लेखक परिचय

रमेश कुमार दुबे

रमेश कुमार दुबे

लेखक पर्यावरण एवं कृषि विषयों पर कई पत्र-पत्रिकाओं में स्‍वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं।

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bmfhomeआज दुनिया भर में प्रगति का पहिया जीवाश्म ईंधन(पेट्रोल, डीजल) पर ही चल रहा है। इसीलिए जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमतें बढ रही हैं, वैसे-वैसे इस पहिए के धीमा पड़ने की आशंका बलवती होती जा रही है। प्रगति का पहिया लगातार चलता रहे इसके लिए जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की खोज जोर-शोर से जारी है। इस दिशा में एक सशक्त विकल्प है जैव ईंधन(इथेनाल व बायोडीजल)। विश्व के अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से जैव ईंधन उत्पन्न किए जा रहे हैं। मक्का, सोयाबीन, पामोलिव, गन्ना, चुकंदर, सरसों, रेपसीड व गेहूं प्रमुख जैव ईंधन वाली फसलें हैं।

अमेरिका में मक्का व सायोबीन से जैव ईंधन बनाया जा रहा है तो यूरोप में रेपसीड, सोयाबीन व पाम आयल से। यूरोपीय संघ के देश जैव ईंधन बनाने के लिए रेपसीड व पामोलिव तेल दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से आयात कर रहे हैं। ब्राजील गन्ने व सोयाबीन से इथेनाल बना रहा है तो दक्षिण पूर्व एशियाई देश पाम आयल से। भारत ने 2017 तक 10% जीवाश्म ईंधन को जैव ईंधन से प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए देश की 1 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर बेकार भूमि पर जैव ईंधन देने वाली फसलें उगाई जाएगी। ये फसलें आज दुनिया भर में सबसे पसंदीदा फसलें बनकर उभरी हैं। इन्हें उगाने के लिए विकसित अपने किसानों को भारी सब्सिडी दे रहे हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में इथेनाल उत्पादन के लिए 51 सेंट प्रति गैलन तथा बायोडीजल के लिए 1 डालर प्रति गैलन की सब्सिडी दी जा रही है। यह कहा जा रहा है कि इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी जिससे वैश्विक तापवृध्दि पर अंकुश लगेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार व आय के प्रचुर अवसर सृजित होंगे और आयातित तेल पर निर्भरता कम होगी।

जैव ईंधन वाली फसलों पर बल देने के कारण दो समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका है। परंपरागत फसलों की जगह जैव ईंधन वाली फसलों को उगाने से खाद्यान्न तंत्र नष्ट हो जाएगा और विश्व विशेषकर विकासशील देशों में अन्न की कमी हो जाएगी। 2008 की विश्वव्यापी महंगाई से यह समस्या उत्पन्न हो चुकी है। दूसरे, जैव ईंधन बनाने की प्रक्रिया अधिक कार्बन उत्सर्जित कर पर्यावरण को असंतुलित करती है। प्रत्यक्ष रूप से तो जैव ईंधन के प्रयोग से कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन में कमी आती है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन डाई आक्साइड में वृध्दि होती है। उदाहरण के लिए एक लीटर जैव ईंधन पाने के लिए उपयुक्त फसल उगाने और उसे जैव ईंधन में बदलने की प्रक्रिया के दौरान जो कार्बन डाई आक्साइड पैदा होती है, वह वाहनों की टंकियों में जैव ईंधन डालने से बचत की गई कार्बन डाई आक्साइड से अधिक होती है। पेड़-पौधों और जमीन में वायुमंडल वाली कार्बन डाई आक्साइड की अपेक्षा तीन गुना अधिक कार्बन डाई आक्साइड संचित है। जैव ईंधन वाली फसलों को उगाने के लिए यदि वनों की कटाई या घास के चरागाहों की जुताई होती है, तब पेड़-पौधों को जलाने या उनके सड़ने से कई टन कार्बन डाई आक्साइड पैदा होती है और वायुमंडल की हवा के साथ जाकर मिल जाती है। एक हेक्टेयर मक्के के खेती की अपेक्षा उतना ही बड़ा घास का मैदान 110 टन अधिक कार्बन डाई आक्साइड अपने भीतर बांधे रहता है। यही कार्बन डाई आक्साइड यदि हवा के साथ जा मिलता है तब एक हेक्टेयर खेती से उपजे मक्के से बने इथेनाल को उसकी भरपाई के लिए 93 वर्ष लगेंगे।

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की दलदली भूमि को जब पाम आयल बागानों में बदला जाता है तो इस परिवर्तन के समय मुक्त हुई कार्बन डाई आक्साइड की भरपाई करने में सबसे अधिक समय लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वहां की उपजाऊ भूमि में बहुत अधिक मात्रा में कार्बन डाई आक्साइड निहित है। जब वहां नए बागान बनाने के लिए जल निकासी की जाती है तब उसमें घुली हुई कार्बन डाई आक्साइड मुक्त होकर हवा से जा मिलती है। दो वर्ष पूर्व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के आकाश पर जो गाढा धुंआ हप्तों तक छाया रहा था, उसका कारण वन विनाश ही था। वनों के विनाश से जैव विविधता नष्ट हो रही है। मीलों तक फैले एक की फसल(पाम) के बागानों को इंडोनेशियाई लोगों ने औद्योगिक जंगल नाम दिया है। सुमात्रा व बोर्नियो में वनों के विनाश के कारण जंगली हाथी और बाघ की अत्यंत दुर्लभ प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ब्राजील में गन्ने व सोयाबीन की खेती के लिए अमेजन बेसिन के लाखों हेक्टेयर वर्षा वन काट दिए गए।

जैव ईंधन बनाने के लिए जिन फसलों की जरूरत पड़ती है उनमें से अधिकांश फसलों को उगाने की आदर्श स्थिति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं। इन्हीं क्षेत्रों में वनों का सबसे बड़ा आच्छादन है जैसे अमेजन बेसिन, कांगों बेसिन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देश। अपनी सदाबहार प्रकृति और घने स्वरूप के कारण ये वन जहरीली कार्बन गैसों को सोखने और प्राणदायी गैस आक्सीजन उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसीलिए इन्हें धरती का फेफड़ा कहा जाता है। जबसे कठोर लकड़ी से कागज बनाने की तकनीक विकसित हुई तभी से इन वनों की कटाई शुरू हुई। लेकिन अब जैव ईंधन के लिए इन वनों की बड़े पैमाने पर कटाई शुरू हो गई है। यदि वनों के विनाश की यही गति रही तो शीघ्र ही धरती का फेफड़ा संक्रमित हो जाएगा। ऐसी स्थिति में गरीबों के खाली पेट और जहरीली हवा के बीच जैव ईंधन से अर्जित उपलब्धियों का क्या मूल्य रह जाएगा?

One Response to “जैव ईंधन बनाम पर्यावरण”

  1. sunil patel

    दुबे जी ने बहुत ही सही मुद्दा उठाया है। वाकई यह बहुत ही जिन्ता की बात है। दो साल पहले गर्मी में आई भोजन की कमी विकसित देशों द्वारा खाद्य पदार्थों से ईधन बनाऐ जाने के कारण पैदा हुई थी।

    अमेरिका सौर उर्जा, पवन उर्जा, और आजकल खाद्य पदार्थों से ईधन बना रहा है और अपने यहां 30 सालों से बेकार पड़े (गुजरे जमाने के कचरा) परमाणु संयत्र भारत को उंची कीमत पर बेच रहा है।

    जैसा कि रमेश जी ने कहा कि खाद्य पदार्थों से ईधन बनाने से जैव विविधता पर विपरीत असर पड़ेगा। वाकई आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की गंभीर समस्या पैदा होगी और विकाशशील देशों को भोजन की कमी के गंभीर संकट से जूझना पड़ेगा।

    यह समस्या आने वाले समय में सबसे गंभीर समस्या होगी।

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