जल संसाधन का शोषण उत्तराखंड के हितों के खिलाफ

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-गौतम चौधरी

विकास की अवधारणा के मायने बदल रहे है। विकास का मतलब आज के परिप्रेक्ष में पश्चिम का अंधनुकरण को लिया जा रहा है। विकास के लिए कहा जा रहा है कि जिसे संसाधन के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है उसका शोषण किया जाये। इस अवधारणा के कारण अब दुनिया में परेशानी हो रही है और आधुनिका या उसे उत्तर आधुनिक भी कहा जा सकता है उस मानकों को सवा सोलह आने लागू करने वाला संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया को बचाने के लिए एक नया सिगुफा छोडा है जिसे ग्लोवल वार्मिंग के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। हमारा देश तो पश्चिम के नकल पर ही आगे बढ रहा है। सो देश का नवीनतम राज्य उत्तराखंड भी उसी रास्ते पर चलने की चाक-चौबंद योजना में है। पानी के विदोहन को उत्तराखंड की आर्थिक प्रगति के केन्द्र में रखा जाने लगा है और नदियों को बांध कर लघु जलविद्युत परियोजनाओं पर काम करने की योजना बनायी गयी है। हालांकि इस प्रकार की तकनीक को विकसित कर प्रदेश में उर्जा तो प्राप्त किया जा सकता है लेकिन इसके लिए प्रदेश की जनता को बडी कीमत चुकानी होगी। याद रहे गढवाल में प्राकृतिक वनस्पत्ति के समाप्त हो जाने के कारण गढवाल की जनता को कितनी कीमत चुकानी पडी है इसपर भी एक बार विचार किया जाना चाहिए।

जल के विदोहन के लिए जिस प्रकार की तकनीक का उपयोग किया जाता है वह न केवल महगी है अपितु उसके दुष्प्रभाव भी बहुत हैं। खास कर हिमालय का क्षेत्र ऐसे चट्टानों के द्वारा निर्मित है जो अति कमजोर है। हिमालय का निर्माण अति नवीन भू-संचलन से हुआ है। यह पर्वत श्रेणी नया है इसलिए इसके चट्टान स्थिर नहीं है। यही नहीं प्लेट टेक्टोनिक सिध्दांत के आधार पर देखा जाये तो हिमालय का अवस्थापन चीनी प्लेट और भारतीय प्लेट के बीच में है। दुनिया के दो अस्थिर क्षेत्रों में से हिमालय का नाम आत है। ऐसे में हिमायल में किसी प्रकार का अप्राकृतिक तोड-फोड खतरे से खाली नहीं है। याद रहे हिमालय के तोड-फोड का प्रभाव प्रायद्वीपीय भारत पर पडे या नहीं लेकिन मैदानी भारत पर तो इसका प्रभाव पडना तय है। हिमालय से जो नदियों निकलती है उस नदियों के कारण ही भारत का मैदानी क्षेत्र उपजाउ है। नदियों के मार्गों में अप्राकृतिक अवरोध पैदा कर बिजली उत्पादन के उपकर्णों को लगाना न केवल हिमालय पर बसे लोगों के लिए खतरा पैदा करेगा अपितु पूरे मैदानी भारत को नुक्शान पहुंचाएगा। इस नुक्शान की कीमत पर प्रदेश के विकास को हाथ में लिया जा रहा है, जिसे जायज ठहराना ठीक नहीं है।

हालांकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ले0जे0 भुवन चंद्र खंडुड़ी ने विकास के लिए जल उर्जा को महत्व तो दिया लेकिन उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि उत्तराखंड के पास जल के अलावा ऐसे कई संसाधन है जिससे प्रदेश का कायाकल्प किया जा सकता है। हालांकि संक्षिप्त वार्त में उन्होंने उन संपूर्ण संसाधनों का जिक्र तो नहीं किया, लेकिन उन्होंने कहा कि हमारे प्रदेश में जडी बुटियों की खेती प्रदेश के विकास के लिए बडे संसाधन के रूप में विकसित हो सकता है। यही नहीं प्रदेश के कई और क्षेत्रों को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। जिस प्रकार हिमाचल प्रदेश में सेव और अन्य फलों की खेती हो रही है उसी प्रकार उत्तराखंड में भी फलों की खेती की लिए जबरदस्त संभावना है। ले0 जे0 खंडुड़ी के गिनाए अन्य कई संसाधन मुझे याद नहीं है लेकिन जिस प्रकार उन्होंने प्रदेश के विकास पर टिप्पणी की उसपर अमल कर प्रदेश का काया कल्प किया जा सकता है लेकिन उत्तराखंड में जिस सस्ते और अलोकप्रिय संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है उससे अन्ततोगत्वा प्रदेश में समस्याएं बढेगी। पहाड के लोग परेशानी से बचने के लिए शिवालिग की तलहटी में आएंगे जिससे प्रदेश में नियोजन की समस्या खडी होगी, साथ ही आपसी कलह भी बढेगा जिसका दूरगामी परिणाम प्रदेश के अहित में ही होगा।

1 COMMENT

  1. पवन चक्की एवं सौर ऊर्जा बेहतर संसाधन हैं … मेरी हाल की यात्रा में पहाड़ों की स्थिति पर एवं नदियों के मार्गावारोध पर चिंताजनक स्थिति लगी . एक दूरदर्शी नीति की आवश्यकता है .

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