आर्थिक अनुशासन या मूल मूद्दों से भटकाने की राजनीति

कांग्रेस पार्टी और केन्द्र सरकार आजकल एक नए अभियान में लगी है। गांधी के शिष्यों को लगभग 50 साल बाद एकाएक गांधी की याद आ रही है। विगत दिनों सरकार के सबसे प्रबुद्ध माने जाने वाले मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि देश में आर्थिक अनुशासन की जरूरत है और इस अनुशासन के लिए मंत्री तथा बडे अधिकारियों को पहल करन चाहिए। प्रणव दा ने न केवल कहा अपितु स्वयं इकॉनामी क्लास में हवाई यात्रा कर आर्थिक अनुशासन की प्रक्रिया प्रारंभ करने का प्रयास किया। देखा देखी कई मंत्रियों ने प्रणव दा का अनुसरण किया। स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने खर्च में कटौती करने के लिए इकॉनामी क्लास में यात्रा की। कांग्रेस के द्वारा चलाए जा रहे नवीन तमाशों के बीच कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी ने दो कदम और आगे बढकर लुधियाना तक की यात्रा शताब्दी में कर डाली। राहुल की इस यात्रा ने मानो देश भर की मीडिया में भूचाल ला दिया हो। सभी अखबार ने अपनी सुखियां इसी खबर से बना डाली। दूरदर्शन वाहिनी वाले लगातार चीखते रहे कि राहुल ने अदभुद काम कर दिया और वे महात्मा गांधी से मात्र एक कदम ही पीछे रह गये हैं।

कांग्रेस के आर्थिक अनुशासन के अभियान की हवा पार्टी के नेताओं ने ही निकाल दी है। विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने तो इकानोमिक क्लास की यात्रा को पशुओं की यात्रा बताकर कांग्रेस के आन्तरिक मनोभाव को प्रगट कर दिया है। लेकिन कांग्रेस और केन्द्र सरकार इस अभियान को आगे बढाने की योजना में है। इस योजना से देश का मितना भला होगा या आर्थिक अपव्यय पर कितना अंकुश लगेगा, भगवान जाने, लकिन जिस प्रकार कंपनी छोट कलेंडर भारी जैसे कहावत की तरह कांग्रेसी इस अभियान को प्रचारित कर रहे है उससे तो इस पूरे अभियान से एक भयानक राजनीतिक षडयंत्र की बू आ रही है। एक हिसाब लगाकर देखा जाये तो कांग्रेस के मंत्रियों के पास अरबों की बेनामी चल अचल संपत्ति है। स्वयं सोनिया जी ऐसी कई संस्थाओं की प्रधान हैं जो स्वयंसेवी संगठन के नाम पर प्रति वर्ष करोडों की उगाही करता है।

ऐसे ही दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला जी का मामला है। कांग्रेस के लगभग सभी बडे नेताओं के पास अरबों की संपति है। हां, प्रणव दा या ऐ0 के0 एन्टेनी जैसे कुछ नेता हैं जो आम जनता की तरह जीते हैं। यह वही कांग्रेस है जिसके नेता आज भी गांव-गांव में नव सामंत की भूमिका में हैं। केवल इकानोमिक क्लास के हवाई यात्रा मात्र से आर्थिक अनुशासन संभव नहीं है। इसके लिए अन्य और कई उपाय करने की जरूरत है। कांग्रेस का चरित्र सदा से दोहरा रहा है। सच तो यह है कि देश में लगातार महगाई बढ रही है, देश आर्थिक दृष्टि से कंगाल हो रहा है, नक्सलवाद धीरे धीरे अपना विस्तार बढ रहा है तथा चीन एवं पाकिस्‍तान सीमापार सामरिक मोर्चा खोलने के फिराक में है। ऐसी पस्थिति में अब केन्द्र सरकार क्या करे? इसलिए कुछ ऐसी बात जनता के सामने तो रखनी पडेगी जो जनता को प्रभावित करे तथा देश के मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान हटाता रहे। ऐसे ही कुछ दिनों तो स्वाईन फ्लू का फंडा चला, अब जब वह शांत हुआ तो नया फंडा अया, आर्थिक अनुशासन का। महंगाई बढ रही है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, सुरक्षा की ऐसी तैसी हो रही है। जब रेल यात्रा के दौरान राहुल स्वयं सुरक्षित नहीं हैं तो फिर आम आदमी की सुरक्षा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस परिस्थिति में कांग्रेस तथा केन्द्र सरकार को वास्तविक विषय पर ध्यान केन्द्रित करनी चाहिए, न कि फंतासी प्रचार में अपना समय और पैसा अपव्यय करना चाहिए।

अभी संसदीय चुनाव के बाद कांग्रेस अपने गठबंधन के साथ फिर से सत्ता में लौटी है। सरकार ने 100 दिनों की कार्य योजन भी बनाई। उसपर कितना काम हुआ, सरकार को अपने मातहत महकमों को पूछना चाहिए, क्योंकि जनता यह जानना चाहती है। यह कौन नहीं जानता कि मंत्री या अधिकारियों को जब विदेश भ्रमण की इच्छा होती है तो वे विदेश भ्रमण की सरकारी योजना बना लेते हैं। मंत्री और अधिकारी मुर्गी पालन, भेड पालन, सूअर पालन, न जाने किन किन विषयों का प्रशिक्षण लेने विदेश जाते हैं। इन तमाम बिन्दुओं पर पहले सरकार जांच बिठाए, फिर पता लगाये कि मंत्री या अधिकारियों के उक्त भ्रमण से देश या समाज को कितना लाभ हुआ है। अगर लाभ शून्य है तो उन मंत्रियों और अधिकारियों पर भ्रमण के दौरान हुए व्यय की वसूली की जाये, लेकिन ऐसा करेगा कौन। क्योंकि इससे तो फिर काम होने लगेगा। काम तो इस देश में होना नहीं चाहिए, हां, राजनीति जरूर होनी चाहिए, सो हो रही है। सच्च मन से कांग्रेस आर्थिक अनुशासन चाहती है तो कांग्रेस को फिर से पुनर्गठित करने की जरूरत है। क्या सोनिया जी कांग्रेस के पुनर्गठन का साहस दिखा पाएंगी?

-गौतम चौधरी

1 thought on “आर्थिक अनुशासन या मूल मूद्दों से भटकाने की राजनीति

  1. ऎन्कअ यह अनुशसन् उस् समय यात्रआ कर् रह लॊगॊ सॆ पुछिय , उनक कितनॆ मॊलिक अधिकरॊ का हनन हॊता ह, जिस तरह किसि भि सरकारि विभाग कि हद्ताल सॆ आम् आदमि परॆसआन हॊत ह ऎसऎ हि नॆताओ कॆ ऎसॆ शोक पर हॊता ह‌

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