कविता

अनादि पुरुष अविनाशी प्रभु

-अशोक “प्रवृद्ध”

अनादि पुरुष अविनाशी प्रभु, घट-घट तेरा वास।
 शोभा अमित अनंत है, करहु हृदय परकास।।
 अक्षर ब्रह्म अनूप तुम, आदि अंत से पार।
 शोक न व्यापे जीव को, करहु कृपा करतार।।
 अजन्मा अविराम प्रभु, नित नवीन सुखधाम।
 शोभित सुंदर रूप है, करहु बंदगी काम।।
 अगम अगोचर देव तुम, महिमा कही न जाय।
 शोधत थक गये वेद सब, कहे न पार लगाय।।
 अमल अकल अद्वैत तुम, सत्य सनातन रूप।
 शोभामय संसार यह, कृपा तुम्हारी भूप।।
 अबिगत अलख अपार प्रभु, पूरण ब्रह्म स्वरूप।
 शोक-मोह सब दूर हो, करहु अनुग्रह भूप।।
 अविनाशी परमात्मा, तुम ही आदि अधार।
 शोभित ज्योति स्वरूप है, करहु पार संसार।।
 अनघ अनामय देव तुम, कण-कण में विस्तार।
 शोक मिटे सब देह का, करहु दया करतार।।
 अचल अखंड अनन्त प्रभु, व्यापक सकल जहान।
 शोभा सुर-मुनि गा रहे, करहु हृदय में ध्यान।।
 अक्षर अव्यय ईश तुम, चेतन सुख के रास।
 शोक हरहु अज्ञान का, करहु ज्ञान परकास।।- अशोक प्रवृद्ध