डॉ.वेदप्रकाश
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर के संवेदनशील इलाकों का सुरक्षा ऑडिट करने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दिल्ली एनसीआर में घटी दुष्कर्म की घटना और महिला सुरक्षा पर चिंता जताते हुए स्वत: संज्ञान लेकर यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल चिंता जताने तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए समयबद्ध कदम उठाए जाने चाहिए। कोर्ट ने पुलिस को चार सप्ताह के भीतर संवेदनशील इलाकों का सर्वे करने, ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों का नक्शा तैयार करने, पुलिस गश्त बढ़ाने और खराब स्ट्रीट लाइट व सीसीटीवी को दुरुस्त करने के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि विगत कुछ दिनों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एवं दुष्कर्म की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। ताजा मामले दिल्ली के कालकाजी, मुखर्जी नगर, बिहार के जमुई, समस्तीपुर, आरा, बांका, उत्तरप्रदेश के प्रयागराज और पंजाब के हैं। जहां अलग-अलग घटनाओं में बालिग और नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म, छेड़छाड़ एवं मारपीट की घटनाएं सामने आई हैं। दिल्ली, पंजाब एवं देश के विभिन्न शहरों में इन घटनाओं के विरोध में लगातार धरने-प्रदर्शन भी हो रहे हैं। कहीं धनबल, कहीं बाहुबल तो कहीं पदबल के कारण अपराधी बच निकलते हैं अथवा जांच में उन्हें बचा दिया जाता है और धरने-प्रदर्शन करने वालों के हिस्से में केवल आश्वासन आता है, पीड़ित को न्याय नहीं मिलता। विडंबना यह है कि जिस देश में- यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता कहकर नारियों की पूजा की जाती है, नवरात्र पक्ष में लड़कियों को देवी मानकर कन्या पूजन किया जाता है, नारी शक्ति को गृह लक्ष्मी का दर्जा दिया जाता है और जिस देश में लगभग पिछले एक दशक से बेटी बचाओ- बेटी बचाओ का अभियान चल रहा है। वहां नारी शक्ति असुरक्षित है। जब देश की राजधानी में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं तो अन्य हिस्सों में किस प्रकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। महत्वपूर्ण यह भी है कि साइना नेहवाल, विथ्या रामराज, ईशा सिंह, अनाहत सिंह,मेरीकाम, लवलीना आदि के साथ-साथ कबड्डी, क्रिकेट एवं विभिन्न खेलों में बेटियां लगातार वैश्विक रिकॉर्ड बना रही हैं। वे किसी से पीछे नहीं हैं। घर के आंगन से लेकर अंतरिक्ष तक वे शिखर पर पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी बेटियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वे शिक्षा के क्षेत्र में शिखर की ओर हैं, लेकिन न तो वे घर में सुरक्षित हैं, न शिक्षण संस्थानों में, न ही कार्यालय में और न ही राह- रास्तों में। प्रश्न आज भी यह है कि बंगाल के आर. जी. कर अस्पताल में दुष्कर्म और फिर हत्या की शिकार उस बेटी को न्याय कब मिलेगा? भारत सरकार ने नारी सशक्तिकरण, सम्मान तथा सुरक्षा के संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाने के लिए तथा महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखते हुए अध्यादेश लाकर यह प्रविधान किए हैं कि- 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले में फांसी, 16 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले में सजा की अवधि 10 साल से बढ़कर 20 साल। लेकिन आधी- अधूरी जांच पड़ताल और फिर न्याय व्यवस्था का लचीलापन दुष्कर्मियों को सजा नहीं दे पाता। न्यायालय में बैठे माननीय न्यायाधीश यदि वास्तव में नारी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, यदि किसी अबोध बालिका के साथ दुष्कर्म की घटनाएं उनकी अंतरात्मा को झकझोरती है तो फिर वे अपराधी को फांसी या आजीवन कारावास क्यों नहीं देते? क्या स्ट्रीट लाइट लगाने, सीसीटीवी कैमरे लगाने और पुलिस की गश्त से दुष्कर्म और महिलाओं के प्रति अपराध रुक जाएंगे? ध्यान रहे विकसित भारत के संकल्प में नारी शक्ति केवल एक महत्वपूर्ण कड़ी नहीं है वह बराबर की भागीदार है। इसलिए उनकी शिक्षा, कला, कौशल, योग्यता और उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। संसद में महिला आरक्षण और लखपति दीदियां बनाने का विचार निश्चित रूप से नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़े संकल्प हैं लेकिन मोदी सरकार को नारी सुरक्षा की गारंटी भी देनी होगी। किसी भी महिला अथवा बेटी के साथ छेड़छाड़ अथवा दुष्कर्म की घटनाएं समाज के नैतिक पतन के साथ-साथ वर्तमान की शिक्षा और संस्कार पर भी बड़े प्रश्न खड़े कर रहे हैं। यदि पुरुष समाज में महिलाओं के प्रति विकृतियों बढ़ रही हैं तो उसके लिए कठोर दंड का प्रविधान तत्काल किया जाना चाहिए। यदि भारतवर्ष की गौरवशाली परंपरा में सावित्री, गार्गी, अनसूया, भारती, विजया, पद्मावती,जीजाबाई, सावित्रीबाई फुले जैसी विदुषी नारियों के नाम लिया जाता है तो यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय के समाज ने नारियों की सुरक्षा और सम्मान को सर्वोपरि रखा। उस समय की शिक्षा और संस्कार निश्चय ही उत्कृष्ट थे। क्या यह वही देश नहीं है जहां रावण द्वारा माता सीता के हरण के बाद राम ने न केवल रावण का वध किया अपितु उसकी सोने की लंका को भी मिट्टी में मिला दिया। आज यदि योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री दुष्कर्मियों और कुख्यात अपराधियों के एनकाउंटर कर रहे हैं, उनकी संपत्तियों को बुलडोजर से मिट्टी में मिला रहे हैं तो क्या उस पर प्रश्न उठाने वाले भी अपराधी नही कहे जाने चाहिए? महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसी घटनाओं का एक बड़ा समाधान एनकाउंटर के रूप में भी अपनाना चाहिए। क्योंकि भय के बिना राज नहीं चल सकता। नारी शक्ति है, दुर्गा है, आज अपनी आत्मरक्षा के लिए उसे स्वयं भी सशक्त होना पड़ेगा और यदि आवश्यक हो तो हथियार उठाने से भी परहेज नहीं करना चाहिए। आज यदि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर नारी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तो विकास की राह अधूरी रहेगी और नारी सशक्तिकरण का संकल्प भी अधूरा रहेगा।
डॉ.वेदप्रकाश