लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

Posted On by &filed under कविता.


तुम्हे मेरे सपनो में अब भी देखा करता हूँ

कभी भी यहाँ वहाँ पहले की ही तरह अब भी भटका करता हूँ ..

नहीं होते हैं चलती साँसों मैं पेंच अब उस तरह के

पर हर साँस से मैं गिरते फूलो को थामा करता हूँ..

साँसों से खयालो की डोर अब भी खिचती चली आती है

खयालो मैं तुम चले आओ ये सोच कर डरता हूँ ….

डरता हूँ की कही तुम मेरे अनकहे पर न हो जाओ हावी

अब चुप हूँ तों सिर्फ इस लिए

कि जो कह चूका गीत वो भी न भूल जाओ

ये सोच कर डरता हूँ .

मंदिरों कि घंटियों पर आवाज चढा दी थी मैंने तुम्हारी

हर आराधना मैं शब्द भी गुंथे थे तुम्हारे ही

दीपक की ज्योति मैं कही झुलस न जाये शब्द तुम्हारे

इसलिए ही तों आरती भी मन ही मन करता हूँ …

पर तब भी पूरी नहीं होती मन की आस

कही दूर कोई अधूरी कविता पूरी नहीं होती

भावार्थो का लिए चन्दन मैं खोजता ही रहूँगा तुम्हे पूरी रात

बस इसी डर से कोई रक्ताभ शाम काली नहीं होती …

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *