डा. विनोद बब्बर
भारत वर्ष उस काले दिन को कभी भुला नहीं सकता जब 23 जून, 1953 को अपने ही देश में जाने के लिए परमिट प्रणाली का विरोध करने के लिए महान राष्ट्रभक्त, उत्कृष्ट शिक्षाविद, भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रीनगर जेल में शहीद कर दिया गया। हम भारत की चर्चा करते हुए ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’ का शब्द चित्र खिंचते है उसे साकार बनाने वाले डॉ. मुखर्जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत राष्ट्र की सेवा में समर्पित किया। अपने विचारों और कृतित्व से भारत राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण बनाने वाले माँ भारती के उस महान सपूत ने भारतीय राजनीति में अपनी विशेष पहचान बनाई। देश के विभाजन के समय उन्होंने बंगाल के बहुत बड़े भूभाग को अभारत बनने से बचाया तो पंजाब के बहुत बड़े हिस्से जिसमें गुरदासपुर और आसपास का क्षेत्र भी शामिल है, को उस पार जाने से रोका। इस कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है कि यदि यह क्षेत्र पाकिस्तान में शामिल हो जाता तो यहां भी एक चिकन-नेक देश की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा सिर दर्द बन सकता था।
स्वतंत्रता के पश्चात बने मंत्रिमंडल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे। वे स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बने। 1950 में लागू हुए अपने संविधान के साथ ही तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने देश के संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर राष्ट्रीय अखंडता को गंभीर नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समर्पण, शिक्षा और विकास के नवीन विचारों का एक अद्भुत संगम था। डॉ. मुखर्जी जी की विद्वता और ज्ञान सम्पदा का लोहा उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते थे। जब उन्होंने महसूस किया कि नेहरू जी की नीतियों से राष्ट्र का अहित हो रहा है तो उन्होंने मंत्री पद त्यागकर कांग्रेस के विकल्प के रूप में अक्टूबर 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ मुखर्जी ने विभाजक धारा 370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत करते हुए कहा था कि ‘राष्ट्रीय एकता की शिला पर ही भविष्य की नींव रखी जा सकती है। देश के राष्ट्रीय जीवन में इन तत्वों को स्थान देकर ही एकता स्थापित करनी चाहिए। एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें।’
उन्होंने संसद और बाहर इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी और 1952 में अपने लोकसभा भाषण में इसे पुरजोर तरीके से उठाया। नेहरू और मुखर्जी के बीच मतभेद और भी गहरे हो गए। डॉ. मुखर्जी ने द्विराष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ आवाज उठाई। उनके प्रयासों से हिंदू महासभा और जम्मू प्रजा परिषद ने साथ मिलकर बड़े पैमाने पर सत्याग्रह शुरू किया, जिसका परिणामस्वरूप 1953 में उन्हें कश्मीर जाने से रोक दिया गया। शायद प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की मानसिकता असहमति को स्वीकार करने की नहीं थी। जनसंघ की स्थापना होने के बाद नेहरू जी ने लोकसभा में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को धमकी देते हुए कहा था, ‘आई विल क्रश यू’ (मैं आपको कुचल कर रख दूंगा)। लेकिन दंगों के भयावह दौर में भी मध्य ढाका के नवाब से उसके घर में अकेले जाकर उत्तर मांगने वाले श्यामा प्रसाद जी ने नेहरू की इस घुड़की से दबने की बजाय करारा जवाब देते हुए कहा था, ‘वी विल क्रश युवर क्रशिंग मेंटालिटी’ (आपकी कुचलने वाली मनोवृत्ति को ही हम कुचल देंगे)। इतिहास साक्षी है, डॉ. मुखर्जी का वह कथन साकार हो रहा है। नेहरू जी की विचारधारा और उनके उत्तराधिकारियों को ढो रही पार्टी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने वाले डॉ. मुखर्जी ने जम्मू की विशाल रैली में संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान में प्रदत्त अधिकार प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उदे्दश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने 11 मई 1953 को बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर में प्रवेश किया। जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया गया। कश्मीर सत्याग्रह में शेख अब्दुल्ला की पुलिस के अत्याचारों से 40 सत्याग्रही शहीद हुए। 23 जून, 1953 को जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।
जब इन अत्याचारों के विरोध में लोकसभा में आवाज उठाई गई तो नेहरूजी अपने सखा शेख अब्दुल्ला के अत्याचारों का समर्थन करते हुए दिखाई दिए। नेहरू जी के शब्द थे, ‘शेख अब्दुल्ला सत्याग्रहियों के साथ बहुत नरमी दिखा रहे हैं। मैं उनके स्थान पर होता तो इस आंदोलन को कठोरता से कुचल देता।’ जनसंघ ने जम्मू कश्मीर से परमिट को हटाने तक डॉ. मुखर्जी का अंतिम संस्कार न करने का निश्चय किया तो केन्द्र सरकार को जबरदस्त जनाक्रोश के सम्मुख झुकना पड़ा। उसके बाद से पूरा देश बिना परमिट के जम्मू कश्मीर, वैष्णोदेवी अथवा अमरनाथ जा सका तो उसका श्रेय डॉ.मुकर्जी के अमर बलिदान को है।
यह सुखद संयोग है कि 5 अगस्त, 2019 को डॉ.मुखर्जी द्वारा स्थापित विचारधारा से जुड़े दल की सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाकर राष्ट्रीय एकता के अवरोध को दूर किया। विशेष उल्लेखनीय यह कि देश विभाजन के दोषी कांग्रेस और उनके सहयोगी दल खुलेआम धमकी दे रहे थे कि ‘धारा 370 हटते ही कश्मीर में खून की नदियां बहेगी’ लेकिन उनकी इन धमकियों के विपरीत जम्मू-कश्मीर ने विकास और सदभावना की राह चुनी। इससे सिद्ध हुआ कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही सही थे। मुखर्जी से मोदी तक पहुंची भाजपा (पूर्व जनसंघ) की इस विचार यात्रा ही देश की आवाज है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का मत था कि एक राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य उसकी अपनी मूल संस्कृति और चिंतन की मजबूत नींव पर ही संभव है। उनके लिए राष्ट्र कागज पर बना टुकड़ा नहीं था जिसे लकीरों से पहचाना जाए। वे हर भारतीय के हृदय में प्रवाहित एकता अखण्डता की अजस धारा भारतीय राजनीति और समाज को एक ऐसी दिशा दी जो सशक्त भारत का भाव लिए हुए हैं। कांग्रेस के षड़यंत्रों ने मात्र 52 वर्ष की आयु में डॉ.मुखर्जी जैसे भारत माता के महान सपूत को जीने के अधिकार से वंचित कर दिया लेकिन राष्ट्र की एकता-अखण्डता के महानायक के रूप में वे सदा-सदा हर भारतीय के हृदय में जीवंत रहेंगे। हर सजग भारतपुत्र उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता पूर्वक नतमस्तक है।
लंबे समय से हर देशभक्त के हृदय की आवाज रही है कि गुजरात के ‘स्टेच्यू ऑफ युनिटी’ की तरह कश्मीर में जवाहर टनल के उस पार पीओके में शीघ्र से शीघ्र डॉ मुखर्जी की विशाल मूर्ति स्थापित की जाए तो दूसरी ओर डॉ. मुखर्जी की जन्मभूमि बंगाल को घुसपैठियों से मुक्त कराया जाएं। यह सुखद है कि डॉ. मुखर्जी की जन्मभूमि बंगाल लंबे समय बाद घुसपैठियों को बढ़ावा देने वालों के नियंत्रण से मुक्त हो चुकी है। यह संतोष की बात है कि मुकर्जी की विचारधारा को समर्पित लोग हर वर्ष 23 जून (पुण्यतिथि) से 6 जुलाई (जन्मदिवस) तक उन्हें श्रद्धा से स्मरण करते है। क्या यह उचित नहीं होगा कि इस बार इस पखवाड़े में राष्ट्रनायक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की राष्ट्र सेवाओं के अनुरूप उनका भव्य स्मारक बनाया जाए?
डा. विनोद बब्बर