पर्यावरण लेख दिखावे से नहीं, इरादों से बचेगी पृथ्वी June 4, 2026 / June 4, 2026 | Leave a Comment हम अक्सर सोचते हैं कि "अकेले मेरे बदलने से क्या होगा?" बस यही सोच सबसे आत्मघाती है। जब तक हर व्यक्ति खुद को इस तबाही का जिम्मेदार नहीं मानेगा, तब तक कोई भी कानून या सरकारी योजना इस धरती को नहीं बचा सकती।इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें खुद से कुछ कड़े सवाल करने होंगे: Read more » विश्व पर्यावरण दिवस
विश्ववार्ता ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य : क्या सच में हमारे बीच आ चुके हैं एलियंस? May 22, 2026 / May 22, 2026 | Leave a Comment अमेरिकी सरकार द्वारा धीरे-धीरे इन फाइलों को सार्वजनिक करना (Soft Disclosure) इस बात का संकेत है कि वे दुनिया को किसी बड़े सच के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं। अचानक यह घोषणा कर देना कि 'हम अकेले नहीं हैं', पूरी दुनिया की धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को हिलाकर रख सकता है। Read more » एलियंस
समाज ‘डिप्रेशन’ और ‘डिस्ट्रैक्शन’ के दौर में राम : नई पीढ़ी के लिए 10 माइंडफुलनेस सर्वाइवल मंत्र March 25, 2026 / March 25, 2026 | Leave a Comment आज की पीढ़ी को 'तनाव' विरासत में मिला है। राम का जीवन सिखाता है कि जिस सुबह राज्याभिषेक होना था, उसी सुबह वनवास मिला पर उनके माथे पर एक शिकन तक न थी। Read more » 10 माइंडफुलनेस सर्वाइवल मंत्र
पर्यावरण लेख ब्लू गोल्ड का अंत : क्या हम ब्रह्मांड के सबसे अमीर ‘कंगाल’ होने जा रहे हैं? March 20, 2026 / March 20, 2026 | Leave a Comment विश्व जल दिवस Read more » विश्व जल दिवस
महिला-जगत लेख डिजिटल चकाचौंध के जाल में फंसा स्त्री का अस्तित्व और सुरक्षा की चुनौतियां March 6, 2026 / March 6, 2026 | Leave a Comment 8 मार्च का कैलेंडर एक बार फिर हमारे सामने है। विज्ञापनों की चकाचौंध, सोशल मीडिया पर 'विमेंस डे सेल' के ऑफर्स और 'पिंक रिवोल्यूशन' के नारों के Read more » the challenges of women's existence and safety Trapped in the digital glare महिला दिवस
पर्यावरण लेख पलाश की सिंदूरी आभा : फागुन का दहकता दर्पण, जिसमें झांकती है हमारी परंपरा February 27, 2026 / February 27, 2026 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू जब फागुन की बयार चलती है तो प्रकृति मानो अपना मौन तोड़कर रंगों की भाषा में बात करने लगती है। इस संवाद का सबसे प्रखर और दीप्तिमान शब्द है – पलाश। जिसे हम लोकभाषा में ‘टेसू’ या ‘ढाक’ भी कहते हैं। पलाश मात्र एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उस अदम्य जिजीविषा का प्रतीक […] Read more » पलाश की सिंदूरी आभा
खान-पान धर्म-अध्यात्म तिल-गुड़ और पतंगें : संक्रांति का वह दर्शन, जो सिखाता है समरसता और उड़ान January 14, 2026 / January 14, 2026 | Leave a Comment मकर संक्रांति का आधार पूर्णतः वैज्ञानिक और खगोलीय है। यह वह संधि काल है जब सूर्य दक्षिणायन की यात्रा पूर्ण कर 'उत्तरायण' की ओर अग्रसर होते हैं। भारतीय दर्शन में उत्तरायण केवल दिशा का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है। भीष्म पितामह का इस काल की प्रतीक्षा करना प्रमाणित करता है कि यह समय आत्मिक उन्नति औ Read more »
मनोरंजन सपनों का गुप्त विज्ञान : नींद के भीतर चलती अदृश्य प्रयोगशाला December 12, 2025 / December 12, 2025 | Leave a Comment रात की नींद हमें हर दिन थकान से राहत देती है लेकिन हमारे मस्तिष्क के लिए यह एक छुपी हुई प्रयोगशाला बन जाती है जहाँ वह हमारी यादों को तराशता है, Read more » नींद के भीतर चलती अदृश्य प्रयोगशाला सपनों का गुप्त विज्ञान
खान-पान सर्दियों में सेहत की सुरक्षा November 26, 2025 / November 26, 2025 | Leave a Comment सर्दियों की ठंडक मन को सुकून देती है लेकिन यह मौसम शरीर से गर्माहट भी छीन लेता है। वायरल इंफेक्शन, खांसी-जुकाम, स्किन ड्राइनेस और मौसमजनित आलस। Read more » सर्दियों में सेहत की सुरक्षा
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म वर्त-त्यौहार धरती के माथे का तिलक गोवर्धन, जहाँ ईश्वर ने विनम्रता सिखाई October 21, 2025 / October 21, 2025 | Leave a Comment भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथियों के अनुसार मनाए जाने वाले उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के संतुलन को समझाने वाले अध्याय हैं। ऐसा ही एक दिव्य पर्व है – गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है। यह दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, जब सम्पूर्ण व्रज भूमि में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाई देता है। परंतु इस पर्व का रहस्य केवल पूजा या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन के अहंकार, विनम्रता, प्रकृति और भगवान के साथ सामंजस्य का गूढ़ संदेश देता है। अहंकार के गर्व को तोड़ने वाली लीला प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब इंद्र के मन में अपनी देवत्व-शक्ति का अहंकार अत्यधिक बढ़ गया, तो उन्होंने वर्षा के नियंत्रण को अपनी व्यक्तिगत सत्ता समझ लिया। वे भूल गए कि वर्षा भी उसी परम ब्रह्म की व्यवस्था का एक अंश है। उसी समय बालरूप श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को समझाया कि “हम सबका पोषण इंद्र नहीं, प्रकृति करती है – यह गोवर्धन पर्वत, यह गायें, यह वन-भूमि।” इंद्र-यज्ञ को रोककर उन्होंने व्रजवासियों से कहा कि वे इस पर्वत का पूजन करें, क्योंकि यह हमारी अन्नदात्री धरती का प्रतीक है। जब इंद्र को यह बात अहंकारजन्य लगी, तो उन्होंने प्रलयकारी वर्षा से गोकुल को डुबाने का प्रयास किया। परंतु वही बालक श्रीकृष्ण सात दिनों तक अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे, और समस्त व्रज की रक्षा की। यह केवल चमत्कार नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक शिक्षा थी – जिसके भीतर श्रद्धा और करुणा का बल हो, उसके लिए प्रकृति भी सहायक बन जाती है। गोवर्धन की दिव्यता और प्रतीकात्मकता गोवर्धन केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि जीवित चेतना का प्रतीक माना गया है। यह पर्वत धरती, जल, वायु और जीवन के संरक्षण का साक्षात् प्रतीक है। पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को गोवर्धन के रूप में प्रकट कर यह दर्शाया कि ईश्वर प्रकृति में ही बसते हैं। गोवर्धन पूजा का अर्थ केवल पहाड़ की आराधना नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण से ही संभव है। जब हम गोवर्धन की पूजा करते हैं, तो वस्तुतः हम अपने अन्न, जल, पशु, वनस्पति और पर्यावरण का सम्मान करते हैं। अन्नकूट का दार्शनिक अर्थ गोवर्धन पूजा के दिन व्रजवासी तरह-तरह के अन्न और पकवान बनाकर उन्हें पर्वत के प्रतीक रूप में सजाते हैं, इसे अन्नकूट कहा जाता है। यह केवल भोग नहीं, बल्कि “अन्न ही ब्रह्म है” की वेदवाणी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है। इस दिन मनुष्य अपने श्रम और प्रकृति की देन के प्रति आभार प्रकट करता है। अन्नकूट यह सिखाता है कि समृद्धि तब तक अर्थहीन है जब तक उसमें बाँटने की भावना न हो। श्रीकृष्ण ने जब सबके साथ बैठकर अन्न का सेवन किया, तो यह सामाजिक समरसता और समानता का अद्भुत उदाहरण बना। विनम्रता का पाठ इंद्र का अहंकार तब शांत हुआ जब उन्होंने देखा कि जिस ‘बालक’ को वे साधारण मानव समझते थे, वही परमात्मा स्वयं हैं। वे पश्चाताप से भर उठे और श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। इस क्षण में देवता से भी बड़ा दर्शन छिपा है – जिस क्षण अहंकार मिटता है, वहीं सच्चा देवत्व प्रकट होता है। आज जब मानव अपने विज्ञान, सत्ता और संपत्ति के बल पर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा है, तब गोवर्धन लीला यह याद दिलाती है कि अहंकार चाहे देवों में भी क्यों न हो, उसका पतन निश्चित है। गोवर्धन और आधुनिक संदर्भ यदि हम इस पर्व को आधुनिक दृष्टि से देखें, तो यह पर्यावरण चेतना का सबसे प्राचीन संदेश देता है। गोवर्धन पूजा बताती है कि मानव को केवल उपभोग नहीं, बल्कि संरक्षण का भाव रखना चाहिए। आज जब धरती जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अंधाधुंध उपभोग से कराह रही है, तब श्रीकृष्ण की यह लीला हमें पुनः सिखाती है कि — “धरती की पूजा करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।” गोवर्धन पूजा में गायों की सेवा, अन्न का दान, वृक्षों का पूजन और पशुधन की रक्षा, ये सब प्रतीक हैं संतुलित जीवन के। गोप और गोकुल की आत्मा गोवर्धन पूजा केवल धर्म का पालन नहीं, बल्कि प्रेम और समुदाय की अभिव्यक्ति भी है। जिस प्रकार सभी व्रजवासी बच्चे, वृद्ध, नारी, पुरुष एक साथ खड़े होकर संकट का सामना करते हैं, वही समाज की एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। आज जब समाज में विभाजन और स्वार्थ की दीवारें ऊँची हो रही हैं, तब गोवर्धन पर्व यह संदेश देता है कि “एकता और सहयोग से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।” गिरिराज की पावन स्मृति व्रजभूमि में आज भी गोवर्धन पर्वत के परिक्रमा-पथ पर लाखों श्रद्धालु जाते हैं। कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण का चरण पड़ा, वहाँ की मिट्टी भी तिलक बन जाती है। गिरिराज के चरणों में झुकना, वास्तव में स्वयं के अहंकार को मिटाना है। गोवर्धन का प्रत्येक कंकड़ हमें यह सिखाता है कि जो झुकता है, वही ऊँचा उठता है। गोवर्धन का शाश्वत संदेश गोवर्धन पूजा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह हमें सिखाता है – · अहंकार का अंत ही दिव्यता की शुरुआत है। · प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है। · समरसता और सहयोग ही जीवन का आधार हैं। जब-जब मानव अपने सीमित अस्तित्व को ईश्वर से बड़ा समझने लगेगा, तब-तब कोई न कोई श्रीकृष्ण उसे उसकी मर्यादा का स्मरण कराएगा। गोवर्धन पर्व इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर की विनम्रता और प्रेम में निवास करते हैं। और शायद यही कारण है कि यह पर्व दीपोत्सव के अगले दिन आता है, क्योंकि अहंकार के अंधकार के बाद ही भक्ति का प्रकाश फैलता है। उमेश कुमार साहू Read more » गोवर्धन पूजा
धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार दीपावली : सभ्यता की स्मृति में जलता हुआ ज्ञानदीप October 19, 2025 / October 19, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू भारत की संस्कृति में पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे जीवन के सूत्र हैं, जो समय की धारा में मनुष्य की चेतना को प्रकाशित करते हैं। इन्हीं में दीपावली, वह अनोखा पर्व है जो प्रकाश से अधिक ‘अर्थ’ का उत्सव है। यह केवल दीप जलाने का नहीं, ‘अंधकार से संवाद’ करने का […] Read more » दीपावली
धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार वर्त-त्यौहार रूप चतुर्दशी : आंतरिक सुंदरता और सकारात्मक ऊर्जा का महापर्व October 17, 2025 / October 17, 2025 | Leave a Comment दीपोत्सव विशेष : रूप चतुर्दशी 2025 ( दीपावली से एक दिन पहले ) उमेश कुमार साहू दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाला रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का उत्सव भी है। इस दिन को छोटी दिवाली और काली चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ दीपावली धन और समृद्धि का […] Read more » दीपावली से एक दिन पहले दीपोत्सव विशेष : रूप चतुर्दशी 2025