राजनीति

सत्ता के लिए व्यग्रता बनाम  लोकतंत्र की चाहत? 

डॉ घनश्याम बादल 

राजनीति में मतभेद का टकराव में बदलना कोई नई बात नहीं, लेकिन जब टकराव का केंद्र मुख्य निर्वाचन आयुक्त जैसा संवैधानिक पद बन जाए, आंदोलन की अगुवाई युवा समूह करे, विपक्षी गठबंधन सड़क पर उतर आए और सरकार की प्रतिक्रिया के रूप में राजधानी में गिरफ्तारियों, प्रतिबंधों तथा आवाजाही पर रोक की खबरें सामने आएँ, तो मामला किसी व्यक्ति के इस्तीफे की मांग से कहीं आगे निकल जाता है।  कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी गठबंधन का मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध आंदोलन अब इसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।

कहने के लिए भले ही यह आंदोलन चुनाव आयोग द्वारा किए गए एस आई आर की प्रक्रिया पर उठी उंगलियां हों या करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से काटने का सवाल हो अथवा चुनाव आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा भारतीय जनता पार्टी एवं एनडीए को लाभ पहुंचाने के आरोप हों लेकिन असली कारण है विपक्ष का चुनाव आयोग पर अविश्वास और उससे भी अधिक सत्ता में आने की व्यग्रता जिसे भुनाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी का बहुत ही शातिराना तरीके से उपयोग किया जाता दिख रहा है। इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि जिस तरह 12 वर्ष से ज्यादा के शासन के बाद भी सत्तारूढ़ दल लगातार जीत रहा है और विपक्ष के प्रति उसका जो उपेक्षा भरा, मनमानी पूर्ण एवं व्यंग्यात्मक प्रहार का रवैया है उसने भी इस आंदोलन को हवा दी है। 

  लोकतंत्र में चुनाव जीतना जितना ज़रूरी है, चुनाव पर भरोसा क़ायम रखना भी उतना ही ज़रूरी है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और विपक्षी दलों का आंदोलन इसी बुनियादी सवाल को सामने लाता है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण, कथित तौर पर मतदाताओं के नाम काटे जाने और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवालों ने एक प्रशासनिक विवाद को राजनीतिक टकराव में बदल दिया है। अब प्रश्न केवल यह नहीं कि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देंगे या नहीं, बल्कि यह है कि इस संघर्ष से चुनावी व्यवस्था की साख बढ़ेगी या और घटेगी और इससे भी बढ़कर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले इस देश की साख, उसकी पहचान और अंदरूनी राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 

विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों और पुनरीक्षण की प्रक्रिया से लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। उसका कहना है कि जब चुनाव की बुनियाद ही संदिग्ध हो जाए, तो निर्वाचन आयोग की जवाबदेही तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष के लिए यह तर्क देना स्वाभाविक है कि संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक दबाव में नहीं चलाया जा सकता और गंभीर आरोपों के लिए प्रमाण भी जरूरी हैं। दोनों पक्षों की दलीलों में विचारणीय तत्व हैं, लेकिन किसी का दावा अपने आप में अंतिम सत्य नहीं है। फैसला आरोपों की तीव्रता से नहीं, तथ्यों की जांच से होना चाहिए।

  इस विवाद का प्रत्यक्ष कारण मतदाता सूची और आयोग की कार्यप्रणाली है, लेकिन इसके पीछे सियासत का अपना जटिल गणित भी है।    

   विपक्ष को ऐसा मुद्दा चाहिए जो विभिन्न दलों को एक मंच पर ला सके और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा को रक्षात्मक स्थिति में खड़ा करे। सीजेपी के लिए भी आंदोलन राजनीतिक पहचान और जनसमर्थन बढ़ाने का अवसर है। सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बताकर सवालों की धार कुंद करना चाहेगा। मगर किसी मुद्दे से विपक्ष को राजनीतिक लाभ हो सकता है, इससे मुद्दा अपने आप निराधार नहीं हो जाता। इसी तरह, किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह प्रमाणित भी नहीं हो जाता।

यहीं सत्ता और विपक्ष, दोनों की परीक्षा है। सरकार को चाहिए कि वह आरोपों का ज़वाब राजनीतिक प्रत्यारोपों से नहीं, पारदर्शी तथ्यों से दे। निर्वाचन आयोग को भी यह भरोसा पैदा करना होगा कि मतदाता सूची से जुड़ी हर शिकायत सुनी जा रही है और पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित नहीं होंगे। दूसरी ओर, विपक्ष को भी आरोपों को प्रमाणों के साथ सामने रखना होगा। संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी भी कम नहीं।

ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, तो विपक्ष इसे जवाबदेही से बचने का मामला बनाकर आंदोलन तेज कर सकता है। यदि वह इस्तीफा दे देते हैं, तो विपक्ष इसे अपनी जीत बताएगा और सत्ता पक्ष इसे दबाव की राजनीति का परिणाम कह सकता है। लेकिन दोनों ही स्थितियों में एक सवाल अनुत्तरित रह सकता है, क्या मतदाता सूची संबंधी शिकायतों का समाधान हुआ? इस्तीफा आरोपों की पुष्टि नहीं होता और पद पर बने रहना निष्पक्षता का प्रमाण नहीं। व्यक्ति के भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण संस्था की विश्वसनीयता है।

यदि यह आंदोलन फैल गया तो इसका असर 2027 के विधानसभा चुनावों में पड़ सकता है, खासकर वहां जहां विपक्ष मतदाता सूची के सवाल को आम नागरिक के अधिकार से जोड़ने में सफल हो जाए मगर इसे भाजपा के लिए निश्चित चुनावी ख़तरा या विपक्ष की तयशुदा जीत मानना ज़ल्दबाज़ी होगी। आंदोलन की व्यापकता, आरोपों के प्रमाण, विपक्ष की एकजुटता और जनता के रोजमर्रा के मुद्दे तय करेंगे कि यह आक्रोश मतों में कितना बदलता है। 2029 के लोकसभा चुनावों तक भी इसका प्रभाव बना रह सकता है, बशर्ते विपक्ष इसे केवल विरोध का नारा न रहने दे और चुनावी सुधारों का ठोस विकल्प प्रस्तुत करे।

   इतिहास इस बात का गवाह है कि लोकतंत्र में असहमति को दबाने से अविश्वास मिटता नहीं, कई बार और गहरा होता है। लेकिन आंदोलन की राजनीति भी तभी सार्थक है, जब वह प्रमाण, संयम और स्पष्ट मांगों के साथ आगे बढ़े। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए और कानून-व्यवस्था के नाम पर की गई कार्रवाई भी आवश्यकतानुसार जांच के दायरे में आनी चाहिए।

अंततः, ज्ञानेश कुमार की कुर्सी बचे या जाए, देश में करीब 80 साल से शांतिपूर्वक सत्ता परिवर्तन करने वाले और आम आदमी की पहली पसंद लोकतंत्र की कुर्सी डगमगानी नहीं चाहिए। सत्ता को बहुमत के साथ जवाबदेही और विपक्ष को विरोध के साथ प्रमाण की ज़रूरत है। चुनाव आयोग के प्रति भरोसा किसी एक बयान से नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया से बनेगा। सवाल किसी एक आयुक्त के पद का नहीं, उस भरोसे का है जिसके आधार पर जनता अपना मत देती है और हार-जीत को स्वीकार करती है।