माता-पिता के प्रति सन्तानों और ईश्वर के प्रति मानवमात्र के कर्तव्य”

-मनमोहन कुमार आर्य

               मनुष्य विचार करे तो उसे संसार में अपने लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण व उपकारी माता-पिता का संबंध प्रतीत होता है। माता-पिता न होते तो हम व अन्य कोई मनुष्य इस कर्मभूमि रूपी संसार में जन्म नहीं ले सकता था। माता-पिता की भूमिका यदि जन्म तक ही सीमित होती तो भी उनका अपनी सन्तानों के प्रति योगदान महान था। जन्म के बाद माता-पिता बच्चों का पालन व शिक्षा आदि की प्राथमिक आवश्यकतायें भी पूरी करते हैं। इस पालन के कार्य में परिवारों में बच्चे के दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-तायी, बुआ आदि परिवारजन भी सम्मिलित होते व हो सकते हैं। यह संबंधी यदि किसी परिवार में न भी हों तो भी सन्तान का पालन हो जाता है। अतः माता-पिता का जन्म एवं पालन आदि की दृष्टि से किसी भी सन्तान के लिये सर्वोच्च महत्व है। यही कारण है कि हमारे वेदादि शास्त्रों वा ऋषियों ने माता पिता को प्रथम द्वितीय देवता बताया है और इनकी सर्वविध सेवा कर इनका आशीर्वाद शुभकामनायें प्राप्त करने का सभी मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये। हमने यह जो शब्द व वाक्य लिखे हैं यह सिद्धान्त की दृष्टि से तो ठीक है परन्तु हम जब अपने आसपास के लोगों को देखते हैं तो उनमें से अधिकांश लोग हमें माता-पिता का उचित आदर-सत्कार व सेवा करते दृष्टिगोचर नहीं होते। जो सन्तानें अपने माता-पिता का आदर सत्कार करने के साथ उन्हें भोजन व निवास की सुविधा देने सहित उनकी सेवा आदि द्वारा उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सकतीं, वह सन्तानें भाग्यहीन एवं ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में दण्ड की भागी होती हैं। अनुमान से लगता है कि ऐसे लोगों को दण्ड अगले जन्म में प्राप्त होता है। कुछ को इस जन्म में भी प्राप्त हो सकता है। माता-पिता के प्रति उचित व्यवहार न करने वालों को ईश्वर की व्यवस्था से सुख तो कदापि नही प्राप्त सकता। सन्तानों का अपने माता-पिता का ध्यान न रखना व उनके होते हुए उनके द्वारा कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करना सन्तानों की महान कृतघ्नता का द्योतक है। माता-पिता के प्रति उचित व्यवहार न करने वालों के पास कहने के लिये कुछ बातें हो सकती हैं, परन्तु ऐसा होने पर भी उनका कर्तव्य होता है कि वह अपने माता-पिता के सद्परामर्शों को मानें और उनका वाणी सहित उनसे आदर, प्रेम, सेवा, सहयोग का व्यवहार करें।

               रामायण के आधार पर हमारे देश में श्रवणकुमार की कथा प्रचलित है। श्रवणकुमार का यश आज भी इसी कारण विद्यमान है कि उन्होंने समुचित साधन होते हुए भी अपने अन्धे बूढ़े मातापिता की सेवा करते हुए उन्हें तीर्थयात्रा कराने का साहसिक एवं श्रमसाध्य कार्य किया था। आज के युग में तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि कोई व्यक्ति कांवड़ में अपने मातापिता को बैठा कर कुछ गज या मीटर की दूरी पर ही उन्हें ले जाये। वर्तमान समय में आवश्यकता भी नहीं है। यदि अन्य साधन हैं तो उनका उपयोग करना उचित है। परन्तु श्रवण कुमार के समय उस युग में जब यातायात भ्रमण के आज के समान साधन नहीं थे, उस समय उसने कांवड़ में अपने बूढ़े अन्धे मातापिता को बैठा कर वस्तुतः एक आदर्श एवं प्रेरणादायक कार्य किया था। विश्व के इतिहास में माता-पिता की सेवा की शायद ऐसी घटना कहीं नहीं मिलेगी। कुछ समय पूर्व देहरादून में एक माता के त्याग की एक घटना घटी थी। एक शेर गांव में आया और उसने एक बच्चे को अपने जबड़े में उठा लिया। उस बच्चे की माता ने उस शेर से संघर्ष किया। इस खूनी संघर्ष में उस माता ने अपने बच्चे को शेर से छुड़ा लिया। माता व बच्चा दोनों घायल हो गये थे। ऐसी वीर माता की यदि यह बच्चा बड़ा होकर सेवा-शुश्रुषा न करे तो उसे कृतघ्न नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा। हमने एक निर्धन परिवार की ऐसी माता को भी देखा है जिसके चार जीवित बच्चे थे। उनका लालन पालन के लिये समय समय पर उन्होंने गाय व बकरी पाली। एक स्थान पर मटर छीलती थी जिसे डिब्बो में पैक कर देश-विदेश में बेचा जाता था। इस माता ने बच्चों को कुछ बड़ा होने पर कुर्सियां बुनने का काम भी सिखवाया जिससे पढ़ाई के साथ परिवार के पालन में सहायता मिल सके। श्रमिक पिता ने भी अपने परिवार के पालन में यथासम्भव योगदान दिया। माता जी महीने पन्द्रह दिन से अधिक व्रत रखा करती थीं जिससे उनके बच्चों का पेट भर सके। बच्चों व माता ने अर्थोपार्जन के लिए अन्य कार्य भी किये। सभी बच्चे पढ़े लिखे और स्वावलम्बी बने। इसी माता की मृत्यु के बाद जन्में इस परिवार के बच्चे यह अनुमान भी नहीं कर सकते कि उनके माता-पिता व नानी नाना ने कितना संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत किया था? इन माता-पिता ने कभी न अच्छे कपड़े ही पहने और न ही अपने अन्य किसी निजी सुख का ध्यान रखा। धन्य है वह देवी व उसके माता-पिता जिनसे उसे ऐसे संस्कार मिले थे। इससे मिलती जुलती घटनायें सर्वत्र देखने को मिल जाती हैं। अतः हमें अपने जीवन का निरीक्षण करना चाहिये और देखना चाहिये कि क्या हम अपने जीवित माता-पिता का उचित रीति से ध्यान रख रहे हैं? यदि नहीं तो हमें प्रायश्चित करने के साथ अपनी गलतियों का सुधार कर माता-पिता के प्रति शास्त्रानुकूल व्यवहार करना आरम्भ कर देना चाहिये।

               एक विचारणीय प्रश्न यह है कि माता-पिता के अतिरिक्त उनसे अधिक अन्य किसी चेतन व जड़ सत्ता के भी हम पर उपकार हैं? इसका उत्तर है कि हमारे ऊपर अनेक जड़ व चेतन सत्ताओं के अनेक उपकार हैं। पृथिवी माता, गोमाता, वेदमाता, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वृक्षों सहित आचार्यों एवं परिवार के अनेक सदस्यों के हम पर अनेकानेक उपकार एवं ऋण हैं। अतः हमें उन सबके प्रति पूज्य व आदर भाव रखने चाहिये। ईश्वर के अतिरिक्त संसार की सभी दृश्यमान एवं अदृश्य सत्ताओं को परमात्मा ने जन्म दिया व बनाया है। यदि हम ईश्वर को जान लें तथा उसकी आज्ञा व प्ररेणाओं को समझ लें और उसके अनुसार जीवन व्यतीत करें, तो हम ईश्वर के प्रति कृतघ्न होने से बच सकते हैं। विचार करने पर ज्ञात होता है कि परमात्मा ने अपना ज्ञान वेद शिक्षा सृष्टि के आरम्भ में दी थी। महाभारत काल तक वेदों का यथार्थ सत्यस्वरूप संसार वा भारत के लोगों को विदित था। उसके बाद लोगों के आलस्य व प्रमाद के कारण वेदों का यथार्थस्वरूप विलुप्त हो गया और उसके स्थान पर अज्ञानता व स्वार्थ के मिश्रण से युक्त अनेक वेद विरुद्ध मतों, मान्यताओं व परम्पराओं का देश व समाज में प्रचार हुआ। लगभग पांच हजार वर्षों तक ऐसा होता रहा। इससे मनुष्य सत्य को भूल गये और वेदविरुद्ध असत्य मान्यताओं से युक्त धर्म व व्यवहार विषयक असत्य मान्यताओं को चलाते रहे व अब भी सर्वत्र ऐसा देखने को मिलता है।

               आर्य़हिन्दू जाति ही नहीं विश्व के सभी मानवों के सौभाग्य से परमात्मा ने असीम कृपा कर एक ऋषि तुल्य पवित्र आत्मा को गुजरात की टंकारा की भूमि पर जन्म दिया जिसने ऋषि दयानन्द नाम धारण कर ईश्वर उसके ज्ञान वेद के सत्यस्वरूप का देशदेशान्तर में स्वयं अपने शिष्यों के माध्यम से प्रचार किया। उनकी कृपा से आज ईश्वर वेद सहित धर्म सामाजिक परम्पराओं का सत्यस्वरूप सुलभ एवं आर्यसमाज द्वारा प्रचारित है। ईश्वर को जानने व वेदों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ईश्वर का स्थान माता-पिता व आचार्यों से भी बड़ा है। सभी माता-पिता, आचार्य तथा ऋषियों को जन्म देने वाला व ज्ञान देने वाला भी परमात्मा ही है। यह सभी परमात्मा के उपासक रहे हैं। माता व पिता तो जीवात्मा के सभी जन्मों में बदलते रहते हैं। जो वर्तमान समय में माता-पिता थे वह अपने शैशव व बाल्यकाल में अपने अपने माता-पिता की सन्तानें थीं। वह मृत्यु होने के बाद पुनर्जन्म में पुनः पुनः अन्य अन्य माता-पिताओं की सन्तानें बनेंगी और स्वयं भी माता-पिता बनेंगे। ईश्वर ऐसा नहीं है। ईश्वर संसार में अनन्त संख्या में विद्यमान सभी जीवात्माओं का माता, पिता व आचार्य है, उन सबका रक्षक एवं पोषक है तथा उन्हें न्याय देने वाला व उनके दुःखों को दूर कर सुख प्रदान करने वाला है।                ईश्वर अनादि काल से हमारे साथ है व अनन्त काल तक हमारे साथ रहेगा। वह हमारे कर्मानुसार हमारा न्याय करेगा और हमें नाना प्रकार की प्राणी योनियों में जन्म और सुख व दुःखों की प्राप्ति होगी। यदि हमने मनुष्य योनि में आर्यसमाज के सम्पर्क कर वेदों का ज्ञान प्राप्त कर योगदर्शन की विधि से उपासना की और सदाचरण किया तो ईश्वर की कृपा से हमें जन्म व मरण रूपी दुःखों से मुक्ति मिल सकती है और उस अवस्था में हम सब ईश्वर के सान्निध्य में रहकर पूर्ण सुख व परम आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं। यह सुख लगभग वैसा ही होता है जो कि ईश्वर में विद्यमान है अथवा उसको प्राप्त है। मोक्ष को प्राप्त कर हमारी संगति मोक्ष में विचरण करने वाली अन्य आत्माओं से होती है जिनसे हम वार्तालाप व चर्चायें कर सकते हैं। लेख का विस्तार न कर हम यही कहना चाहते हैं कि माता-पिता हमारे समक्ष दृश्यमान चेतन देवता हैं जिनके हम कृतज्ञ एवं ऋणी हैं। हमें इनकी सेवा करने व इन्हें प्रसन्न रखने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। आचार्यों के प्रति श्रद्धा रखते हुए उनकी सेवा भी करनी चाहिये। सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये, इस नियम का पालन करना चाहिये। ईश्वर संसार में सबसे महान है। उससे महान कोई नहीं है। उसके हम सब मनुष्य आदि प्राणी सदा से और सदा के लिये ऋणी हैं। उससे हमारा पिता-पुत्र या माता-पुत्र दोनों का सम्बन्ध हैं। हम उस ईश्वर को सादर कोटिशः नमन करते हैं।

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