संसार मे ज्ञान की कमी, कभी नहीं रही,
बस दृष्टि, और ग्रहण करने की क्षमता की रही।
प्रकृति तो सदियों से बोलती आयी है,
बस उसकी भाषा, शब्दों में कहाँ बंध पाई है।
पत्तों के पन्नों पर, ऋतुओं के अध्याय लिखे,
समय की स्याही से, जीवन के व्यवहार लिखे।
उन्हीं पत्तों के पन्नो से, कुछ पत्तों का इज़हार सुनो,
जो प्रेम न कर पाओ तो, इस पौधे का इंतेज़ार सुनो।
मेरा यह जेड प्लांट,
शायद प्रतीक्षा का ही कोई पुराना विद्वान,
हो जाओ जब इससे दूर, कुछ क्षण, दिन या पूरा मास,
खो तो देता है ये अपनी चमक, पर रखता है पूरी आस।
पानी न मिलने के सूखेपन से कहीं ज़्यादा है उसके मिल जाने की प्यास,
कुछ बूंदे मिल जाने से ही खिलने लगे, फिर चाहे कितने बीतें हों मास।
मानो रुककर बता रहा हो, प्रेम का सबसे सुंदर रूप,
जो खुद प्रेम नही है, पर है इंतेज़ार का स्वरूप।
जिस युग में लोग, क्षणों में सम्बन्ध गढ़ते हों,
और अगले ही क्षण, उनसे बाहर भी बढ़ते हों।
कहाँ समझ पाएंगे वे, सूखने और टूटने का अंतर।
कहाँ समझ पाएंगे सूखने पर इंतेज़ार ही है प्रेम का इज़हार।
अफसोस है ऐसे लोगो पर जो ऐसे पौधों को भी सूखा दें,
जो खुद तो आगे बढ़ें, पर हर सूखे पौधे को जला दें।
मेधावी महेंद्र