कला-संस्कृति मनोरंजन

बिहार के लोक नृत्य 

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, वरिष्ठ राजनेता लालू प्रसाद यादव जी अक्सर अपने कार्यों से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लेते हैं। अपने जन्मदिन पर उन्होंने लौंडा नाच कराकर इस विधा की ओर ध्यान दिलाया है। यह बिहार का प्रमुख लोक नृत्य है। किसी भी क्षेत्र की संस्कृति उसके लोक संस्कृति के बल पर ही कायम रहती है।

हमारे गांव रेपुरा में रामलीला की परंपरा लंबे समय से चल रही थी। शायद 1950-60 के दशक में ही शुरुआत हुई थी। कलाकारों के लिए घर घर से राशन जमा किए जाते थे। बाद में लोग माला डालकर पूरा एक दिन का खर्च वहन करने लगे थे। रामपुर की टीम का प्रदर्शन ही अक्सर हुआ करता था। उसमें जोकर और लौंडा नाच की सूत्रधार और नटी वाली भूमिका होती थी। भारत के प्राचीन नाट्यशास्त्र में सूत्रधार- नटी की भूमिका का रेखांकन हुआ है। ये दोनों नाटक को आगे बढ़ाते हैं। बीच बीच में दर्शकों के मिजाज बदलने के लिए मनोरंजन भी भरपूर करते थे। मगह, भोजपुरी क्षेत्र में भिखारी ठाकुर,देवन मिसिर, जयननंदन कवि जैसे उम्दा कलाकार शादी विवाह पर्व त्योहार आदि के मौके पर नौटंकी, नाच गान के माध्यम से मनोरंजन के साथ तत्कालीन सामाजिक,राजनीतिक व्यवस्थाओं पर गहरा प्रहार करते थे। शादी विवाह, शिक्षा,संस्कार, प्रेम,विरह, बेरोजगारी आदि विषयों पर सुंदर प्रस्तुति होती थी।

उस दौर में महिला कलाकार नहीं होते थे। स्त्री चरित्र को पुरुष कलाकार ही बखूबी निभाते थे। रात्रि के समय कॉस्ट्यूम,रूप सज्जा, पोशाक आदि के माध्यम से बिल्कुल स्त्री जैसे ही लगते थे। भिखारी ठाकुर के नाटकों में भी स्त्री पात्र की भूमिका पुरुष करते थे। उसमें लौंडा नाच भी रहता था। रेपुरा की संस्था यूनिटी के तत्वावधान में यूनिटी रंग उत्सव में हाजीपुर के कलाकारों ने दाउदनगर में भिखारी ठाकुर के गबर घिचोर नाटक का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था। इसमें स्त्रियों ने भी भाग लिया था। वर्तमान दौर अब आगे निकल चुका है।

  संस्कृति के इस दौर की समाप्ति के बाद अश्लीलता,अंग प्रदर्शन,भड़काऊ पोशाक में अधनंगे बदन में स्त्रियों के स्वच्छंद डांस का दौर आया। पारसी थियेटर का सीधा प्रभाव इन क्षेत्रों पर भी पड़ा। इसे आर्केस्ट्रा संस्कृति कह सकते हैं। इसमें स्त्रियों को एक मनोरंजन की वस्तु के रूप में पेश किया जाने लगा। इसे लेडीज डांस की संज्ञा दी गई। फिल्मों के बढ़ते प्रभाव के दौर में यह अत्यंत तीव्र गति से बढ़ा। इसने संस्कृति को प्रदूषित कर दिया। महिलाओं को स्वच्छंद बनाने में इसकी बड़ी भूमिका है। इनके पोशाक का अनुकरण समाज में भी लड़कियों और महिलाओं ने किया। अब तो बार डांसर का युग आ चुका है। इनके कपड़ों के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन स्त्रियों ने इसी को अपनी स्वतंत्रता का मानक बना लिया।। हालांकि यूट्युब,सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफार्म के जमाने में ये कल्चर भी अप्रासंगिक हो रहा है। शादी विवाह के अवसर पर अब देखने वालों की भीड़ भी नहीं होती है। केवल कुछ युवा, किशोर उनके साथ थिरकते दिख जाते हैं। आज भी बड़े बुजुर्ग इसके समर्थक नहीं हैं।

  बहरहाल लालू जी ने बिहार की उस सुंदर संस्कृति और परंपरा को जीवंत कर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है।

अंबुज कुमार