्रष्ट लोगों के कारन देश में भीषण गरीबी है उनके लिए छोटी सी भी आवाज़ उठाने वाला देशद्रोही नहीं है हाँ वह परजीवी सत्ताधारी वर्ग का दुश्मन नंबर एक होगा और उसे कोई भी सजा हो सकती है ,इसलिए विनायक सेन को हुयी सजा से आश्चर्य नहीं हुआ परन्तु विनायक सेन देशद्रोही नहीं हैं

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  18. A.K.SHARMA

    इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है कि माओवादी देश द्रोही तत्व हैं जो हिंसा के मार्ग पर चलते हुए न केवल निर्दोष लोगों की हत्या करते हैं अपितु बड़े कठिन परिश्रम से बनी राष्ट्रिय सम्पति को नष्ट भी करते हैं.इस लिहाज़ से जो,कोई भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उन का समर्थन करे गा तो वोह भी देशद्रोही ही माना जाएगा इस लिए बिनायक सेन भी देशद्रोही ही हैं..इसी लिहाज़ से जो तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ अथवा स्वयंभू मानवाधिकारों के ‘रक्षक’ बिनायक सेन के समर्थन में चिल्ला चिल्ली कर रहे हैं वो भी देशद्रोही ही माने जाने चाहिए. और दुनिया भर में देशद्रोहियों की एक ही सजा है.और वो है =सजा-य-मौत .

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  19. sadhak ummedsingh baid

    क्या सरकार ही desh है? बाहर बस विद्रोही?
    इन परिभाषाओं ने किया, हमको भी विद्रोही.
    हम भी हैं विद्रोही, जेल में हमें बिठा दो.
    मुफ्त मिलेगा भोजन, महंगाई से बचा लो.
    कह साधक किस-किस को कहोगे अब विद्रोही?
    desh भक्त केवल वे, चला रहे सरकार ही.

    कैसे हम कह दें भला डाक्टर सेन की बात?
    कैसी उनकी सोच है, क्या हैं उनके kaam?

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  20. Nagendra Pathak

    क्या विनायक सेन के नाम पर मओवादिओं और उनके समर्थकों को उचित ठहराया जा सकता है? हो सकता है श्री सेन स्थानीय लोगों के लिए मसीहा की तरह अवतरित हुए हों , परन्तु देश सदा से व्यक्ति से ऊपर रहा है और होना भी चाहिए | तिब्बत के सर्नर्थिओन से एक बार पूछें देश उनकी मनो दशा कैसी है | माओवाद को जायज ठहराने वाले चाहे तो वास्तु स्थिति से वाकिफ नहीं हैं या फिर किसी न किसी प्रकार माओवाद के माध्यम से फायदा उठा रहे हैं | माओवाद को जहां तक मैंने देखा और समझा है उसके अनुसार माओवाद न तो सामाजिक समस्या है और न हीं जन जागरण अभियान , यह तो केवल बन्दुक के बल पर शक्ति प्राप्त कर अपना बर्चस्व कायम करना है | यदि श्री सेन सामाजिक कार्यों से जुड़े थे तो यह काम बिना माओवाद के समर्थन के भी तो हो सकता था | जो भी संस्था आतंरिक या बाह्य गतिबिधियों देश को कमजोर करता हो उसे देशद्रोही कहने और दण्डित करने में क्या बुराई है ? चाहे वह कोई भी हो |

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  21. Hari Paswan

    अब तुम ज़रा सोचो
    यदि अचानक वह सारे लोग
    तुम्हारी दृष्टी पटल पर आ जाए
    जो खुद को किसी सम्माजनक पेशे
    से आबद्ध रखते हुए
    माओवादी हिंसा की वकालत
    करा रहे है
    तो एक नया
    एंगल उपलब्ध होगा
    जानने के लिए की उनका निर्देशक
    कौन है.

    वह कितनी अवधी तक
    रहेगा छुपा
    अपने फैलाए
    भ्रम के कोहरे में

    उनकी मिलीभगत
    यदि देशद्रोह के लिए
    है तो फिर
    देश को इंसाफ कब मिलेगा ???

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  22. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    ॥ जो दिखता है, वह सच यह मान कर ना चलें॥
    किसी को दोषी या निर्दोष, के अतिरिक्त एक बीच वाला “उदासीन” मत हो सकता है। मेरा मत उसी प्रकारका बनता जा रहा है।
    जानता हूं, कि, जितनी NGO संस्थाएं, भारतमें चलती है, उसमें से कुछ (१) मानवाधिकार (२) पर्यावरण (३) रूग्ण सेवा (४) शिक्षा (५) रिलिजन (६) पीडितों के हित —इत्यादि मुखौटे लेकर ही काम कर रही है।
    उद्देश है, भारत को अंदर से खोखला करना। बहुत बार सज्जन भी उसके लक्ष्य और बलि चढ सकते हैं। लेखकों से स्तंभ लिखवा लेना भी, और सासंदों को प्रभावित करना, इत्यादि भी उनकी यंत्रणा में आता है।
    अंतर्राष्ट्रीय राज नीति बहुत कुशलता से काम करती-करवाती है।(क) नाम एक लेंगे,(ख) जो किसी और पक्ष को बदनामी देनेवाला,(ग) धन कहींसे भी आ जाता है।
    धन कौन दे रहा है? इसका छोर ढूंढने पर ही आप जान पाएंगे, कि इस षड‌ यंत्र के पीछे कौन है।

    Reply
  23. jeengar durga shankar gahlot

    हमारी सोच में डा. विनायक सेन देशद्रोही नहीं है. फिर, सोच सबकी अलग-अलग है, जिनमे कुछ की अपनी प्रतिबद्ताए भी संभव है. इसलिए दूसरों के विचारों पर टीका-टिपण्णी उचित नहीं है. धन्यवाद.

    – जीनगर दुर्गा शंकर गहलोत, कोटा (राज.) ; ०९८८७२-३२७८६

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  24. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कह सकता पर जहाँ तक अभी तक का सवाल है तो विनायक सेन दोषी ही पाए जाते हैं| साथ ही चिपलूनकर जी से पूर्णत: सहमत हूँ कि यह मानवाधिकार हमेशा एक तरफ़ा क्यों होता है? कश्मीर के आतंकवादियों को हमेशा भटके हुए नौजवान तथा नक्सलवादियों या माओवादियों को हमेशा पीड़ित और शोषित आदिवासी ही कहा जाता है, किन्तु संघ पर हमेशा हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद का ठप्पा लगा दिया जाता है…देश का सैनिक जब देश के दुश्मनों से लड़ता हुआ शहीद होता है तब किसी को मानवाधिकार की याद नहीं आती किन्तु अफजल गुरु और कसाब को फांसी की सजा सुनाए जाने पर सभी को उनमे मानवाधिकार दिखने लगता है…
    विष्णु बैरागी जी से छोटी सी असहमति| भारत देश में देश द्रोही गतिविधियाँ हमेशा खुले आम ही होती हैं…डॉ. सेन सान्याल से जेल में मिल कर भी इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं इसमें कोई बड़ी बात नहीं है… उन्हें छिपने की कोई आवाश्यकता नहीं है क्यों कि उन्हें बचाने वाले हमारे ही देश में हैं…अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली में खुले आम अरुंधती और गिलानी देशद्रोही बयानों का ढिंढोरा नहीं पीटते…इसलिए कहता हूँ कि हमारे देश में ऐसी हरकतें करने के किये छुपना नहीं पड़ता ये खुल्लम खुल्ला पौसिबल है…
    और जहाँ तक डॉ सेन का मामला है तो तस्वीर कुछ साफ़ नहीं है, अत: ज्यादा कुछ नहीं कह सकता…

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  25. Ravindra Nath

    इस देश मे क्या हो रहा है? सारी मर्यादायें ताक पर रख दीं गई हैं, सभी नैतिकता को छोड कर बैठे हैं, घोर अंधेरा छाया हुआ है इस देश में। एक महामानव के साथ ऐसा सलूक? इस देश के चलाने वालों को जरा भी दिमाग नही है क्या? अभी कुछ दिन पहले जब महान समाज़सेवी अंधी रॉय (जिसके ऊपर आदिवासियों के जमीन को हडपने का आरोप है) गरीबों की रहनुमा (जिनकी एक ड्रेस हज़ारों मे आती है) के ऊपर कोइ मुकदमा नही चलाने की बात सत्ताधारी दल ने की थी तब लगा था कि इस देश मे कुछ दिमाग वाले हैं, पर उधर भी अदालत ने कुछ सिरफिरों की याचिका पर केस दाखिल करने का निर्देश दे दिया कार्यपालिका को, घोर कलियुग। और अब सेन को सजा? अरे आपलोग ही तो कहते हैं कि देश की जनसंख्या बढ़ रही है, इसको सीमित करना है, कौन करता है यह सब? किसने दांतेवाडा मे आपकी मदद की देश की बढती जनसंख्या कम करने मे? किसने बंगाल (बीरभूमि) मे रेलगाडी को सटीक माध्यम बना कर १०० करीब लोगो से निजात दिलाया? ऐसे लोगो को यदि सेन अपना समर्थन देते हैं तो यह तो देशहित का कार्य हुआ न कि देशद्रोह का।

    देशद्रोह का कार्य तो शंकराचार्य कर रहे हैं जो प्राचीन गौरव जगाने के लिए प्रयत्नशील है। साध्वी प्रज्ञा कर रही है जो कि लोगो को अपने पूर्वजों के बारे ज्ञान दे कर पिछड़ा बना रही है। शंकराचार्य पर केस मे तो कई गवाह मुकर भी गये पर केस चालू है, मुकरते न तो क्या करते, पुलिस ने बराबर से झूठे सबूत भी नही बनाए, बेचारे गवाह पकडे गए। ऐसे खूंखार लोगो के खिलाफ तो पुलिस भी ठीक से केस नही करती, और बेचारा सेन, सिर्फ उन लोगो का समर्थन करते थे जिनका उद्देश्य इस देश मे २०५० मे सत्ता पाना है, उस पर उनको सजा?

    अगर वो लोग सत्ता मे आ गए तो क्या होगा अधिक से अधिक – जैसे रूस मे साईबेरिया मे दफन कर दिए गये हजारो लोग, यहां भी कुछ लाख कर देते, इसमे क्या दिक्कत है, हमारी जनसंख्या १ अरब के पार है। और फिर वो लोग अपने देश के ही तो काम आएंगे – कुछ साल बाद तेल के रूप मे। क्या होगा अगर यहां भी एक तिएन – अमन – चौक हो गया तो? हम अब एक अरब के पार है, वैसे भी बांग्लादेश से आयात भी चल रहा है, निर्बाध।

    कुछ लोग कहते हैं कि नक्सली महिलओं का शोषण करते हैं – तो क्या हुआ, ऐसा तो कार्पोरेट मे भी होता है, और नक्सलियों ने तो ऐसी कोई कसम नही खाई है कि वो कोइ गलत काम नही करेंगे, उनकी कसम तो सिर्फ सत्ता पाने की है, तो करने दो उन्हे स्त्रियों का शोषण, आखिर जब वो सत्ता मे आएंगे तो यही करना है, फिदेल की २०००० का आंकडा अभी आया था अखबारों मे, तो इनके अनुयायी भी तो यही मार्ग अपनाएंगे न?

    sathi66 ने कितना सही लिखा है “मत बोलो,अफजल और कसाब के बारे में।” बेचारा कसाब। उसने भी तो सिर्फ यहां की जनसंख्या कम करने का काम ही किया न। पर मूढ अदालत वाले। हमारे राजनेता कितने सही हैं, अंतुले और दिग्विजय अपने मां के दूध का कर्ज उतार रहे हैं इनका पक्ष लेकर।

    लानत है उन लोगो पर जो सेन के सजा का समर्थन करते हैं, ध्यान रहे सजा सिर्फ हिन्दूवादियों को मिलनी चाहिए, दूसरों को नहीं। भूल गये चंद्राबाबू नायडू ने कहा था कि नक्सली हिंसा स्वीकार्य है क्योंकि नक्सली धर्मनिरपेक्ष हैं (पर वही नक्सली जब उनकी गाडी उडाए तब अकल ठिकाने आ गई)

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  26. Ravindra Nath

    इस देश मे क्या हो रहा है? सारी मर्यादायें ताक पर रख दीं गई हैं, सभी नैतिकता को छोड कर बैठे हैं, घोर अंधेरा छाया हुआ है इस देश में। एक महामानव के साथ ऐसा सलूक? इस देश के चलाने वालों को जरा भी दिमाग नही है क्या? अभी कुछ दिन पहले जब महान समाज़सेवी अंधी रॉय (जिसके ऊपर आदिवासियों के जमीन को हडपने का आरोप है) गरीबों की रहनुमा (जिनकी एक ड्रेस हज़ारों मे आती है) के ऊपर कोइ मुकदमा नही चलाने की बात सत्ताधारी दल ने की थी तब लगा था कि इस देश मे कुछ दिमाग वाले हैं, पर उधर भी अदालत ने कुछ सिरफिरों की याचिका पर केस दाखिल करने का निर्देश दे दिया कार्यपालिका को, घोर कलियुग। और अब सेन को सजा? अरे आपलोग ही तो कहते हैं कि देश की जनसंख्या बढ़ रही है, इसको सीमित करना है, कौन करता है यह सब? किसने दांतेवाडा मे आपकी मदद की देश की बढती जनसंख्या कम करने मे? किसने बंगाल (बीरभूमि) मे रेलगाडी को सटीक माध्यम बना कर १०० करीब लोगो से निजात दिलाया? ऐसे लोगो को यदि सेन अपना समर्थन देते हैं तो यह तो देशहित का कार्य हुआ न कि देशद्रोह का।

    देशद्रोह का कार्य तो शंकराचार्य कर रहे हैं जो प्राचीन गौरव जगाने के लिए प्रयत्नशील है। साध्वी प्रज्ञा कर रही है जो कि लोगो को अपने पूर्वजों के बारे ज्ञान दे कर पिछड़ा बना रही है। शंकराचार्य पर केस मे तो कई गवाह मुकर भी गये पर केस चालू है, मुकरते न तो क्या करते, पुलिस ने बराबर से झूठे सबूत भी नही बनाए, बेचारे गवाह पकडे गए। ऐसे खूंखार लोगो के खिलाफ तो पुलिस भी ठीक से केस नही करती, और बेचारा सेन, सिर्फ उन लोगो का समर्थन करते थे जिनका उद्देश्य इस देश मे २०५० मे सत्ता पाना है, उस पर उनको सजा?

    अगर वो लोग सत्ता मे आ गए तो क्या होगा अधिक से अधिक – जैसे रूस मे साईबेरिया मे दफन कर दिए गये हजारो लोग, यहां भी कुछ लाख कर देते, इसमे क्या दिक्कत है, हमारी जनसंख्या १ अरब के पार है। और फिर वो लोग अपने देश के ही तो काम आएंगे – कुछ साल बाद तेल के रूप मे। क्या होगा अगर यहां भी एक तिएन – अमन – चौक हो गया तो? हम अब एक अरब के पार है, वैसे भी बांग्लादेश से आयात भी चल रहा है, निर्बाध।

    कुछ लोग कहते हैं कि नक्सली महिलओं का शोषण करते हैं – तो क्या हुआ, ऐसा तो कार्पोरेट मे भी होता है, और नक्सलियों ने तो ऐसी कोई कसम नही खाई है कि वो कोइ गलत काम नही करेंगे, उनकी कसम तो सिर्फ सत्ता पाने की है, तो करने दो उन्हे स्त्रियों का शोषण, आखिर जब वो सत्ता मे आएंगे तो यही करना है, फिदेल की २०००० का आंकडा अभी आया था अखबारों मे, तो इनके अनुयायी भी तो यही मार्ग अपनाएंगे न?

    sathi66 ने कितना सही लिखा है “मत बोलो,अफजल और कसाब के बारे में।” बेचारा कसाब। उसने भी तो सिर्फ यहां की जनसंख्या कम करने का काम ही किया न। पर मूढ अदालत वाले। हमारे राजनेता कितने सही हैं, अंतुले और दिग्विजय अपने मां के दूध का कर्ज उतार रहे हैं इनका पक्ष लेकर।

    लानत है उन लोगो पर जो सेन के सजा का समर्थन करते हैं, ध्यान रहे सजा सिर्फ दक्षिण्पंथियों को मिलनी चाहिए, दूसरों को नहीं। भूल गये चंद्राबाबू नायडू ने कहा था कि नक्सली हिंसा स्वीकार्य है क्योंकि नक्सली धर्मनिरपेक्ष हैं (पर वही नक्सली जब उनकी गाडी उडाए तब अकल ठिकाने आ गई)

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  27. Raju Singh

    एक भाई को
    दुसरे के खून का प्यासा बनाने
    वाले लोग

    चीन के नेता के
    नाम को अपनी पहचान
    बना कर
    भय, आतंक और हिंसा का तांडव
    मचाने वाले भाड़े के
    लड़ाकू

    जानो कौन है वह लोग
    कौन खडा है उन के पीछे
    यह अवसर है यह जानने का
    सभी को पहचानने का

    देश मुक्ति चाहता है
    विदेशी दलालों के
    नेटवर्क से

    देशद्रोही सरकार है
    जब
    फिर यह विनायक
    क्या बड़ी चीज है

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  28. Peter Ganguly

    १. माओवादीयो को दिमाग और पैसा विदेशी सरकार से मिला रहा है. वह भारत की स्वस्फूर्त पैदाईश नहीं है. हो रहे विरोध से यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है की माओवादीयों के पीछे कौन है.
    २. अरुधटी राय हो या तीस्ता सीतलवाद या फिर राजदीप सरदेशाई, इन सबके निर्देशक वही है जो विनायक सेन के या फिर कहे माओवादीयों या फिर कहे की सोनिया गाधी के निर्देशक है.
    ३. नेपाल में भारत के सहयोग से माओवादी सत्ता में आए. भारत की सत्तासीन पार्टीयो ने मओवादीयो को सत्ता में लाने में मदत दिया. लेकिन अब यह सिद्ध हो चला है की यह काम देश विरोधी था. आज भारत की विदेश निति के इस सबसे बड़े असफलता की चर्चा क्यों नहीं होती है.
    ४. एइसा भ्रम पालने की जरुरत भी नहीं है की माओवादी वामपंथी है. माओवादी वामपन्थ के सबसे बड़े विरोधी है.
    ५. सौ बात की एक बात यह है की माओवोवादीयो के दिखाने की निति जो भी हो लेकिन वह चर्चा नियंत्रित साम्राज्यवादी शक्तियों के हित में कार्य करा रहे है. अमेरिका, ब्रिटेन एवं एsकेंदेवीयान देश उनको खुल करा धन देते है तथा अपने हित में प्रयोग करते है.

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  29. sunil kumar srivastava

    i am not agree with session court decesion.vinayak is hero of the poor.he is layalist of the poor.some who struggle for poor they can not traitor.if he is traitor it means those who support to vinayak they are also traitor.i am with vinayak sen.

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  30. deepak.mystical

    deepak dudeja

    श्री सुरेश चिपुलंकर से पूर्णत सेहमत……. और sathi66@gmail.com की कविता पर अपना समर्थन करता हूँ…..
    आदिवासियों के हक पर में चिंतिं हूँ और इस बात का समर्थन भी करता हूँ की आदिवासियों को उनका हक मिलना चाहिए….. पर जब कुछ लोग बन्दूक उठा कर विदेश विचार और शाश्त्र ले कर देश पर आक्रमण करते हैं तो डॉ. सेन जैसे लोग नेप्ताथ्य में चले जाते हैं….. क्या कभी उन वीर सैनिकों के लिए इस विचारक ने शोक गीत गाये हैं ? नहीं गाये ? क्या वो धरती पुत्र नहीं ?

    जब ये लोग मानवाधिकार के नाम पर सहानुभूति बटोरते हैं तो मैं भी वही कहीं शामिल होता हूँ … लेकिन जब मानवाधिकारवादी दोहरे मापदण्ड अपनाते हैं तब गुस्सा आता है…..

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  31. sathi66@gmail.com

    विनायक सेन को समर्पित मेरी कविता (राजद्रोह)

    राजद्रोह है
    हक की बात करना।

    राजद्रोह है
    गरीबों की आवाज बनाना।

    खामोश रहो अब
    चुपचाप
    जब कोई मर जाय भूख से
    या पुलिस की गोली से
    खामोश रहो।

    अब दूर किसी झोपड़ी में
    किसी के रोने की आवाज मत सूनना
    चुप रहो अब।

    बर्दास्त नहीं होता
    तो
    मार दो जमीर को
    कानों में डाल लो पिघला कर शीशा।

    मत बोलो
    राजा ने कैसे करोड़ों मुंह का निवाला कैसे छीना,
    क्या किया कलमाड़ी ने।

    मत बोला,
    कैसे भूख से मरता है आदमी
    और कैसे
    गोदामों में सड़ती है अनाज।

    मत बोलो,
    अफजल और कसाब के बारे में।
    और यह भी की
    किसने मारा आजाद को।

    वरना

    विनायक सेन
    और
    सान्याल की तरह
    तुम भी साबित हो जाओगे
    राजद्रोही

    राजद्रोही।

    पर एक बात है।
    अब हम
    आन शान सू
    और लूयी जियाबाओ
    को लेकर दूसरों की तरफ
    उंगली नहीं उठा सकेगें।

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  32. jai kumar jha

    विनायक सेन साहब को सजा देना बिलकुल गलत है………आज विनायक सेन साहब जैसे देश और समाज के खम्भे की जरूरत है जिससे सभी खम्भों के सड़ जाने के बाद भी ये गणतंत्र जिन्दा रहे ..इन … भ्रष्ट …मंत्री और उद्योगपतियों को विनायक सेन साहब जैसे लोग ही ठीक कर सकते हैं…………..सामाजिक कार्यकर्ताओं को सजा तय करते वक्त जाँच अधिकारी तथा सजा सुनाने वाले जजों की संपत्ति और चरित्र की भी सूक्ष्म जाँच की भी आवश्यकता है….आज न्याय पालिका अच्छे,सच्चे,देशभक्त और इमानदार लोगों के फायदे के लिए कम बल्कि अपराधियों और भ्रष्ट कुकर्मियों के फायदे के लिए ज्यादा काम कर रही है….

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  33. सुरेश चिपलूनकर

    Suresh Chiplunkar

    घुमा-फ़िराकर बात मत करो यारों…

    सीधे-सादे शब्दों में बताओ कि “कानून अपना काम करेगा…” वाला सिद्धान्त क्या सिर्फ़ शंकराचार्य या साध्वी पर ही लागू होता है? क्या हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट में ताले लग गये हैं?

    और भगवान के लिये “मानवाधिकार” का राग अलापना भी बन्द करो… कश्मीर से भगाये गये लाखों हिन्दू भी इंसान ही हैं… और इन्हीं मानवाधिकार वालों के भाई-बन्धु गिलानी-बट-लोन की प्रेस कान्फ़्रेंस पूरे भारत में करवाते घूम रहे हैं…

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  34. Tilak

    ..अरुंधती रॉय और गीलानी देश तोड़ने की बात खुले आम कर रहे हैं और मुक्त हैं. तो डॉ सेन ने क्या कुछ इससे ज्यादा किया था ?… मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने डॉ. सेन को अपना समर्थन दिया। अमेरिका, भारत में भी वाम झुकाव वाले बुद्धिजीवी में उन्‍हें भारी समर्थन मिल रहा है।…इसके पूर्व जब राजनैतिक कारण से जगत गुरु शंकराचार्य, साध्वी प्रज्ञा जी, इन्द्रेश जी पर आरोप लगाये गए, तब ये कथित मानवाधिकार वादी कहाँ थे। क्या हिन्दू समाज पर किसी अन्याय से इन्हें कुछ लेना देना नहीं? केवल हिन्दू विरोधी, समाज विरोधी को चोट लगने पर तड़फ उठते है इस देश के कथित मानवाधिकारवादी, कथित बुद्धिभोगी इन्हें धिक्कार है। जिन पर आरोप नहीं अपराध का प्रमाण हो चुका है, उनके साथ खड़े इन सभी को यही कहूँगा कि अपराधी का साथ देना, उसे शरण देना, उसे छुपाने का प्रयास करना, सभी अपराध कार्य हैं ।

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  35. Prashant Bhagat

    साथियो, तकलीफ में भी हँसने का मन कर रहा है/ डाक्टर बिनायक सेन और उनके बाद पत्रकार सीमा आज़ाद और समाज कर्मी विश्वविजय / एक छातिश्गढ़ से और दो उत्तरप्रदेश से न जाने और कहा कहा से और कितने गुमनाम / दुनिया भर के विकसित देशो को खुला बाज़ार चाहिए , खुले बाज़ार के राह में आदिवासी रास्ते के रोड़े बने हुए है और उनकी वकालत करने वाले राजद्रोही बने हुए है / अगर सच में डाक्टर बिनायक सेन और उनके मुद्दे पर कुछ करना चाहते है तो वैश्वीकरण और भूमंदलिकरण के बारे में समझे और सही जगह पर हमला करे /

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  36. अनिल कुमार

    Anil kumar

    “Desh droh” ho ya Raaaj droh isse kuch fark nahi padta… yaha ye dekhne ki baat hai ki … jo bhi hua hai wo desh me huaa hai… ab chahe ise raaj droh kahe ya desh droh….. wo har aadmi ki apni-apni soch hai…

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  37. विष्‍णु बैरागी

    डॉक्‍टर विनायक सेन, तकनीकी रूप से राजद्रोह के दोषी हो सकते हैं किन्‍तु वे देशद्रोही नहीं हैं।

    सान्‍याल से हुई उनकी 33 मुलाकातें जेल के रेकार्ड में दर्ज हैं। वे सान्‍याल से छिप कर कभी नहीं मिले – चिकित्‍सा सन्‍दर्भों में ही सान्‍याल से मिले। यदि ये 33 मुलाकातें राजद्राह हैं तो इन मुलाकातों की अनुमति देनेवाले जेल अधिकारियों को भी राजद्रोह का दण्‍ड समान रूप से दिया जाना चाहिए।

    सलवा जुडुम का विरोध उन्‍होंने पहले ही दिन से किया, खुलकर किया, जगजाहिर तौर पर किया, छुप कर कभी नहीं किया। सरकार के किसी अभियान का विरोध करना बहुत ही सामान्‍य बात है-खास कर, विविध राजनीतिक विचारधाराओंवाले हमारे देश में।

    डाक्‍टर सेन यदि राजद्रोह के अपराधी हैं तो 2जी स्‍पेक्‍ट्रम और राष्‍ट्रकुल खेलों के महानायक अब तक जेलों से बाहर क्‍यों हैं।

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  38. सुरेश चिपलूनकर

    Suresh Chiplunkar

    ओह… बड़ा अन्याय हो रहा है… चलो धरना-प्रदर्शन-आंदोलन-हस्ताक्षर अभियान चलायें…
    कल ही एनडीटीवी ने बिनायक सेन पर पूरे आधे घण्टे का कार्यक्रम चलाया… सहानुभूति की बरसात ही कर दी थी मानो…

    यही मानवाधिकार वाले, यही सेकुलर्स, यही जन-संगठन(?) शंकराचार्य व साध्वी प्रज्ञा के मामले में चीख रहे थे… “कानून अपना काम करेगा…” अब क्या हो गया?

    एक लोअर कोर्ट के फ़ैसले पर इतना हंगामा? नेहरु डायनेस्टी टीवी ने कभी शंकराचार्य को ऐन दीपावली के दिन गिरफ़्तार करने का विरोध किया था? क्या बिनायक सेन, शंकराचार्य से भी बड़े हैं? या हाइकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट में ताले लग गये हैं? सबके लिये अलग-अलग मानदण्ड क्यों?

    दोहरे मानदण्ड तो हम पहले भी देख चुके हैं, ग्राहम स्टेंस को भी जलाया गया था और गोधरा में ५६ हिन्दुओं को भी… दोनों मामलों में मानवाधिकार संगठनों(?) और मीडिया के रवैये में स्पष्ट अन्तर अंधे भी देख सकते हैं…

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  39. अनिल कुमार

    Anil kumar

    ये एक गंभीर विषय है…. मुझे तो लगता है की यहाँ भी राजनीती छुपी है | डॉ सेन ने इतना सबकुछ किया और इतने सालो से सामाजिक कार्यो में व्यस्त रहे फिर भी ऐसा उनके खिलाफ हुआ एक चिंता का विषय है… इसका मतलब तो ये हुआ कि कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता समाज के हितो के लिए अब लड़ भी नहीं सकता … क्योंकि अगर लड़ा तो… कही उसे भी ऐसी सजा का पात्र न बनना पड़े |
    मै अब यही कहूँगा कि डॉ सेन को अदालत को एक मोका और
    देना चाहिए था … या अभी भी एक मोका देना चाहिए अपनी बात को स्पष्ट रूप से रखने के लिए….

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  40. दिनेशराय द्विवेदी

    सब से पहले तो आप इस परिचर्चा के विषय को सही कीजिए। डॉ.बिनायक सेन और अन्य दो व्यक्तियों को देशद्रोह के अपराध में दंड नहीं सुनाया गया है अपितु राजद्रोह के अपराध में दंड सुनाया गया है।

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    • प्रवक्‍ता ब्यूरो

      प्रवक्‍ता ब्यूरो

      दिनेशजी, यह समाचार ‘दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर और हिंदुस्‍तान’ समाचार पत्र के आधार पर तैयार किया गया है जिसमें ‘देशद्रोह’ का ही उल्‍लेख है।

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  41. rajeev dubey

    मामला ऊपरी अदालतों में चलेगा…. इसमें क्या समस्या है ? यह कोई अंतिम फैसला तो है नहीं! कितने ही मामलों में उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यालय में फैसला बदल जाता है. और कई बार ऐसा नहीं भी होता है. इस विषय में प्रस्तुत जानकारी कम है और साफ़ साफ़ कुछ उभर कर नहीं आ रहा है . पर चौंका देने वाली बात है कि अरुंधती रॉय और गीलानी देश तोड़ने की बात खुले आम कर रहे हैं और मुक्त हैं. तो डॉ सेन ने क्या कुछ इससे ज्यादा किया था ?

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  42. GOPI KANTA GHOSH

    गणतांत्रिक भारत बनाना है…हम सब मिलके इसी अत्याचार रोकना है…आशा है उनका मुक्ति होगा ही…

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