लेख

जेन-जी, जरा ठहरकर सोचो : नौकरी की लड़ाई में न्याय चाहिए या पूरी व्यवस्था का विध्वंस?

अशोक कुमार झा


रांची की सड़कों पर इन दिनों युवाओं की आवाज सुनाई दे रही है। यह आवाज केवल किसी एक परीक्षा, किसी एक नियुक्ति अथवा किसी एक सरकारी विभाग की शिकायत नहीं है, बल्कि यह उस बेचैनी की आवाज है जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे झारखंड के हजारों-लाखों युवाओं के भीतर जमा होती जा रही है। युवा रोजगार चाहते हैं, निष्पक्ष परीक्षा चाहते हैं, पारदर्शी नियुक्ति चाहते हैं और सबसे बढ़कर यह भरोसा चाहते हैं कि यदि वे ईमानदारी से मेहनत करेंगे तो उनकी मेहनत का परिणाम किसी सिफारिश, पैसे, राजनीतिक पहुंच अथवा किसी दलाल की भूमिका से प्रभावित नहीं होगा। इसलिए छात्रों के सवालों को न तो उपहास में उड़ाया जा सकता है और न ही उन्हें केवल “जेन-जी की उतावली” कहकर खारिज किया जा सकता है। लेकिन उसी गंभीरता से यह सवाल छात्रों से भी पूछना होगा कि क्या किसी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठने का एकमात्र समाधान पूरी भर्ती को रद्द कर देना है? क्या हर चयनित अभ्यर्थी दोषी है? क्या उस युवक की नौकरी भी चली जानी चाहिए जिसने बिना किसी गलत रास्ते के केवल अपनी मेहनत और योग्यता के आधार पर सफलता हासिल की है? यही वह बिंदु है जहां भावनाओं से आगे बढ़कर विवेक और न्याय की आवश्यकता होती है।
यह समझना होगा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया में यदि गड़बड़ी, अनियमितता या भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं तो सबसे पहले निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप और अपराध में फर्क होता है और शिकायत तथा प्रमाण में भी अंतर होता है। आज सोशल मीडिया के दौर में किसी सूची, ऑडियो, वीडियो या दस्तावेज की तस्वीर कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है और देखते ही देखते वह सार्वजनिक धारणा में “सच” का रूप ले सकती है। लेकिन लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था वायरल सामग्री पर नहीं, बल्कि प्रमाण, जांच और कानूनी प्रक्रिया पर चलती है। इसलिए यदि किसी भर्ती में धांधली हुई है तो उसकी तह तक जाना जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी निर्दोष अभ्यर्थी को केवल इसलिए दोषी न मान लिया जाए क्योंकि उसी प्रक्रिया में कुछ लोगों पर आरोप लगे हैं। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि दोषी को दंड मिले और निर्दोष को संरक्षण मिले। पूरी व्यवस्था को एक झटके में खत्म कर देना आसान राजनीतिक नारा हो सकता है, लेकिन वह हमेशा न्यायपूर्ण समाधान हो, यह आवश्यक नहीं।
यहां सरकार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकार यदि यह कहती है कि पिछली नियुक्तियों को रद्द करने से हजारों परिवार प्रभावित होंगे, वर्षों से नौकरी कर रहे लोगों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा और प्रशासनिक व्यवस्था पर भारी असर पड़ेगा, तो इस चिंता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। किसी सरकारी नौकरी के पीछे केवल एक नियुक्ति पत्र नहीं होता। उसके पीछे किसी परिवार की वर्षों की उम्मीद होती है, माता-पिता की मेहनत होती है, किसी युवक की पढ़ाई होती है, किसी बहन की शादी का सपना होता है और कभी-कभी पूरा परिवार अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए उस नौकरी पर निर्भर होता है। लेकिन सरकार की यह मजबूरी भी भ्रष्टाचार के लिए ढाल नहीं बन सकती। यदि किसी नियुक्ति प्रक्रिया में वास्तव में गंभीर अनियमितता हुई है तो केवल इसलिए जांच नहीं रोकी जा सकती कि उससे जुड़े लोग अब नौकरी कर रहे हैं। सरकार को यह समझना होगा कि नियुक्त लोगों की संख्या भ्रष्टाचार की जांच से बचने का कारण नहीं हो सकती और छात्रों को भी यह समझना होगा कि किसी आरोप के आधार पर हजारों लोगों की नौकरी खत्म कर देना न्याय का सरल रास्ता नहीं है।
समस्या का सबसे गंभीर पक्ष उस मानसिकता में छिपा है जिसमें सरकारी नौकरी को केवल रोजगार नहीं, बल्कि “कमाई का साधन” मान लिया जाता है। यदि समाज में यह धारणा बनने लगे कि सरकारी नौकरी पाने के लिए पैसा खर्च करना पड़ेगा और बाद में नौकरी मिलने पर वही पैसा “ऊपरी आमदनी” से वापस निकाल लिया जाएगा, तो यह केवल भ्रष्ट कर्मचारी या अभ्यर्थी की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरी व्यवस्था की नैतिक विफलता बन जाती है। जिस दिन रिश्वत देना और लेना सामान्य व्यवहार माना जाने लगे, उस दिन ईमानदार व्यक्ति सबसे कमजोर हो जाता है। जिस युवक ने वर्षों पढ़ाई करके परीक्षा पास की, वह स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है और जिस व्यक्ति ने किसी गलत रास्ते का सहारा लेकर सफलता हासिल की, वह व्यवस्था की कमजोरी को अपनी सफलता समझने लगता है। ऐसी मानसिकता किसी भी राज्य और समाज के लिए बेहद खतरनाक है। सरकारी सेवा में वेतन वैध आय है, लेकिन रिश्वत को “ऊपरी आमदनी” कहकर सामान्य बना देना भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति देना है।
अगर वास्तव में किसी सरकारी भर्ती में पैसे के लेन-देन की बात सामने आती है तो जांच केवल अंतिम लाभार्थी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह पता लगाना होगा कि बिचौलिया कौन था, संपर्क किसके माध्यम से हुआ, रकम कहां गई, किसने किससे बात की, किस स्तर पर प्रक्रिया प्रभावित हुई और किसे वास्तविक लाभ मिला। लेकिन यहां भी सावधानी आवश्यक है। किसी डायरी में किसी व्यक्ति का नाम लिखा होना, किसी बातचीत में किसी अधिकारी या नेता का नाम लिया जाना अथवा कोई कथित ऑडियो सामने आ जाना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। उसकी सत्यता, संदर्भ और प्रमाणिकता की जांच आवश्यक है। यदि किसी के खिलाफ ठोस प्रमाण हैं तो जांच एजेंसी को कार्रवाई करनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया की अदालत में दोषी घोषित कर देना न्याय नहीं है।
आज की राजनीति का एक और कटु सच यह है कि युवाओं के किसी भी बड़े आंदोलन में राजनीतिक दल अपनी संभावनाएं तलाशने लगते हैं। सत्ता पक्ष आंदोलन को नियंत्रित करना चाहता है और विपक्ष उसे अपने राजनीतिक विस्तार का अवसर समझ सकता है। नेताओं का छात्रों के साथ खड़ा होना लोकतंत्र में गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब छात्रों का वास्तविक मुद्दा राजनीतिक दलों की रणनीति में पीछे छूट जाता है। युवा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। वे किसी पार्टी के मंच की भीड़ भरने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। उनका भविष्य किसी सत्ता समीकरण का मोहरा नहीं होना चाहिए। यदि कोई राजनीतिक नेता छात्रों से संवाद करता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन छात्रों को भी अपनी स्वतंत्रता और विवेक बनाए रखना होगा। उन्हें यह तय करना होगा कि वे किसी नेता के भाषण का हिस्सा बनना चाहते हैं या अपनी पीढ़ी के भविष्य के लिए एक स्वतंत्र और ठोस नीति की मांग करना चाहते हैं।
जेन-जी के सामने भी एक बड़ा प्रश्न है। आज जो छात्र सरकार से जवाब मांग रहा है, वही छात्र कल विधायक, मंत्री, अधिकारी, शिक्षक, पत्रकार, उद्योगपति या सामाजिक कार्यकर्ता बन सकता है। आज जो युवा व्यवस्था की आलोचना कर रहा है, कल उसे स्वयं किसी न किसी व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी मिल सकती है। इसलिए आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार को झुकाना नहीं होना चाहिए। आंदोलन का उद्देश्य ऐसा तंत्र बनाना होना चाहिए जिसमें आने वाली पीढ़ियों को वही समस्याएं दोबारा न झेलनी पड़ें। यदि छात्रों की मांग केवल यह है कि एक भर्ती रद्द हो जाए तो विवाद कुछ समय बाद फिर किसी दूसरी भर्ती में पैदा हो सकता है। लेकिन यदि मांग यह है कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो, प्रश्नपत्र की सुरक्षा मजबूत हो, परिणाम प्रक्रिया ऑडिट योग्य हो, शिकायतों के निपटारे के लिए स्वतंत्र तंत्र हो, परीक्षा केंद्रों की निगरानी आधुनिक तकनीक से हो और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई हो, तो यह आंदोलन वास्तव में व्यवस्था सुधार का आंदोलन बन सकता है।
सरकार को भी केवल आंदोलन शांत कराने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। कुछ मांगें मान लेना, एक समिति बना देना, कुछ नेताओं से बैठक कर लेना और फिर समय बीतने का इंतजार करना स्थायी समाधान नहीं है। आज का युवा सवाल पूछेगा कि समिति की रिपोर्ट कब आएगी, जांच कौन करेगा, जांच की समय सीमा क्या होगी, दोषी पाए जाने पर क्या कार्रवाई होगी और निर्दोष अभ्यर्थियों का भविष्य कैसे सुरक्षित किया जाएगा। सरकार को इन सवालों के स्पष्ट जवाब देने चाहिए। “जांच होगी” अब पर्याप्त उत्तर नहीं है। सरकार को समयबद्ध जांच का रोडमैप सामने रखना होगा। यदि सरकार को लगता है कि पूरी नियुक्ति रद्द करना उचित नहीं है तो उसे कारणों के साथ जनता के सामने आना चाहिए और यदि सरकार को लगता है कि किसी विशेष हिस्से में गड़बड़ी हुई है तो उस हिस्से की जांच और कार्रवाई का स्पष्ट खाका प्रस्तुत करना चाहिए।
दूसरी ओर छात्रों को भी आंदोलन की मर्यादा समझनी होगी। धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, संवाद और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, आम नागरिकों को परेशान करना अथवा प्रशासन के साथ अनावश्यक टकराव आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। जब आंदोलन शांतिपूर्ण रहता है तो सरकार के लिए उसे केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न बताकर खारिज करना मुश्किल होता है। लेकिन जैसे ही आंदोलन हिंसा की ओर जाता है, मूल मुद्दा पीछे चला जाता है और पूरी बहस कानून-व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। इसलिए छात्रों को अपनी सबसे बड़ी ताकत—अपनी नैतिक वैधता—को स्वयं कमजोर नहीं करना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि नौकरी की समस्या केवल सरकार की समस्या नहीं है। झारखंड जैसे राज्य में सरकारी नौकरी की चाह के पीछे निजी क्षेत्र में पर्याप्त अवसरों की कमी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी, औद्योगिक विकास की सीमाएं और परिवारों की सामाजिक-आर्थिक अपेक्षाएं भी जुड़ी हुई हैं। जब एक सरकारी पद के लिए हजारों युवा आवेदन करते हैं तो इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि युवा सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि उन्हें स्थिर और सम्मानजनक रोजगार के पर्याप्त विकल्प नहीं दिखाई दे रहे। इसलिए हर भर्ती परीक्षा को लेकर पैदा होने वाला विवाद व्यापक रोजगार संकट का संकेत भी है। सरकार को नियुक्तियों के साथ-साथ निजी निवेश, उद्योग, कौशल विकास, उद्यमिता और स्थानीय रोजगार के अवसरों पर भी ध्यान देना होगा।
युवाओं से यह कहना भी उचित नहीं होगा कि “तुम्हें नौकरी थोड़े मिल जाएगी, राजनीति में आ जाओ।” राजनीति निश्चित रूप से युवाओं के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है और देश को ईमानदार, शिक्षित और संवेदनशील युवाओं की राजनीति में आवश्यकता है। लेकिन हर बेरोजगार युवक को राजनीति में भेज देना रोजगार समस्या का समाधान नहीं है। युवा को नौकरी चाहिए तो उसे नौकरी मिलनी चाहिए, व्यवसाय करना है तो अवसर मिलना चाहिए, खेती करनी है तो बाजार और तकनीक मिलनी चाहिए और राजनीति में जाना है तो लोकतांत्रिक मंच मिलना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इसी में है कि नागरिक के पास अपने जीवन के लिए अनेक सम्मानजनक विकल्प हों।
इस पूरे विवाद में एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए—यदि किसी ने रिश्वत लेकर नौकरी दिलाई है तो वह किसी भी पद पर हो, किसी भी राजनीतिक पहचान से जुड़ा हो या कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी अभ्यर्थी ने पैसे देकर नौकरी हासिल की है और यह प्रमाणित होता है तो उसकी भूमिका भी कानून के अनुसार तय होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई अभ्यर्थी पूरी तरह निर्दोष है और केवल मेरिट के आधार पर चयनित हुआ है तो उसे सामूहिक संदेह का शिकार बनाना भी उतना ही अन्यायपूर्ण होगा। सरकार और छात्र आंदोलन दोनों को इसी संतुलन को स्वीकार करना होगा।
असल सवाल यह नहीं है कि सरकार झुकी या छात्र झुके। असली सवाल यह है कि व्यवस्था जीती या नहीं। यदि आंदोलन के बाद भी अगली भर्ती में वही समस्याएं दोहराई जाती हैं तो आज का संघर्ष अधूरा रह जाएगा। यदि सरकार कुछ समय के लिए आंदोलन शांत कर देती है लेकिन परीक्षा व्यवस्था में कोई मूलभूत सुधार नहीं करती तो वह भी सफल नहीं मानी जाएगी। और यदि छात्र किसी राजनीतिक दबाव में अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं तो उनकी लड़ाई भी कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए इस समय दोनों पक्षों को अपनी-अपनी सीमाओं से बाहर निकलना होगा।
रांची में उठ रही छात्र आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। सरकार को संवाद का दरवाजा खुला रखना चाहिए और छात्रों को भी संवाद की मेज पर तथ्य और समाधान लेकर बैठना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच हो, आरोपों की निष्पक्ष पुष्टि हो, दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो, निर्दोषों की नौकरी सुरक्षित रखी जाए और भविष्य की परीक्षाओं को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए—इससे बेहतर रास्ता शायद ही कोई हो।
जेन-जी को भी समझना होगा कि व्यवस्था बदलना केवल सरकार बदलना नहीं होता। चेहरे बदलने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होता। दल बदलने से परीक्षा प्रणाली पारदर्शी नहीं हो जाती। मुख्यमंत्री बदलने से प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं हो जाता। असली बदलाव तब होगा जब संस्थाएं मजबूत होंगी, प्रक्रियाएं पारदर्शी होंगी और कानून सबके लिए समान होगा। आज सड़क पर खड़ा युवा कल सत्ता में बैठेगा तो उससे भी यही उम्मीद होगी कि वह उन आदर्शों को न भूले जिनके लिए उसने आज आवाज उठाई है।
और सरकार को भी यह समझना होगा कि युवा अब केवल आश्वासन से संतुष्ट होने वाली पीढ़ी नहीं है। यह पीढ़ी सवाल पूछती है, दस्तावेज मांगती है, रिकॉर्ड देखती है और अपने अधिकारों को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। इसलिए युवाओं को “नासमझ” समझकर टालना सरकार की भूल होगी। लेकिन युवाओं को भी यह समझना होगा कि हर वायरल दावा सत्य नहीं होता और हर कठोर मांग न्यायपूर्ण नहीं होती। लोकतंत्र में सबसे कठिन काम विरोध करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष रहना है।
इसलिए आज रांची की सड़कों पर खड़े युवाओं से मेरा सीधा सवाल है—क्या तुम केवल पिछली भर्ती रद्द करवाना चाहते हो, या ऐसी व्यवस्था बनाना चाहते हो जिसमें अगली पीढ़ी को कभी भर्ती रद्द कराने के लिए सड़क पर न उतरना पड़े? यदि तुम्हारा जवाब दूसरा है तो अपनी मांग को और मजबूत करो। केवल “रद्द करो” मत कहो, बल्कि बताओ कि “कैसे सुधारो”। केवल दोषी खोजने की मांग मत करो, बल्कि निर्दोषों की सुरक्षा का रास्ता भी बताओ। केवल सरकार को कटघरे में खड़ा मत करो, बल्कि ऐसी व्यवस्था की मांग करो जिसमें सत्ता में बैठने वाला कोई भी व्यक्ति भविष्य में तुम्हारे अधिकारों के साथ खिलवाड़ न कर सके।
यही आंदोलन की परिपक्वता होगी और यही जेन-जी की असली ताकत भी।
अंततः यह बात सरकार और छात्रों दोनों को याद रखनी होगी कि लोकतंत्र में कोई भी पक्ष स्थायी विजेता नहीं होता। सरकारें आती-जाती हैं, आंदोलन उठते और शांत होते हैं, लेकिन संस्थाएं और व्यवस्थाएं लंबे समय तक रहती हैं। आज अगर गलत नियुक्ति बचाई गई तो कल उसका खामियाजा पूरा राज्य भुगतेगा। और अगर बिना जांच के निर्दोषों की नौकरी छीन ली गई तो उसका दर्द भी वर्षों तक रहेगा। इसलिए फैसला जल्दबाजी में नहीं, न्याय के आधार पर होना चाहिए।
न नौकरी बिकनी चाहिए, न मेहनत हारनी चाहिए। न भ्रष्टाचार बचना चाहिए, न निर्दोष की नौकरी जानी चाहिए।
यही वह संतुलित रास्ता है जो सरकार और छात्रों के बीच इस टकराव को समाधान में बदल सकता है। जेन-जी को अपनी आवाज बुलंद रखनी चाहिए, लेकिन अपनी समझ उससे भी बुलंद रखनी चाहिए। सरकार को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय अपनी संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। और राजनीतिक दलों को युवाओं के भविष्य को अपनी सत्ता की राजनीति का ईंधन बनाने से बचना चाहिए।
क्योंकि आखिरकार सवाल किसी एक सरकार का नहीं है। सवाल यह है कि क्या झारखंड का एक गरीब, मेहनती और साधारण छात्र भी बिना पैसे और बिना पहुंच के अपने दम पर नौकरी हासिल कर सकेगा?
अगर इसका जवाब “हां” सुनिश्चित करना है, तो आज की लड़ाई किसी परीक्षा को रद्द कराने से बहुत बड़ी होनी चाहिए।
यह लड़ाई ऐसी व्यवस्था बनाने की होनी चाहिए जिसमें नौकरी पाने के लिए किसी दलाल की जरूरत न पड़े, किसी नेता की सिफारिश न चाहिए और किसी परिवार को अपनी जमीन बेचने की नौबत न आए।
और अगर हम ऐसा कर पाए, तभी कहा जाएगा कि रांची की सड़कों पर उठी जेन-जी की आवाज ने सचमुच इतिहास बनाया।

अशोक कुमार झा