होती व्यर्थ कपोल कल्पना

donkey
एक दिन चाचा गधेराम ने, देखा सुंदर सपना|
लेकर नभ में घूम रहे थे,उड़न खटोला अपना||

खच्चर दादा बैठ बगल में,गप्पें हांक रहे थे|
रगड़ रगड़ तंबाकू चूना,गुटखा फाँक रहे थे||

चंद्र लॊक की तरफ यान ,सरसर बढ़ता जाता था|
अगल बगल में तारों का, झुरमुठ मिलता जाता था||

हाय हलो करते थे दोनों, तारे हाथ हिलाते|
चंदा मामा स्वागत करते, हँसते और मुस्कराते||

जैसे उड़न खटोला उतरा, चंदा की धरती पर|
कूद पड़े दोनों धरती पर, खुशियों से चिल्लाकर||

पर जैसे ही कदम बढ़ाये, दोनों ने कुछ आगे|
देख सामने खड़े शेर को, डरकर दोनों भागे||

नींद खुल गई गधेराम की, पड़ा पीठ पर डंडा|
खड़ा हुआ था,लेकर डंडा, घर मालिक मुस्तंडा||

कल्पित और कपोल कल्पना,होती है दुखदाई|
सच्चे जीवन कड़े परिश्रम ,में ही है अच्छाई||

2 thoughts on “होती व्यर्थ कपोल कल्पना

  1. बडी शिक्षाप्रद कहानी कविता के रूप मे.. बधाई।

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