समाज

बारह बजे के वादे से शाम की सड़क तक

कुमार कृष्णन

  जमुई से सामने आया एक वीडियो बिहार में सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर कई असहज सवाल छोड़ गया है। वीडियो में एक नाबालिग लड़की और एक नाबालिग लड़के को कुछ लोग घेरते दिखाई देते हैं। लड़की उन्हें छोड़ देने की गुहार लगाती नजर आती है। लड़का अपने और लड़की के बारे में सफाई देता दिखाई देता है। वीडियो के दूसरे हिस्से में दोनों को रोकने, लड़के के साथ मारपीट करने और लड़की के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किए जाने के दृश्य दिखाई देते हैं। वीडियो की पूरी परिस्थितियों और उसमें दिखाई देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।

  पुलिस के अनुसार घटना 19 सितंबर की शाम करीब सात बजे जमुई में हुई। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने दोनों नाबालिगों तक पहुंचकर उनके बयान दर्ज किए और प्राथमिकी दर्ज की। पुलिस की ओर से तीन गिरफ्तारियों की जानकारी दी गई है। सोमवार को बिहार के एडीजी कानून-व्यवस्था के.एस. अनुपम ने बताया कि गिरफ्तार किए गए तीनों नाबालिग हैं और उनमें दो की उम्र 17 से 18 वर्ष के बीच बताई गई है। उनके अनुसार जमुई थाने में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 128, 74 और 75 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 8 और 12 के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया है, जिसकी निगरानी जमुई के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी कर रहे हैं।

  पुलिस की कार्रवाई के साथ एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। घटना का वीडियो जिस तरह सामाजिक माध्यमों पर फैला, उसके बाद पुलिस ने वीडियो प्रसारित करने वाले खातों पर भी कार्रवाई शुरू की है। पुलिस ने कई फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स खातों को हटाने के लिए चिह्नित किए जाने की जानकारी दी है। नाबालिगों से संबंधित वीडियो को बार-बार साझा करना उनकी निजता और गरिमा के लिए दूसरी क्षति बन सकता है। जिस सामग्री ने पुलिस को घटना तक पहुंचने में मदद की, वही सामग्री अगर बिना रोक-टोक प्रसारित होती रहे तो वह न्याय का साधन नहीं, बल्कि नाबालिगों के लिए नई परेशानी बन सकती है।

  यह भी ध्यान देने योग्य है कि पुलिस के अनुसार घटना के तुरंत बाद दोनों नाबालिगों की ओर से कोई औपचारिक शिकायत नहीं की गई थी। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने उसमें दिखाई दे रहे वाहन के पंजीकरण नंबर सहित उपलब्ध सुरागों के आधार पर दोनों तक पहुंच बनाई। इससे व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या किसी नाबालिग को सुरक्षा और न्याय की प्रक्रिया तक पहुंचने के लिए घटना का वीडियो सार्वजनिक होना जरूरी है?

  यहीं से मामला केवल एक घटना का नहीं रह जाता। यह उस सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था का सवाल बन जाता है जिसमें किसी सड़क पर कुछ लोग किसी लड़के और लड़की को रोकते हैं, उनसे सवाल करते हैं और उनके निजी संबंधों पर फैसला सुनाने की कोशिश करते हैं। किसी व्यक्ति के व्यवहार पर किसी को आपत्ति हो सकती है। किसी को कोई आशंका भी हो सकती है। लेकिन आपत्ति या आशंका किसी नागरिक को स्वयं कानून लागू करने का अधिकार नहीं देती।

  किसी शिकायत या संदेह की स्थिति में पुलिस और कानूनी प्रक्रिया का रास्ता मौजूद है। सड़क पर किसी को घेरना, रोकना, धमकाना या बलपूर्वक व्यवहार करना अपने आप में अलग कानूनी प्रश्न खड़े कर सकता है। उन प्रश्नों का उत्तर उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर जांच में ही दिया जा सकता है। किसी वीडियो के आधार पर तत्काल सामाजिक फैसला सुनाना भी न्याय नहीं है।

  समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब भीड़ अपने अनुमान को तथ्य, अपनी नाराजगी को न्याय और अपनी सामाजिक मान्यता को कानून मानने लगती है। लोकतंत्र में कानून की जगह भीड़ का विवेक लेने लगे तो सबसे पहले नागरिक की स्वतंत्रता और गरिमा कमजोर होती है। आज किसी लड़की और लड़के को देखकर भीड़ फैसला सुनाएगी, कल किसी और नागरिक को किसी दूसरे कारण से घेरा जा सकता है।

‘संस्कृति’ के नाम पर निजी जिंदगी की निगरानी भी इसी मानसिकता का हिस्सा बन सकती है। समाज की अपनी मान्यताएं हो सकती हैं, लेकिन किसी लड़की या लड़के के चरित्र, संबंध या निजी जीवन का फैसला सड़क पर खड़ी भीड़ नहीं कर सकती। सामाजिक मान्यता का हवाला कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

  जमुई की घटना का एक राजनीतिक संदर्भ भी है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का जन्म और पैतृक संबंध मुंगेर जिले के तारापुर क्षेत्र से जुड़ा है और वे तारापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हैं। बिहार विधानसभा की जानकारी भी उन्हें तारापुर का विधायक बताती है। तारापुर विधानसभा क्षेत्र जमुई लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है।

इस भौगोलिक और राजनीतिक संदर्भ का अर्थ यह नहीं है कि मुख्यमंत्री को इस घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए। किसी आपराधिक घटना की कानूनी जिम्मेदारी उस व्यक्ति की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होती है। लेकिन सरकार की जवाबदेही का प्रश्न अलग है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार से यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है।

  जमुई की घटना के बीच सम्राट चौधरी का एक पुराना बयान भी सामाजिक माध्यमों पर फिर चर्चा में है। सितंबर 2025 में उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बिहार के गांवों में सुरक्षा को लेकर कहा था कि रात के बारह बजे भी कोई गांव में घूमकर आए और किसी ने उसे छू दिया तो वे सुबह इस्तीफा दे देंगे। बयान उस समय सुरक्षा को लेकर उनके राजनीतिक आश्वासन के रूप में सामने आया था।

आज उस बयान को जमुई की घटना के साथ जोड़कर साझा किया जा रहा है। यह स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस का हिस्सा है लेकिन पुराने बयान को वर्तमान घटना पर सीधे लागू कर देना भी उचित नहीं होगा। फिर भी लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल अपनी जगह है—जब राजनीतिक नेतृत्व नागरिक सुरक्षा को लेकर इतना स्पष्ट भरोसा व्यक्त करता है, तो जमीन पर नागरिकों का अनुभव उस भरोसे से कितना मेल खाता है?

  वादे और वास्तविकता के बीच की दूरी पर सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है। सुरक्षा का दावा केवल भाषणों में नहीं, बल्कि उस सड़क पर परखा जाता है जहां कोई लड़की शाम के समय घर, विद्यालय या कोचिंग से लौट रही हो। कानून का भरोसा तभी बनता है जब नागरिक को यह विश्वास हो कि सार्वजनिक स्थान पर कोई भीड़ उसके बारे में फैसला करने के लिए स्वतंत्र नहीं है।

  सम्राट चौधरी के कार्यकाल में बिहार के अलग-अलग हिस्सों से महिलाओं और अन्य नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर घटनाओं की खबरें भी सामने आई हैं। इन घटनाओं का विस्तृत विवरण इस आलेख का विषय नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि महिला और बाल सुरक्षा की समीक्षा किसी एक घटना के बाद शुरू होकर दूसरी घटना तक सीमित न रहे। पुलिस की जवाबदेही, गश्त, शिकायत व्यवस्था और संवेदनशील मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया की नियमित समीक्षा जरूरी है।

  जमुई की घटना पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी सवाल उठाया है। उन्होंने सार्वजनिक सड़क पर लड़की की सुरक्षा को लेकर बिहार सरकार से जवाब मांगा और घटना में शामिल लोगों की पहचान तथा पॉक्सो कानून के तहत कार्रवाई और शीघ्र न्याय की मांग की। यह एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है। किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण, हालांकि, जांच में सामने आए साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

  राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है और पुलिस से कार्रवाई की जानकारी मांगी है। आयोग की ओर से नाबालिग की पहचान और वीडियो के प्रसार को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी घटना पर सार्वजनिक आक्रोश के बीच अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि घटना में शामिल नाबालिगों की पहचान और गरिमा की रक्षा भी कानून और समाज की जिम्मेदारी है।

इस मामले में तीन गिरफ्तारियां हुई हैं। लेकिन गिरफ्तारी अपने आप में आरोपों के अंतिम रूप से सिद्ध हो जाने का प्रमाण नहीं है। खासकर जब गिरफ्तार किए गए लोग नाबालिग बताए जा रहे हों, तब किशोर न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जांच में यह तय होना है कि घटना की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, वहां कौन-कौन मौजूद था और उपलब्ध साक्ष्यों से प्रत्येक व्यक्ति की क्या भूमिका सामने आती है। दोष सिद्धि का प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया से तय होगा।

  वीडियो को भी इसी सावधानी से देखने की जरूरत है। वीडियो जांच का महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, लेकिन वह अपने आप में पूरी घटना का कानूनी निष्कर्ष नहीं होता। वीडियो की प्रामाणिकता, घटना से पहले और बाद की परिस्थितियां तथा उसमें दिखाई देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका का परीक्षण जरूरी है। सामाजिक माध्यमों पर चल रही अधूरी जानकारी को अंतिम सत्य मान लेना न्याय की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

  इस घटना में पुलिस की त्वरित कार्रवाई महत्वपूर्ण है। लेकिन कानून-व्यवस्था की असली परीक्षा केवल घटना के बाद की कार्रवाई से नहीं होती। सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस की मौजूदगी, संवेदनशील इलाकों में निगरानी, आपात सहायता, शिकायत दर्ज कराने का भरोसा और घटना की सूचना मिलते ही प्रतिक्रिया—ये सभी नागरिक सुरक्षा के हिस्से हैं।

  सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि लड़कियों को बताया जाए कि वे कब और कहां निकलें। सुरक्षा का अर्थ यह है कि सड़क पर निकलने वाला हर नागरिक यह भरोसा रखे कि कोई भीड़ उसे रोककर उसके बारे में फैसला नहीं करेगी। अगर किसी को कोई शिकायत है तो वह पुलिस तक जाएगा, पुलिस कानून के अनुसार जांच करेगी और न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करेगा।

  जमुई की घटना एक सामाजिक सवाल भी सामने रखती है। किसी लड़की और लड़के को साथ देखकर उनके चरित्र या संबंधों पर फैसला सुनाने की प्रवृत्ति आखिर किस तरह के समाज का निर्माण कर रही है? क्या सार्वजनिक सड़कें नागरिकों की आवाजाही के लिए हैं या नैतिक निगरानी के लिए? क्या सामाजिक असहमति का समाधान भीड़ करेगी या कानून?

  इन सवालों का जवाब केवल सरकार से नहीं, समाज से भी मांगा जाना चाहिए। भीड़ में शामिल होना किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं कर देता। किसी वीडियो को बनाना, प्रसारित करना या उसके आधार पर किसी की पहचान सार्वजनिक करना भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। नागरिक समाज का काम तमाशा देखना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर कानून और पीड़ित की सुरक्षा के पक्ष में खड़ा होना है।

सरकार के सामने अब दो स्तरों की जिम्मेदारी है। पहला, जमुई की घटना की जांच निष्पक्ष, साक्ष्य-आधारित और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़े। दूसरा, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की पहचान की जाए। एसआईटी का गठन जांच की शुरुआत है, उसका परिणाम नहीं। असली सवाल यह है कि जांच से तथ्य कितनी स्पष्टता से सामने आते हैं और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कितनी प्रभावी होती है।

  सम्राट चौधरी के पुराने बयान और जमुई की वर्तमान घटना को एक साथ रखने का अर्थ यह नहीं कि दोनों को एक ही घटना या एक ही जिम्मेदारी मान लिया जाए। अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक सुरक्षा के बारे में किए गए राजनीतिक आश्वासनों को जमीन पर नागरिकों के अनुभव से भी देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में आश्वासन और वास्तविकता के बीच की दूरी पर सवाल पूछना नागरिक अधिकार है।

  जमुई की घटना का अंतिम मूल्यांकन जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगा। लेकिन इसका सामाजिक प्रश्न अभी से सामने है। किसी लड़की को सड़क पर सुरक्षित होने के लिए किसी वीडियो के वायरल होने का इंतजार क्यों करना पड़े? किसी नाबालिग को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए भीड़ के सामने हाथ जोड़ने की नौबत क्यों आए?

कानून की ताकत केवल उसकी किताब में लिखे होने से नहीं होती। उसकी ताकत नागरिक के उस भरोसे में होती है कि सड़क पर भी कानून मौजूद है। अगर भीड़ पहले फैसला सुनाए और कानून बाद में पहुंचे, तो नागरिक के मन में कानून की जगह भय ले सकता है।

  इसलिए जमुई की घटना का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि 19 सितंबर की शाम वहां क्या हुआ। बड़ा सवाल यह है कि सड़क पर कानून से बड़ी भीड़ होने का आत्मविश्वास आखिर आता कहां से है?

  लोकतंत्र में किसी नागरिक की गरिमा का फैसला भीड़ नहीं कर सकती। किसी आरोप की जांच पुलिस करेगी, साक्ष्यों का परीक्षण होगा और दोष या निर्दोषता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया से होगा। यही कानून के शासन का आधार है। और यही भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को सड़क तक पहुंचाना होगा।

कुमार कृष्णन