प्रभुनाथ शुक्ल
पत्रकारिता और बदलते दौर का सच एक आम विमर्श का मुद्दा बन गया है। अमूमन यह देखा जा रहा है कि आमतौर पर देश के ज्वलंत मुद्दों पर सत्ता और संस्थाओं पर सवाल उठाने के बजाय सबसे पहले मीडिया को घेरे में लिया जाता है और उसकी विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो जाता है और उसे कठघरे में खड़ा किया जाता है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता, उसके दायित्व और लोकतंत्र में उसकी भूमिका पर गंभीर विमर्श करना आवश्यक है।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, पत्रकारिता का मूल दायित्व सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि जनता के सवालों को सामने लाना और शासन-प्रशासन से जवाब मांगना है। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार अगर अच्छा काम कर रही है तो हमारा दायित्व बनता है कि हम उन कार्यों को भी समाज के सामने रखें सिर्फ नैरेटिव के तहत सरकारों को बदनाम करना यह पत्रकारिता नहीं है। हां लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार लोकहित संरक्षण के लिए सबसे पहले जवाब दे है।
लेकिन बदलते दौर में पत्रकारिता और सत्ता के बीच संबंधों को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह चिंता लगातार सामने आ रही है कि पत्रकारों और पत्रकारिता के खिलाफ एक नकारात्मक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। सत्ता के पक्ष में लिखने-बोलने वाले पत्रकारों को सम्मान और मंच मिलना तथा जमीनी मुद्दों और सरकार से असहज सवाल पूछने वाले पत्रकारों को कानूनी कार्रवाई, दबाव या विवादों का सामना करना। लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं कहा जा सकता।
हाल में झारखंड में पत्रकार अमन चोपड़ा के खिलाफ दर्ज एफआईआर का मामला भी इसी बहस का हिस्सा बन गया है। मैं यह दावा नहीं कर रहा कि अमन चोपड़ा किस विचारधारा के समर्थक हैं या किस राजनीतिक विचार के पक्षधर हैं। मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि वे एक पत्रकार हैं और यदि उन्होंने झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन की कवरेज की है, तो सवाल यह भी उठता है कि उनके खिलाफ ही एफआईआर क्यों दर्ज की गई? क्या उसी आंदोलन की कवरेज करने वाले अन्य पत्रकारों के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई हुई? यदि नहीं हुई तो ऐसा अंतर क्यों? यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन का नहीं, बल्कि पत्रकारिता के अधिकार और समान मानदंड का है।
मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं किसी सरकार का न तो समर्थक हूं और न विरोधी। मेरा मानना है कि पत्रकारिता का काम सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि तथ्यों के पक्ष में खड़ा होना है। जो खबर है, वह खबर के रूप में सामने आनी चाहिए। पत्रकार को भी किसी राजनीतिक या वैचारिक पूर्वाग्रह से मुक्त होकर घटनाओं की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। लेकिन यदि कोई पत्रकार तथ्यात्मक और निष्पक्ष तरीके से किसी आंदोलन, प्रदर्शन या जनसमस्या को सामने रखता है, तो केवल उसकी रिपोर्टिंग के आधार पर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सवाल निश्चित रूप से विचारणीय है। हालांकि उसने कुछ निर्धारित नैरेटिव के तहत अगर रिपोर्टिंग की गई है यह गलत है हम इसका समर्थन नहीं करते हैं।
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून क्यों नहीं?
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में पत्रकारों की सुरक्षा तथा उनकी पेशेवर स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चर्चा हो। पत्रकारों को खबरों की रिपोर्टिंग करते समय भयमुक्त वातावरण मिले, यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
यदि किसी पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है, तो यह देखा जाना चाहिए कि मामला वास्तव में आपराधिक कृत्य का है या पत्रकार द्वारा की गई रिपोर्टिंग और अभिव्यक्ति से जुड़ा है। पत्रकार गलत हो तो कानून अपना काम करे, लेकिन केवल असहमति, आलोचना या रिपोर्टिंग के कारण पत्रकार को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़े, तो यह चिंता का विषय है।
मेरी राय में देश में ऐसा स्पष्ट कानूनी ढांचा होना चाहिए जिसमें पत्रकारों की पेशेवर स्वतंत्रता की रक्षा हो और साथ ही पत्रकारिता की आड़ में कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भी निष्पक्ष कार्रवाई का रास्ता खुला रहे। यानी स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही और अधिकार के साथ जिम्मेदारी, दोनों का संतुलन जरूरी है।
वैश्विक रैंकिंग से आगे भी बड़ा सवाल
भारत में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर वैश्विक स्तर पर जारी होने वाली विभिन्न रैंकिंग और रिपोर्टों पर बहस होती रही है। इन रैंकिंग के आकलन और मानकों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे उस मूल सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि क्या देश में पत्रकार अपने सवाल पूछने और जमीनी हकीकत दिखाने के लिए पर्याप्त रूप से स्वतंत्र महसूस करते हैं?
पत्रकारों के साथ मारपीट, धमकी, दबाव या कानूनी विवादों की घटनाएं जब सामने आती हैं तो स्वाभाविक रूप से मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं। सत्ता चाहे केंद्र में हो या राज्य में, उसे ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील और पारदर्शी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
सत्ता बदले तो नजरिया भी बदलना चाहिए
सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि आज की सत्ता कल विपक्ष में हो सकती है और आज विपक्ष में बैठा व्यक्ति कल सत्ता में आ सकता है। इसलिए मीडिया की स्वतंत्रता का सवाल किसी एक दल या सरकार का सवाल नहीं है। यह व्यवस्था और लोकतंत्र का सवाल है। आपने कई मुद्दे ऐसे देखे होंगे जब पत्रकार किसी नेता से सवाल पूछता है तो कुछ नेता ऐसे हैं जो उल्टा उससे ही सवाल करने लगते हैं। उसकी पत्रकारिता के सवाल पर उसकी जाति और धर्म तक उतर आते हैं।
यदि आज किसी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई को इसलिए उचित ठहराया जाता है क्योंकि वह सरकार के पक्ष में नहीं लिख रहा, तो कल वही तर्क किसी दूसरी सरकार के समय किसी दूसरे पत्रकार के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए लोकतंत्र के हित में जरूरी है कि पत्रकारिता के लिए समान और निष्पक्ष मानदंड तय हों।
दिल्ली में विभिन्न आंदोलनों और प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों के खिलाफ कितने मामले दर्ज हुए, इसका आंकड़ा मेरे पास नहीं है। यह भी मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि ऐसे मामले हुए या नहीं हुए। लेकिन यदि किसी पत्रकार के खिलाफ केवल उसकी पत्रकारिता के कारण एफआईआर दर्ज की गई है, तो मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसी कार्रवाई का समर्थन नहीं करता।
सोशलमीडिया ने मुख्यधारा की पत्रकारिता को दी चुनौती। मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझना जरूरी है। मुख्यधारा की मीडिया अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन सोशलमीडिया ने समाचारों के प्रसार और उपभोग का पूरा ढांचा बदल दिया है।
दिल्ली, झारखंड के छात्र आंदोलन से लेकर देश के विभिन्न आंदोलनों और जनमुद्दों तक, सोशलमीडिया ने कई बार ऐसे विषयों को व्यापक मंच दिया जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया में अपेक्षित जगह नहीं मिल सकी। इसका परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में लोग अब सोशलमीडिया के माध्यम से खबरें देख और समझ रहे हैं।
यह मुख्यधारा की पत्रकारिता के लिए एक चुनौती भी है और आत्ममंथन का अवसर भी।
लोगों का भरोसा किसी एक माध्यम से नहीं, बल्कि सच्ची, तथ्यपूर्ण और निष्पक्ष पत्रकारिता से बनता है। यदि किसी मीडिया संस्था को लगता है कि उसकी खबरों पर जनता का भरोसा कम हो रहा है, तो उसे यह विचार करना होगा कि कहीं वह सत्ता, बाजार, विचारधारा या संस्थागत दबाव के बीच अपनी मूल पत्रकारिता से तो दूर नहीं हो रही।
पत्रकारिता का भविष्य किसके साथ है?
पत्रकारिता किसी सत्ता, दल या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है। पत्रकारिता जनता की आवाज है। सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का अपराध नहीं, बल्कि उसका लोकतांत्रिक दायित्व है। उसी तरह पत्रकार का भी दायित्व है कि वह खबर को तथ्य, प्रमाण और निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करे।
हमें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो न सत्ता की आंखों पर पट्टी बांधे और न विपक्ष के प्रति आंखें बंद करे। जो सरकार अच्छा काम करे, उसकी प्रशंसा होनी चाहिए और जहां सवाल हों, वहां सवाल भी उठने चाहिए।पत्रकारिता का असली पक्ष सत्ता या विपक्ष नहीं, बल्कि सत्य होना चाहिए।
यदि किसी पत्रकार ने कानून का उल्लंघन किया है तो जांच और कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए। लेकिन यदि केवल उसकी पत्रकारिता, रिपोर्टिंग या असहमति के कारण उसके खिलाफ कार्रवाई होती है, तो उस पर सवाल उठना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।
सत्ता को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है और पत्रकारिता को भी आत्ममंथन की। दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर न हो। क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ियों के पत्रकार बिना भय के सवाल पूछ पाएंगे? और यदि पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगे, तो फिर लोकतंत्र में जनता के सवाल कौन पूछेगा?