राजनीति

चुनाव आयोग बनाम विपक्षी दल

वीरेन्द्र सिंह परिहार

     देश के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार-पत्र में यह प्रकाशित हुआ कि एसआईआर यानी मतदाता सूची के शुद्धिकरण को लेकर चुनाव आयोग के दो सदस्यों सर्व श्री कमलजीत सन्धू और डा0 विवेक जोशी द्वारा 14 बार आपत्ति दर्ज कराई गई। उक्त खबर में यही नहीं बताया गया कि उक्त आपत्तियाँ दर्ज कराने का परिणाम क्या निकला लेकिन ‘कौआ कान ले गया’ की तर्ज पर कांग्रेस कमेत सभी विरोधी दल चुनाव आयोग के प्रमुख आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमलावर हो गये। राहुल गाँधी ने ज्ञानेश कुमार को लेकर कहा- ‘‘हम आपको पकड़ेगे ? आशय यह कि जब सत्ता में आयेंगे तो ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार कर जेल में डाल देंगे। अरविंद केजरीवाल तो जैसे मौके की तलाश में ही थे। सीधे कह बैठे- ‘‘ज्ञानेश कुमार को तुरंत गिरफ्तार कर उन पर मुकदता चलाया जाना चाहिए। बड़बोले बिहार से कांग्रेस सांसद पप्पू यादव ने तो सीधे ज्ञानेश कुमार को खम्भे पर लटकाने की माँग कर दी तो मुकेश सहनी ने तो सीधे ज्ञानेश कुमार को गोली मारने की इच्छा व्यक्त कर दी। अखिलेश यादव तो इस दौर में चुनी गई भाजपा सरकारों को असंवैधानिक होने का प्रमाण-पत्र बाँटने लगे। राहुल गाँधी ने भी उसी सुर में सुर मिलाते हुये कहा दिया कि भाजपा ने ज्ञानेश कुमार के सहयोग से वोट चोरी कर सरकारें बनाई है।   

      दूसरी तरफ बंगाल भाजपा के अध्यक्ष शामिक भट्टाचार्य ने ज्ञानेश कुमार के चुनाव क्षेत्र में किये गये सुधारों/कार्यों को लेकर उन्हें पदम विभूषण देने की माँग कर डाली। यदि शामिक भट्टाचार्य की बाते छोड़ भी दी जाये तो केरल सरकार के गृहमंत्री रमेश चेन्निथला  जो कांग्रेस पार्टी के हैं, उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता की प्रशंसा करते हुये कहा कि पहले भी वाम मोर्चा की सरकार मृतकों के नाम वोटरलिस्ट में जोड़कर फर्जी मतदान कराती थी लेकिन अब चुनाव आयोग के चलते ऐसा नहीं है और फेयर चुनाव हो रहा है जिसके चलते केरल में यूपीए की सरकार सत्तारूढ़ है।

     गौर करने की बात यह कि यदि चुनाव आयोग के सहयोग और समर्थन से ही भाजपा एनडीए वोट चोरी कर तमाम चुनाव जीत रही है तो फिर तमिलनाडु में भाजपा का मात्र 1 ही विधायक कैसे ? यदि ऐसा था तो फिर केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, हिमांचल प्रदेश के सभी प्रान्तो में भाजपा की सरकारें होनी चाहिए थी। उल्लेखनीय यह भी कि यदि ज्ञानेश कुमार के चलते इस तरह वोट चोरी हो रही थी तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को गत लोकसभा चुनाव में 80 में मात्र 37 सीटें ही क्यों मिली जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को इससे करीब दुगुनी सीटें मिली थी। यदि ऐसा था, तो 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात्र 240 सीटें ही क्यों जबकि 2014 और 2019 के दोनो चुनावों में भाजपा को अपने आप पूर्ण बहुमत प्राप्त था।

      विपक्षी दलों का तो यहाँ तक आरोप है कि चुनाव आयोग के सहारे भाजपा सिर्फ वोटो की ही नहीं, राजनीतिक दलों की भी चोरी कर रही है। यह बाते बंगाल में तृणमूल के विभाजन, महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विभाजन और उनके चुनाव चिन्ह जब्त करने को लेकर कही जाती रही है पर कांग्रेस पार्टी को क्या यह पता नहीं है कि अतीत में उस पार्टी का स्वतः दो बार विभाजन हो चुका है और उसके ‘दो बैलों की जोड़ी’ और ‘बछड़े को दूध पिलाती गाय’ का चुनाव चिन्ह चुनाव आयोग द्वारा जब्त कर लिया गया था जिसके परिणामस्वरूप आज कांग्रेस का चुनाव चिन्ह ‘हाथ’ का पंजा है।

      तथ्यतः यह बात भी गलत है कि एसआईआर से फायदा भाजपा को हो रहा है। एसआईआर होने के पश्चात बंगाल के गत विधान चुनावों में जिन विधानसभा क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर वोट काटे गये, वहाँ 15 सीटों पर तृणमूल चुनाव जीत कर आई। बड़ी बात यह भी कि जो वोट कटते हैं, उसमें चुनाव आयोग कैसे यह पता कर सकता है कि यह किस पार्टी के वोट हैं ? सच्चाई यह कि कांग्रेस पार्टी अपने शासन के दौर में चुनाव आयोग समेत सभी संवैधानिक संस्थाओं में अपने प्रति और खास तौर पर एक खानदान के प्रति वफादार लोगो को ही नियुक्त करती थी और अपने अनुरूप फैसले कराती थी। वैसा वह विपक्ष में रहकर भी चाहती है, कि चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाएं उनके इशारे पर नाचे, नहीं तो वह उन्हें बदनाम करने का प्रयास करेंगे। यहाँ तक कि उन्हें खुलेआम धमकायेंगे।

      सत्ता में रहकर कांग्रेस पार्टी द्वारा चुनाव आयोग के दुरूपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण 2009 के आस-पास नवीन चावला की नियुक्ति है, जिसके बारे में उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त वी. गोपालस्वामी ने कहा था कि वह वाशरूम में जाकर चुनाव आयोग की बातों को कांग्रेस पार्टी तक पहुँचाते हैं, और उनको हटाने के लिये न्यायालय तक गये थे। इसके बावजूद नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया और रिटायरमेंट के बाद भी उन्हें उपकृत किया गया। यह भी सच्चाई है कि विपक्ष आज जिन दो चुनाव आयुक्तों को हीरो की तरह पेश कर रहा है, उनकी नियुक्ति के समय उन्हें मोदी का आदमी बताकर भारी विरोध किया था। अब जहाँ तक चुनाव आयोग में किसी बिन्दु पर असहमति जताने का प्रश्न है, तो यह तो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन इससे बड़ा सच यह कि चाहे एसआईआर का मामला हो, चाहे फार्म-6 का डिक्लेयरेशन का मामला हो, सभी मामलों में निर्णय सर्वसम्मति से लिये गये। यहाँ तक कि देश की शीर्ष अदालत ने अपनी ओर से कुछ सुझाव दिये हों पर उनके द्वारा कहीं भी चुनाव आयोग के कार्यों को विधि विरूद्ध न तो घोषित किया और न ही कोई नकारात्मक टिप्पणी ही की गई।

      यह भी सभी को पता है कि चुनाव आयोग में सभी निर्णय बहुमत से ही लिये जा सकते हैं, फिर किसी निर्णय को लेकर अकेले ज्ञानेश कुमार को कैसे कटघरे में खड़ा किया जा सकता है ? अब विपक्ष कह रहा है कि भाजपा/एनडीए ने हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली के चुनाव ज्ञानेश कुमार के चलते जीते जबकि ज्ञानेश कुमार को मुख्य सूचना आयुक्त ही 15 फरवरी 2025 को बनाया गया और उपरोक्त राज्यों के विधानसभा चुनाव पहले ही हो चुके थे। इससे समझा जा सकता है कि विपक्ष कैसे  झूठ का पहाड़ खड़ा करता है। यहाँ तक कि पूरे गैर जिम्मेदारी से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को देशद्रोही बता देता है। रहा सवाल इंडियन एक्सप्रेस की साख और विश्वसनीयता का, तो यह किसी जमाने में ‘सेना द्वारा दिल्ली की ओर कूच’ जैसे निराधार बाते भी प्रकाशित कर चुका है।

     अपने झूठ और निराधार आरोपों के चलते राहुल गाँधी तो कई बार न्यायालयों में माफी माँग चुके हैं। कुछ मामलों में अरविंद केजरीवाल भी इसी स्थिति से गुजर चुके है पर ‘लागी नहीं छूट रामा’ की तर्ज पर ये अपने आदतों से बाज नहीं आते और कई बार तो झूठ का पहाड़ खड़ा करने की कोशिश करते हैं। चुनावों में अपनी सैकड़ों हारों को छिपाने और जवाबदेही से बचने के लिये राहुल गाँधी और पूरा विपक्ष ईव्हीएम हैक से लेकर वोट चोरी का विमर्श खड़ा करने का प्रयास करता हैं और संवैधानिक संस्थाओं को दबाव में लाने की विफल  कोशिश  करता हैं। उनके इन झूठे आरोपों का देश के मतदाताओं पर कुछ उल्टा ही असर दिखाई देता है। तभी तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय में ही नहीं, पंजाब और तेलंगाना (हैदराबाद) जैसे विश्वविद्यालयों में अपना परचम फहरा चुका है।

वीरेन्द्र सिंह परिहार