शिक्षा का आनंद

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डॉ. ब्रह्मदीप अलूने

चीन में एक कहावत है जो लोग साल का सोचते हैं, वह अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं, वो फलों के वृक्ष बोते हैं, लेकिन जो पीढ़ियों का सोचते हैं वो इंसान बोते हैं। मतलब उसको शिक्षित करना, संस्‍कारित करना तथा उसके जीवन को तैयार करना। यह अपेक्षा शिक्षा मंदिरों और शिक्षकों से की गई है। सिंकदर महान ने अपने गुरू अरस्‍तु को याद करते हुए कहा था ‘‘मैं अपनी जिंदगी के लिए पिता का ऋणि हूं लेकिन जीवन जीने की इस अच्‍छी शैली के लिए शिक्षक का। इक्कीसवी सदी के भारत में शिक्षक की भूमिका पर जब सवाल खड़े हो रहे हैं तो हमें तुरंत सुपर-30 के जनक आनंद कुमार का ध्यान आता है। वे जादूई व्यक्तित्व के धनी और शिक्षक के रूप में आधुनिक भारत के आदर्श भी है। आनंद से जब पूछा गया कि सुपर-30 के पीछे का क्या रहस्य है। वे बोले ‘‘वास्तव में न तो इसके पीछे कोई जादू है, नहीं मैं अन्य लोगों से अलग हूं। मैं तो बहुत साधारण सा शिक्षक हूं। सफलता कभी भी आसानी से नहीं मिलती। मुझे लगता है कि इन वंचित छात्रों के प्रशिक्षण के दौरान सबसे महत्वपूर्ण चीज है उनके आत्मविश्वास को बढ़ाना। लंबे समय तक अभावों में रहने के कारण वे किसी भी अन्य छात्र जितने प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपनी समस्त आकांक्षाएं खो चुके होते हैं। लेकिन फिर ऐसा करना इतना आसान नहीं होता। यह वास्तव में एक बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि गरीब परिवार से आये छात्र हमेशा एक गंभीर हीन भावना के साथ शुरूआत करते हैं। हमारा पहला उद्देश्य होता है उन्हें निराशा के बादल से खिंचकर लाना और उनको उनकी क्षमताओं का विश्वास दिलाना।’’

बहरहाल वर्तमान शिक्षा प्रणाली और उससे जुड़े शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों की अंतर्निहित क्षमताओं का कितना आंकलन किया जा रहा है और देश में कैसी शिक्षित पीढ़ी आ रही है यह किसी से भी छुपा नहीं है। कोठारी शिक्षा आयोग ने कहा था कि भारत की भावी पीढ़ी का निर्माण उसकी कक्षाओं में हो रहा है तो क्या वास्तव में कोठारी आयोग की मंशा के अनुरूप हमारे सरकारी विद्यालयों में शिक्षा और शिक्षक की गुणवत्ता ऐसी है जिससे बहुआयामी विद्यार्थी निकल सके। क्या भारत में उदयमान भारतीय समाज दक्षता आधारित शिक्षा, सीखने के उन्नत सिद्धान्त जैसे विषयों पर शिक्षकों के लिए अध्ययन सामग्री विकसित की गई है, क्या भारत में समावेशी शिक्षा का सफल क्रियान्वयन हो रहा है और सामाजिक न्याय को लक्ष्य को स्थापित करने में हम सफल हो सके हैं।

हंटर कमीशन 1882 में आया था। लार्ड रिपन द्वारा स्थापित इस कमीशन में व्यावसायिक व व्यापारिक शिक्षा पर बल दिया गया, इसके साथ ही तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा के प्रबंध के लिए उद्यमियों से अनुदान राशि लेने का नियम बनाया। उस दौर में निजी प्रबंध समितियों की मदद से कई निजी स्कूल और कॉलेज खुले।19वीं सदी में शिक्षा से सरोकार बहुत कम लोगों का होता था लेकिन शिक्षा के मूल में संस्कार, अन्तर्निहित शक्तियों का विकास, कौशल विकास तथा नैतिकता के भाव होते थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रणेता भी शिक्षा के महत्व का समझते थे। इसलिए स्वतंत्र भारत में जब शिक्षा आयोग बने तो 1948-49 में राधाकृष्णन् ने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के जरिये भारत में शिक्षा क्रांति का सूत्रपात किया। लेकिन 1986 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई तो तब तक यह स्पष्ट हो गया कि शिक्षा के जरिये गतिहीन समाज को ऐसा स्पन्दनशील समाज बनाना होगा जो प्रतिबद्ध हो, विकासशील हो तथा परिवर्तनशील हो। मतलब साफ है 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से यह संदेश देने की कोशिश की कि हमारे शिक्षा संस्थानों से निकलने वाला विद्यार्थी गतिहीन समाज की ओर अग्रसर हो रहा है।

खादी के युग में और यहां तक कि स्वतंत्रता के बाद कुछ सालों तक शिक्षा से जुड़े वे लोग होते थे जो राष्ट्र के नवनिर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते थे। हंटर आयोग की सिफारिशे ऐसे ही लोगों को शिक्षा से जोड़ने की थी। लेकिन अब सरकारी शिक्षा और निजी शिक्षा में जमीन आसमान का अंतर पैदा कर दिया गया है। सरकारी स्कूलों से निकलने वाले आनंद कुमार कैम्ब्रिज के बुलावे के बावजूद आर्थिक अभावों में वहां पर जा नहीं पाते और जब वे राजनेताओं के सामने गुहार लगाते हैं तो उनसे अपनी जाति के नेता के पास जाने को कह दिया जाता है और अंततः वो उत्कृष्ट आनंद व्यवस्थाओं से हारकर कैम्ब्रिज जाने का विचार ही त्याग देता है। वह और कोई आनंद व्यवस्थाओं का शिकार नहीं हो इसलिए सुपर-30 का आगाज करता है और अब उस सुपर-30 को सराहने वाले राजनेता भी है और बॉलीवुड के सितारे भी। लेकिन इन सबके बीच इस देश में मुद्दा शिक्षा की समानता का है। दुनिया के विकसित देशों में सरकारी स्कूल है और वहीं से बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था के बूते बेशकीमती युवा निकलते हैं। भारत में केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्‍चों के लिए केन्द्रीय विद्यालय है, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल है, जिले में नवोदय स्कूल खोल दिये गये हैं और उत्कृष्ट विद्यालय भी खोले गये हैं। लेकिन इन सबसे दूर इस देश के आबादी का एक बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों में पढ़ता और पलता है। मध्याह्न भोजन के कारण मजदूर मां-बाप उन्हें इस आस में स्कूल भेज देते हैं कि कम से कम उनके बच्चों को भोजन तो मिलेगा। इन सरकारी स्कूलों की बदहाली किसी से छूपी नहीं है। शिक्षक अपने अधिकारों की लड़ाई में व्यस्त रहते हैं तो जातपात और फिरका परस्ती के बीज बच्चों में बालपन से बो दिये जाते हैं। स्वयं आनंद कुमार कहते हैं ‘‘शिक्षक का पेशा अब खुद शिक्षकों के लिए बोझ बन गया है। देश में शिक्षकों की भारी कमी ने देश भारत के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। शिक्षकों की झोली में मुश्किल से कुछ पैसा आता है। मुट्ठीभर तबका वह है जो शहरों में रहकर शिक्षा के निजीकरण का बहुत फायदा उठा रहा है। सुविधाओं से भरपूर यह निजी स्कूल मनमानी फीस वसूलते हैं और उसमें पढ़ने वाले नेताओं, जमींदारों, धनाढ्य एवं नव धनाढ्य वर्ग के बच्चें अपनी किस्‍मत पर मुस्कुराते हुए यह तो जान ही जाते हैं कि सरकारी स्कूलों के क्या हालात है। इस देश में समान नागरिक संहिता की बात तो बहुत होती है लेकिन समान शिक्षा को लेकर कोई आंदोलन क्यों नहीं खड़ा किया गया है। जबकि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य वसुधैव कुटुम्बकम बताया जाता है। फिर उसके अनुरूप शिक्षा का ढांचा बनाने से परहेज क्यों किया जा रहा है। यदि समान शिक्षा से हमारी पीढ़ी का सामूहिक तथा शारीरिक मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास हो तब आरक्षण जैसी चुनौतियों के हल ढूंढने में सहुलीयत भी हो सकेगी। सामाजिक असमानता से जुझते इस देश में हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था के जरिये सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास नहीं कर सकते। हम वैज्ञानिक और मानवीय विषयों को साथ-साथ नहीं जोड़ सकते क्योंकि हमारी सरकारी स्कूलों में न तो तकनीकी संसाधन है, न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षक और उन्हें संतुष्ट करने वाला सरकारी सामर्थ्य। शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता तो है लेकिन यह आशंका भी है कि ऐसी शिक्षा व्यवस्थाओं से उनके बच्चों भविष्य कितना उज्जवल होगा।

शिक्षा इस देश की सर्वोच्च प्राथमिकता है और जैसा कोठारी आयोग ने कहा कि इस देश की कक्षाओं में भावी पीढ़ी का निर्माण हो रहा है। शिक्षकों के हालात पर विचार करने की आवश्यकता है। वे कहते हैं कि ‘‘शिक्षकों को रोल मॉडल बनने की जरूरत है, देश में शिक्षा के प्रति समर्पण बडे और शिक्षक के प्रति सम्मान बड़े तभी भारत के भविष्य निर्माण को अम्ली जामा पहनाया जा सकेगा। वास्तव में आनंद कुमार सुपर-30 के द्वारा कितने ही बच्चों का सपना साकार कर रहे हैं और वे अपनी सफलता का श्रेय उनके छात्रों को ही देते है। बहरहाल शिक्षक दिवस पर हमें कैसा शिक्षक चाहिए यह एक छात्र ही बता सकता है। आनंद कुमार के छात्र और आईआईएम के मोहम्मद अकीबुर रहमान कहते हैं – ‘‘ब्रेड हेनरी ने कहा था एक अच्छा शिक्षक उम्मीद जगा सकता है, कल्पनाओं को प्रज्ज्वलित कर सकता है और सीखने के प्रति प्रेम उत्पन्न कर सकता है।  उच्च निरक्षरता वाले समुदाय से आया होने के कारण मेरे परिवार और मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं वहां तक पहुंच जाऊंगा जहां मैं आज हूं। वे खुद भी वंचितों और दलितों के लिए एक आदर्श है। वे ही हैं जो हम छात्रों में यह आत्म विश्वास पैदा करते हैं कि हम चाहे तो कुछ भी हासिल कर सकते हैं चाहे परिस्थितियां कैसी भी हो।’’

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