आर्थिकी

जनऔषधि परियोजना पर गिद्ध दृष्टि

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

   “प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना” बहुत लाभदायक एवं राहतभरी सिद्ध हुई है। इसने देश के आम लोगों के अनुमानत: 50 हजार करोड़ रुपये तो बचाये ही, साथ-साथ अर्थव्यवस्था को सम्बल दिया है। अब यह योजना पश्चिम बंगाल में भी शुरू हुई है। वहाँ पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार ने पिछले डेढ़ दशक से राज्य की जनता को इसके फायदे से वञ्चित कर रखा था। लेकिन इस बीच खबर है कि दवा निर्माता बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने इस योजना को अपने ‘कुचक्र’ के निशाने पर लिया है। कारण कि उन्हें अन्य अपने कई लाख करोड़ रुपये के कारोबार पर खतरा नजर आ रहा है। 

   पता चला है कि ऐसा करने वाली ज्यादातर  कम्पनियाँ हैं तो विदेशी, मगर इन्होंने भारत की छोटी-छोटी दवा बनाने वाली कम्पनियों को जरिया बना लिया है। ये उनसे कथित जेनेरिक दवाओं का उत्पादन और बिक्री करवाकर अपना लक्ष्य साध रही हैं।

    केन्द्र सरकार ने *जनरक्षक औषधि योजना* डेढ़ दशक से अधिक पहले शुरू की थी किन्तु बहुत सी अन्य योजनाओं की तरह यह भी कागजों और फाइलों में ही बनी रही। 11 वर्ष पूर्व पुनर्गठित किये जाने के बाद अब जाकर यह क्रान्तिकारी परियोजना बनकर उभरी है। इसने आम भारतीयों के हजारों करोड़ रुपये बचाये हैं। 

   इसकी लोकप्रियता से देशभर में जन औषधि केन्द्रों की संख्या बढ़ती जा रही है। इससे अन्य दवाएँ बनाने वाली कम्पनियों में हाहाकार सा है। वे सरकार की अत्यन्त लोकप्रिय योजना को अपने लिए घातक मानती हैं। इस वजह से उन्होंने अपने बचाव के लिए जनऔषधि केन्द्रों को निशाने पर ले लिया है।

   आजकल जनरक्षक औषधि केन्द्रों पर इस ब्राण्ड की दवाओं के बजाय अन्य तथाकथित जेनेरिक दवाओं की भरमार देखी जा सकती है। कई गुना अधिक खुदरा मूल्य (एमआरपी) छपी ये दवाएँ अमूमन “जनरक्षक ब्राण्ड” की दवाओं के मूल्य पर ही बेची जाती हैं। हालाँकि इनका असर उतना नहीं होता। अनेक दवाएँ अधोमानक की भी होने का अन्देशा है। इस बारे में शिकायतों की कोई सुनवाई होने की जानकारी नहीं है।

   देखने में आया है कि जनऔषधि केन्द्रों पर जेनेरिक दवाओं के स्थान पर अनेक दवा दुकानदार गैर‑जेनेरिक दवाएँ “जेनेरिक” बताकर जरूरतमन्दों को धड़ल्ले  से थमा देते, या बेच देते हैं। एहसान सा जताते हुए वे कहते हैं “दाम वही (जनरक्षक वाला) लगेगा।” ऐसी दवाओं की गुणवत्ता घटिया हो सकती है। सूत्रों के अनुसार – “यह सरकार की जनहितकारी योजना को नाकाम करने का प्रयास हो सकता है।” इस ओर तुरन्त ध्यान देना जरूरी है। कारण यह कि आमतौर पर कई दुकानदार रसीद नहीं देते, और ग्राहक भी सही बिल माँगते नहीं।

   उल्लेख्य है कि ‘प्रधानमंत्री जनऔषधि नाम 2008 में शुरू की गयी थी। इसका मकसद दवाओं के महँगे ब्राण्डेड विकल्पों की तुलना में सस्ती दरों पर गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराना है, जो बाजार मूल्य से 50 से लेकर 90 फीसद तक सस्ती होती हैं। 2014 में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के पश्चात 2015 में इस योजना का पुनर्गठन किया गया। इसे “प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना” नाम दिया गया। इस योजना के तहत पूरे भारत में विशेष केन्द्र खोले गये हैं। इन्हें जनऔषधि केन्द्र के नाम से जाना जाता है। 

   वर्तमान में (2026 के आँकड़ों के अनुसार) देशभर में 19,000 से अधिक जन औषधि केन्द्र सफलतापूर्वक सञ्चालित हो रहे हैं। सरकार के आधिकारिक पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले 28 फरवरी 2026 तक ही कुल 18,646 केन्द्र खोले जा चुके थे। इनमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

   दवाइयों की उपलब्धता : इन केन्द्रों पर 2,110 से अधिक प्रकार की दवाइयाँ और 315 सर्जिकल उत्पाद उपलब्ध हैं।

   भविष्य का लक्ष्य : भारत सरकार ने मार्च 2027 तक देश भर में जन औषधि केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर 25,000 करने का लक्ष्य रखा है। इन केन्द्रों से सस्ती जेनेरिक दवाएँ खरीदने के कारण अब (मार्च 26) तक देशवासियों को लगभग 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हो चुकी है।

   दवा उद्योग का कारोबार : नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और सरकारी रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय दवा उद्योग का कुल टर्नओवर (कारोबार) लगभग ₹4.72 लाख करोड़ (60 बिलियन अमेरिकी डॉलर) तक पहुँच गया है। इस कुल कारोबार में भारतीय (देशी) और बहुराष्ट्रीय (विदेशी/बहुराष्ट्रीय) कम्पनियों की स्थिति इस प्रकार है।

   भारतीय कम्पनियाँ : सन फार्मा, सिप्ला, और डॉ० रेड्डीज जैसी घरेलू कम्पनियाँ बाजार पर हावी हैं। ये बड़े पैमाने पर जेनेरिक और क्रोनिक दवाओं का निर्माण करती हैं। कुल दवा कारोबार में इनकी हिस्सेदारी करीब 86 प्रतिशत है।

   विदेशी कम्पनियाँ : विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (जैसे एबॉट, फाइजर, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन) की हिस्सेदारी 2013 के 22% से घटकर अब 14% रह गयी है। ये मुख्य रूप से पेटेण्टेड और सुपर-स्पेशियलिटी दवाओं पर ध्यान केन्द्रित कर रही हैं।

   भविष्य का लक्ष्य: भारत सरकार ने मार्च 2027 तक देश भर में जन औषधि केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर 25,000 करने का लक्ष्य रखा है।

   बचत : इन केन्द्रों से सस्ती जेनेरिक दवाएँ खरीदने के कारण अब तक देशवासियों को लगभग 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हो चुकी है। 

   दवा बाजार के मुख्य बिन्दु : घरेलू खपत और निर्यात: इस कुल कारोबार में से लगभग ₹2.01 लाख करोड़ की दवाएँ भारत के घरेलू बाजार में उपयोग होती हैं, जबकि 30.5 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.55 लाख करोड़) मूल्य की दवाओं का विदेशों में निर्यात किया जाता है। 

   विदेशी कम्पनियों का बदलता रुख : विदेशी कम्पनियाँ अब भारत में सामान्य जेनेरिक (सस्ती) दवाओं के बजाय जटिल और महँगी दवाओं (जैसे त्वचा रोग, ऑन्कोलॉजी/कैंसर) के क्षेत्र में अधिक निवेश कर रही हैं।  

   वैश्विक स्थिति : भारत मात्रा (वॉल्यूम) के हिसाब से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा और मूल्य (वैल्यू) के हिसाब से 11वाँ सबसे बड़ा दवा उत्पादक देश है। ( अदिति फीचर्स )

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर