उमेश कुमार साहू
“गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥”
ऋग्वेद का यह प्रसिद्ध मंत्र भारतीय धार्मिक परंपरा में ‘गणपति’ शब्द की प्राचीनता का स्मरण कराता है। हालांकि वैदिक व्याख्या में यहां ‘गणपति’ का संबंध ब्रह्मणस्पति से है, फिर भी आगे चलकर यही ‘गणपति’ नाम एक ऐसी महान देवपरंपरा का आधार बना, जिसके केंद्र में बुद्धि, विवेक, मंगल, सिद्धि और विघ्न-विनाश की अवधारणा विकसित हुई। इसीलिए गणेश की कहानी केवल किसी एक देवता की जन्मकथा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के विकास की भी कहानी है।
आज गणेशोत्सव के अवसर पर घर-घर और गली-गली गूंजता “गणपति बप्पा मोरया” हजारों वर्षों पुरानी उस आस्था की आधुनिक अभिव्यक्ति है जिसमें गणेश को कार्यारंभ के देवता, बुद्धि के अधिपति और विघ्नहर्ता के रूप में स्मरण किया जाता है।
वेदों से पुराणों तक
गणेश के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए वैदिक साहित्य और बाद के पुराणिक साहित्य के बीच के विकास को समझना आवश्यक है। ऋग्वेद में ‘गणपति’ शब्द मिलता है, किंतु हाथी-मुखी गणेश का स्पष्ट स्वरूप बाद के साहित्य में विकसित दिखाई देता है।
महाभारत, रामायण और पुराणों की परंपराओं में गणेश का व्यक्तित्व अधिक स्पष्ट होता जाता है। पुराणों में वे शिव और पार्वती के पुत्र, देवताओं के अग्रपूज्य तथा विघ्नों के निवारक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित विभिन्न पुराणिक परंपराओं में गणेश से जुड़ी कथाएं मिलती हैं। बाद में गणेश पुराण और मुद्गल पुराण तो विशेष रूप से गणपति-तत्त्व, उनके स्वरूप, अवतारों, उपासना और महिमा को समर्पित ग्रंथ बन गए।
गणेश की सबसे लोकप्रिय जन्मकथा शिव-पार्वती से जुड़ी है। कथा के अनुसार पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से बालक की रचना की और उसे द्वारपाल बनाया। शिव के आगमन पर बालक ने उन्हें रोक दिया। संघर्ष में शिव ने उसका मस्तक अलग कर दिया और बाद में हाथी का सिर लगाकर उसे पुनर्जीवित किया। यही कथा गणेश के एकदंत, गजानन और लंबोदर स्वरूप के साथ जुड़ी अनेक प्रतीकात्मक व्याख्याओं का आधार बनी।
गणपति अथर्वशीर्ष : गणेश को ब्रह्म के रूप में देखने की दृष्टि
गणेश-उपासना के इतिहास में गणपति अथर्वशीर्ष का विशेष महत्व है। यह एक उत्तरकालीन उपनिषदिक ग्रंथ है, जिसे परंपरा अथर्ववेद से संबद्ध मानती है। इसमें गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि स्वयं परम तत्त्व के रूप में देखा गया है।
इसका उद्घोष है –
“ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्तासि, त्वमेव केवलं धर्तासि,
त्वमेव केवलं हर्तासि…”
अर्थात – हे गणपति! आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं; आप ही कर्ता, धर्ता और संहर्ता हैं। आगे इसी ग्रंथ में गणेश को ब्रह्म, आत्मा, ज्ञान और विज्ञान के रूप में निरूपित किया गया है।
इसी अथर्वशीर्ष में गणेश मंत्र की व्याख्या करते हुए “ॐ गं गणपतये नमः” तथा गणेश गायत्री –
“एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥”
का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार गणेश-भक्ति केवल कर्मकांड नहीं रह जाती, बल्कि वह ज्ञान, आत्मचिंतन और ब्रह्मतत्त्व से जुड़ जाती है।
मूर्त रूप में गणेश का विस्तार
गणेश की उपासना का विकास केवल ग्रंथों में नहीं हुआ। भारतीय कला और मूर्तिकला में भी उनका स्वरूप क्रमशः स्थापित हुआ। इतिहासकारों और कला-विशेषज्ञों के अनुसार हाथी-मुखी गणेश की स्वतंत्र मूर्तियां प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के बाद अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती हैं और गुप्त तथा उत्तर-गुप्त काल में गणेश की स्वतंत्र देवता के रूप में प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ती दिखाई देती है।
इसके बाद मध्यकाल में गणेश की उपासना भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय रूपों में फैलती गई। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य भारत, दक्षिण भारत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया तक गणेश की मूर्तियां और उपासना परंपराएं पहुंचीं। चोलकालीन कला में भी गणेश की प्रभावशाली मूर्तियां मिलती हैं।
उनका स्वरूप भी प्रतीकों से भरपूर है – विशाल मस्तक बुद्धि का, बड़े कान सुनने की क्षमता का, छोटी आंखें एकाग्रता की, लंबी सूंड विवेक और अनुकूलन की, बड़ा उदर जीवन के अनुभवों को समाहित करने की क्षमता का और एक दंत त्याग एवं सार ग्रहण करने का प्रतीक माना जाता है। उनका वाहन मूषक भी एक गहरी प्रतीकात्मक कथा कहता है – विशाल शक्ति का सूक्ष्मतम साधन पर नियंत्रण।
अग्रपूजा की परंपरा कैसे बनी?
भारतीय जीवन में गणेश को हर शुभ कार्य के आरंभ में स्मरण करने की परंपरा इतनी गहरी हुई कि विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार, लेखन, यात्रा और धार्मिक अनुष्ठान – सबमें गणेश-वंदना का स्थान बना।
इसके पीछे केवल “विघ्न दूर करने” की मान्यता नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक सोच भी है-किसी भी बड़े कार्य से पहले बुद्धि, विवेक और संयम का स्मरण।
इसीलिए वे विनायक, विघ्नेश्वर, गणपति, गणनायक, गजानन, एकदंत, वक्रतुण्ड, लंबोदर, हेरम्ब, द्वैमातुर जैसे अनेक नामों से पूजे गए। गणेश के 12 प्रमुख नामों और 108 नामों की स्तुतियां भी लोकप्रिय हुईं।
मध्यकाल से आधुनिक गणेशोत्सव तक
मध्यकाल में गणेश आराधना राजपरिवारों, मंदिरों और घरेलू परंपराओं के साथ आगे बढ़ी। महाराष्ट्र में मराठा और पेशवा काल के दौरान गणेश पूजा को विशेष संरक्षण मिला। गणेशोत्सव की घरेलू और सामुदायिक परंपराएं इसी सांस्कृतिक वातावरण में मजबूत हुईं।
लेकिन आधुनिक भारत में गणेशोत्सव का सबसे बड़ा रूपांतरण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में हुआ। 1890 के दशक में पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव की पहल हुई और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 के आसपास इसे व्यापक सार्वजनिक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने गणेश को ऐसा लोकदेवता माना, जिसकी आराधना सामाजिक वर्गों की सीमाओं को पार कर लोगों को एक मंच पर ला सकती थी। धार्मिक उत्सव के माध्यम से सामाजिक एकता, सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना को बल मिला।
यहीं से गणेशोत्सव केवल घर का पर्व नहीं रहा; वह समाज, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन का उत्सव बन गया।
आज का गणेशोत्सव : परंपरा से भविष्य की ओर
आज गणेशोत्सव भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुका है। विशाल पंडाल, कलात्मक प्रतिमाएं, भजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विसर्जन यात्राएं इसकी आधुनिक पहचान हैं मगर इस भव्यता के बीच गणेश की मूल शिक्षा को भूलना नहीं चाहिए।
गणेश का अर्थ केवल उत्सव नहीं – बुद्धि का सम्मान, विवेक का जागरण, अहंकार पर नियंत्रण और शुभ कार्य का संकल्प भी है।
हजारों वर्षों की इस यात्रा में गणपति ने अपना स्वरूप बदला, उपासना की पद्धतियां बदलीं, समाज बदला और समय बदला; लेकिन उनका मूल संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है –
जहां बुद्धि है, वहां विवेक है।
जहां विवेक है, वहां सही निर्णय है।
और जहां सही निर्णय है, वहां विघ्नों पर विजय का मार्ग खुलता है।
इसीलिए गणेश केवल देवालयों के देवता नहीं, भारतीय सभ्यता की उस जीवंत परंपरा के प्रतीक हैं जो हर नए आरंभ से पहले कहती है –
“श्री गणेशाय नमः।”