लेखक परिचय

श्‍यामल सुमन

श्‍यामल सुमन

१० जनवरी १९६० को सहरसा बिहार में जन्‍म। विद्युत अभियंत्रण मे डिप्लोमा। गीत ग़ज़ल, समसामयिक लेख व हास्य व्यंग्य लेखन। संप्रति : टाटा स्टील में प्रशासनिक अधिकारी।

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श्‍यामल सुमन

सच तो ये है कि चवन्नी से परिचय बहुत पहले हुआ और “चवनिया मुस्कान” से बहुत बाद में। आज जब याद करता हूँ अपने बचपन को तो याद आती है वो खुशी, जब गाँव का मेला देखने के लिए घर में किसी बड़े के हाथ से एक चवन्नी हथेली पर रख दिया जाता था “ऐश” करने के लिए। सचमुच मन बहुत खुश होता था और चेहरे पर स्वाभाविक चवनिया मुस्कान आ जाती थी। हालाकि बाद में चवनिया मुस्कान का मतलब भी समझा। मैं क्या पूरे समाज ने समझा। मगर उस एक दो चवन्नी का स्वामी बनते ही जो खुशी और “बादशाहत” महसूस होती थी, वो तो आज हजारों पाकर भी नहीं महसूस कर पाता हूँ।

15 अगस्त 1950 से भारत में सिक्कों का चलन शुरू हुआ। उन दिनों “आना” का चलन था आम जीवन में। आना अर्थात छः पैसा और सोलह आने का एक रूपया। फिर बाजार और आम आदमी की सुविधा के लिए 1957 में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया यानि रूपये को पैसा में बदल कर। अर्थात एक रूपया बराबर 100 पैसा और 25 पैसा का सिक्का चवन्नी के नाम से मशहूर हो गया।

भले ही 1957 में यह बदलाव हुआ हो लेकिन व्यवहार में बहुत बर्षों बाद तक हमलोग आना और पैसा का मेल कराते रहते थे। यदि 6 पैसे का एक आना और 16 आने का एक रूपया तो उस हिसाब से एक रुपया में तो 16×6 = 96 पैसे ही होना चाहिए। लेकिन उसको पूरा करने के लिए हमलोगों को समझाया जाता था कि हर तीन आने पर एक पैसा अधिक जोड़ देने से आना पूरा होगा। मसलन 3 आना = 3×6+1=19 पैसा। इस हिसाब से चार आना 25 पैसे का, जो चवन्नी के नाम से मशहूर हुआ। फिर इसी क्रम से 7 आने पर एक पैसा और अधिक जोड़कर यानि 7×6+2 = 44 पैसा, इसलिए आठ आना = 50 पैसा, जो अठन्नी के नाम से आज भी मशहूर है और अपने अवसान के इन्तजार में है। उसके बाद 11 आने पर 3 पैसा और 14 आने पर 4 पैसा जोड़कर 1 रुपया = 16×6+4 = 100 पैसे का हिसाब आम जन जीवन में खूब प्रचलित था 1957 के बहुत बर्षों बाद तक भी।

हलाँकि आज के बाद चवन्नी की बात इतिहास की बात होगी लेकिन चवन्नी का अपना एक गौरवमय इतिहास रहा है। समाज में चवन्नी को लेकर कई मुहाबरे बने, कई गीतों में इसके इस्तेमाल हुए। चवन्नी की इतनी कीमत थी कि एक दो चवन्नी मिलते ही खुद का अन्दाज “रईसाना” हो जाता था गाँव के मेलों में। लगता है उन्हीं दिनों मे किसी की कीमती मुस्कान के लिए “चवनिया मुस्कान” मुहाबरा चलन में आया होगा। चवन्नी का उन दिनों इतना मोल था कि “राजा भी चवन्नी ऊछाल कर ही दिल माँगा करते थे”। यह गीत बहुत मशहूर हुआ आम जन जीवन में जो 1977 में बनी फिल्म “खून पसीना” का गीत है।

“मँहगाई डायन” तो बहुत कुछ खाये जात है। मँहगाई बढ़ती गयी और छोटे सिक्के का चलन बन्द होता गया। 1970 में 1,2और 3 पैसे के सिक्के का चलन बन्द हो गया और धीरे धीरे चवन्नी का मोल भी घटता गया। चवन्नी का मोल घटते ही “चवन्नी छाप व्यापारी”, “चवन्नी छाप डाक्टर” आदि मुहाबरे चलन में आये जो क्रमशः छोटे छोटे व्यापारी और आर०एम०पी० डाक्टरों के लिए प्रयुक्त होने लगा।

और आज चवन्नी का इतना मोल घट गया “मंहगाई डायन” के कारण कि आज उसका का अतिम संस्कार है। चवन्नी ने मुद्रा विनिमय के साथ साथ समाज से बहुत ही रागात्मक सम्बन्ध बनाये रखा बहुत दिनों तक। अतः मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है चवन्नी को उसके इस शानदार अवसान पर।

8 Responses to “चवन्नी का अवसान : चवनिया मुस्कान”

  1. AJAY

    suman ji, bahut bahut dhanyavad jankari kai liye ! छावनी hamesha यद् रहेगी , कांग्रेस ki छावनी, रुपस मई चल rahi hai …………….

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  2. Ram narayan suthar

    एक चवन्नी ‘चली नहीं’ और एक चवन्नी ‘चली गयी’ !
    इन्द्रप्रस्थ की शान कभी थी, न जाने कौन गली गयी.!!

    न ‘काले’ पर हाथ डाल पाए, न ‘उजलो’ को हथकड़ी पड़ी !
    सधी नही बात अनशनो से , बिचारी जनता छली गयी.

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  3. sunil patel

    चवन्नी के बारे में बहुत अच्छी जानकरी दी है श्री सुमन जी ने.

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  4. एल. आर गान्धी

    l.r.gandhi

    मगर राजनैतिक चवन्नी बदस्तूर चल रही है और तब तक चलती रहेगी जब तक ‘ खानदानी ‘वारिस इस राजनैतिक मजबूरी को ठोकर मार कर बेदखल नहीं कर देता.

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