लेखक परिचय

पवन कुमार अरविन्द

पवन कुमार अरविन्द

देवरिया, उत्तर प्रदेश में जन्म। बी.एस-सी.(गणित), पी.जी.जे.एम.सी., एम.जे. की शिक्षा हासिल की। सन् १९९३ से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में। पाँच वर्षों तक संघ का प्रचारक। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्तीय मीडिया सेण्टर "विश्व संवाद केंद्र" गोरखपुर का प्रमुख रहते हुए "पूर्वा-संवाद" मासिक पत्रिका का संपादन। सम्प्रतिः संवाददाता, ‘एक्सप्रेस मीडिया सर्विस’ न्यूज एजेंसी, ऩई दिल्ली।

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पवन कुमार अरविंद

यह मृत्यु लोक है। यहां आत्मा और कीर्ति को छोड़कर कुछ भी अमर नहीं है। यदि आप अच्छा कार्य करते हैं तो मृत्यु के बाद भी आमजन के अन्तस में विराजमान रहेंगे। मृत्यु लोक का स्वभाव है अंत। इसलिए मनुष्य का जीवन निश्चित है। इसी प्रकार थलचर, नभचर व जलचरों सहित सभी प्राणियों का जीवन भी निश्चित है। लेकिन राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों का जीवन निश्चित नहीं होता है। उनका जीवन उनके विचारों और कार्य व्यवहारों पर निर्भर करता है। जिसको आधार मानकर जनता उनके प्रति अपना समर्थन और विश्वास व्यक्त करती रहती है। लेकिन इसके लिए परिवर्तन और समय व समाज के अनुसार स्वयं का समायोजन आवश्यक होता है। ऐसा करते हुए कोई भी संगठन अपना अस्तित्व दीर्घकाल तक बनाए रख सकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। कुछ लोगों का अनुमान है कि 2025 तक अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरा करते-करते संघ का अंतिम संस्कार निश्चित है। लेकिन ऐसा अनुमान महज बकवास के सिवाय और कुछ भी नहीं है। इस अनुमान के विपरीत संघ 2025 के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है लेकिन इसके लिए उसको अपनी कार्य पद्धति और कार्य व्यवहार पर गहन चिंतन करते हुए समय के अनुसार परिवर्तन और समायोजन के लिए तैयार रहना होगा। कुछ लोग यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि संघ स्वयं समाप्त हो जाएगा लेकिन उसके विविध क्षेत्रों में कार्यरत संगठन प्रभावी रूप से जीवित रहेंगे। लेकिन ऐसा विचार जल के सतह पर उठे बुलबुल के समान है जो पलक झपकते ही फूट जाता है।

संघ एक वैचारिक संगठन है। इस कारण उसकी एक विचारधारा है। विचार आत्मा के समान है और धारा शरीर के। शरीर का अंत निश्चित है लेकिन (श्रीमद्भग्वद्गीता के अनुसार) आत्मा अजन्मा, अविनाशी और सनातन है। संघ नहीं रहेगा तब भी उसके विचार विद्यामान रहेंगे। हालांकि संघ के रहने और न रहने का कोई सवाल ही नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि यदि किसी प्रभावी संगठन का प्रभाव नगण्य हो जाए तो यह एक प्रकार से निधन के ही समान कहा जाएगा। निधन एक बात है और पतन दूसरी। दोनों में जमीन-आसमान से अधिक का अंतर है। निधन के बाद किसी व्यक्ति या संगठन का न तो उद्भव हो सकता है और न ही पराभव। क्योंकि निधन के कारण सारी संभावनाएं शून्य हो जाती हैं। लेकन पतन की राह पर अग्रसर व्यक्ति अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तन लाकर उत्थान या उद्भव की तरफ कदम बढ़ा सकता है।

संघ में अभी बहुत श्वांस शेष है। इसके बावजूद संघ कमजोर हुआ है। संघ कार्य अब केवल बौद्धिक-भाषण तक ही सीमित हो गया है। वर्तमान संघ कार्य की प्रक्रिया में भोजन-बैठक तो है लेकिन विश्राम नदारद है। पहले कार्य होता था तो विश्राम की आवश्यकता पड़ती थी, लेकिन अब केवल “विश्राम” ही “विश्राम” है। इन बातों को तर्कों के तीर चलाकर काटा जा सकता है, लेकिन ऐसा करना वास्तविकता से मुख मोड़ना होगा। संघ में बहुत अच्छे लोग हैं। लेकिन चिंता और चिंतन की बात यह है कि इसकी कार्यपद्धति को आम युवा पसंद क्यों नहीं करते ? इस नापसंदगी के पीछे भी बहुत बड़ा कारण है। आप 87 वर्ष से एक ही लकीर पीटते चले आ रहे हैं। लकीर का फकीर बनने वाले न तो कोई नई लकीर खींच सकते हैं और न देश व समाज को नई दिशा ही दे सकते हैं। दिशा देने के लिए स्वयं की दशा बदलनी पड़ती है, और स्वयं में बदलाव कई प्रकार के मार्ग खोलता है। संघ का जीवित और प्रभावी रहना देश व समाज हित में जरूरी है।

 

3 Responses to “पतन की राह पर अग्रसर संघ (भाग 3)”

  1. amal

    नमस्कार भाई साहब …वर्तमान समय लोगों को उनकी कमियां बताने का नहीं है बल्कि खुद की कमियों को दूर करते हुए ….स्वयं को दोषमुक्त रखने का है,..

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  2. Anil Gupta

    लेखक स्वयं संघ से जुड़े रहे हैं अतः संघ के अच्छे भविष्य के लिए उनका चिंतित होना स्वाभाविक है. अपने इस हिन्दू समाज में ये विशेषता है की समयानुकूल स्वयं सुधर की प्रक्रिया अपना लेता है. आधुनिक काल में संघ का प्रादुर्भाव इसी शाश्वत परंपरा का नवीनतम रूप है. एक व्यक्ति के जीवन में सौ वर्ष की अवधि बहुत बड़ी होती है लेकिन भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के जीवन में सौ वर्ष केवल एक छोटा सा कालखंड मात्र है.आज देश व समाज में भरी परिवर्तन आया है. आज दश के किसी भी भाग में और समाज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में संघ की उपस्थिति सामान्य हो चली है. यहाँ तक की चालीस से अधिक देशों में हिन्दू संघटना का कार्य चल रहा है. अभी मै अमेरिका होकर आया हूँ और वहां भी खुले मैदान में भगवा ध्वज लगाकर हिन्दू स्वयंसेवक संघ की शाखा लगायी जाती है. परिवार शाखाएं लगती हैं जिनमे औसतन सौ से अधिक संख्या रहती है. भारत में समाज के सभी अंगों में कार्य हो रहा है. लेकिन स्थान स्थान की विशिस्ट परिस्थितियों के अनुसार कार्य की पद्धति में परिवर्तन हो सकते हैं आज समाज भी संघ से जुड़ने की मानसिकता रखता है. बस समस्या सभी वर्गों तक पहुँच कर उनके मध्य कार्यों का विस्तार करने की है. युवा वर्ग अवश्य थोडा कटा हुआ है लेकिन इसमें दोष मीडिया द्वारा सतत नकारात्मक प्रचार एक कारण है. इसके प्ररिकर के लिए वेब मिडिया का विकास कर रहे हैं. लेकिन और अधिक प्रयास की आवश्यकता है.

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    डा.राजेश कपूर

    संघ कब तक रहेगा, रहेगा या समाप्त हो जायेगा ? ये सारे प्रश्न गौण हैं, अधिक महत्व के नहीं. महत्व की बात यह है कि संघ ने किन विकट परिस्थितियों में कैसे और क्या-क्या अभिनंदनीय , उल्लेखनीय काम किये. इसके इलावा कौनसी भूलें कीं जो कि नहीं होनी चाहियें थीं. इस प्रकार संघ से प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन लेकर आगे बढ्ना उचित होगा. स्मर्णीय है कि ‘सनातन- धर्म’ और यह ‘राष्ट्र’ सनातन है. व्यक्ती और संगठन तो समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार जन्म लेते और समाप्त होते रहते हैं. संघ का काम और देश के लिये योगदान अभूतपूर्व रहा है. यदि संघ का आज के संदर्भ में मूल्यांकन करना हो तो अतीतकालीन संघ से तुलना करना उचित न होगा. वर्तमान समाज के स्तर और वर्तमान संगटनों से तुलना करना आज के संघ के मूल्यांकन करना का सही तरीका होगा. आखिर संघ के लोग भी तो इसी समाज के एक अंग हैं, इसी में से आये हैं. यदि उनका स्तर आज के समाज में औरों से श्रेष्ठ है तो यह संतोषजनक होना चाहिये. संघ के अति आदर्श्वा्दी होने की आशा और उसके लिये प्रयास करना बहुत अछी बात है पर आज वह कैसा है ; इसका मूल्यांकन तो वर्तमान की कसौटी पर करना व्यवहारिक होगा.

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