-अशोक “प्रवृद्ध”
अनादि पुरुष अविनाशी प्रभु, घट-घट तेरा वास।
शोभा अमित अनंत है, करहु हृदय परकास।।
अक्षर ब्रह्म अनूप तुम, आदि अंत से पार।
शोक न व्यापे जीव को, करहु कृपा करतार।।
अजन्मा अविराम प्रभु, नित नवीन सुखधाम।
शोभित सुंदर रूप है, करहु बंदगी काम।।
अगम अगोचर देव तुम, महिमा कही न जाय।
शोधत थक गये वेद सब, कहे न पार लगाय।।
अमल अकल अद्वैत तुम, सत्य सनातन रूप।
शोभामय संसार यह, कृपा तुम्हारी भूप।।
अबिगत अलख अपार प्रभु, पूरण ब्रह्म स्वरूप।
शोक-मोह सब दूर हो, करहु अनुग्रह भूप।।
अविनाशी परमात्मा, तुम ही आदि अधार।
शोभित ज्योति स्वरूप है, करहु पार संसार।।
अनघ अनामय देव तुम, कण-कण में विस्तार।
शोक मिटे सब देह का, करहु दया करतार।।
अचल अखंड अनन्त प्रभु, व्यापक सकल जहान।
शोभा सुर-मुनि गा रहे, करहु हृदय में ध्यान।।
अक्षर अव्यय ईश तुम, चेतन सुख के रास।
शोक हरहु अज्ञान का, करहु ज्ञान परकास।।- अशोक प्रवृद्ध