लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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momकर्म और जीवन के आनंद के बीच गहरा रिश्ता है। आनंद ही अपना चरम लक्ष्य हो और कर्त्तव्य कर्म गौण या उपेक्षित हो तो वह आनंद मात्रा आभासी एवं क्षणिक ही होता है जबकि कर्त्तव्य कर्म का निर्वाह हमारी प्राथमिकता में हो तब इसके बाद जिस आनंद की प्राप्ति होती है वह चिरस्थायी, शाश्वत और बार-बार याद आते हुए प्रेरणा जगाने वाला हो उठता है।

हमारे सामने दो प्रकार के लोग होते हैं। एक वे हैं जो जीवन में आनंद ही आनंद पाना चाहते हैं और इसके लिए वे न धैर्य रख सकते हैं, न ही प्रतीक्षा कर सकने की स्थिति में होते हैं। ऐसे लोग अपनी मौज-मस्ती और आनंद पाने की अभिलाशा में ही जीवन भर लगे रहते हैं तथा इनके लिए किसी भी कर्म को करने से पहले आनंद ही आनंद और सुख पाने की तमन्ना रखा करते हैं और ऐसे में वे अपनी ड्यूटी अर्थात कत्र्तव्य कर्म या निर्धारित दायित्वों की पूर्ति के प्रति बेपरवाह होते हैं तथा इन्हें अंतिम प्राथमिकता पर रखते हैं या गौण मानकर उपेक्षा का भाव अपनाते रहते हैं।

ये लोग अपनी ड्यूटी की बजाय घरेलू या दूसरे लाभ दिलाने वाले काम-काज, व्यक्तिगत आनंद के कर्म और उन सभी कामों में ज्यादा आनंद लेते हैं जिनमें कुछ न कुछ प्राप्ति होती रहती है।

लम्बे समय तक एक ही प्रकार के बाड़ों में जमा लोगों में से कई सारे ऐसे होते हैं जो अपनी बंधी-बंधायी कमायी से नाखुश तथा असंतुष्ट रहते हैं और एक्स्ट्रा पाने की चाहत में अपने निर्धारित दायित्वों से मुँह मोड़कर तथा रोजमर्रा के कर्त्तव्य कर्म से जी चुराते हुए उन्हीं कामों में लगे रहते हैं जिनसे इन्हें आनंद आता है।

ऐसे लोगों को कोई सा काम सौंपा जाए अथवा निर्धारित दायित्व हो, वे लोग पहले अपने उन कामों में रमने लग जाते हैं जिनमें उन्हें आनंद आता है। यह आनंद पाने का तरीका भोग-विलास, मुद्रार्चन, गोतावकाश से लेकर वे तमाम रास्ते हो सकते हैं जिन पर चलते हुए दैहिक सुख और मानसिक सुकून की प्राप्ति हो सकती है।

जो लोग अपने जिम्मे के कामों के लंबित पड़े होने के बावजूद आनंद की तलाश में भटकने लगते हैं वे चाहे किसी भी प्रकार का सुख प्राप्त कर लें और अपने कर्त्तव्य कर्म को प्राथमिकता में नंबर दो पर रखें, उन्हें जो आनंद प्राप्त होता है वह क्षणिक होता है तथा इस आनंद के साथ काम-काज के बोझ का तनाव हमेशा मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ होता है और ऐसे में इस किस्म के लोग चाहे कितना ही बड़ा और दीर्घकालीन सुख प्राप्त क्यों न कर लें, इन लोगों को आनंद की प्राप्ति ताजिन्दगी नहीं हो पाती है।

इन लोगों के साथ दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह भी होती है कि आनंद प्राप्ति में अतृप्त रहने के कारण इन लोगों का जी अपनी ड्यूटी या निर्धारित काम-काज में भी नहीं लगता। इस स्थिति में इन्हें अतृप्ति और कामों के बोझ का दोहरा तनाव भुगतना पड़ता है और ऐसे में ये लोग मन-मस्तिष्क और शरीर से भी कमजोर हो जाते हैं तथा असमय ही बूढ़े दिखने लगते हैं।

अपने आस-पास ऐसे लोगों की खूब भरमार है जो अपने निर्धारित दायित्वों से पहले यहां-वहां आनंद की तलाश में भटकने के आदी हो गए हैं तथा उनकी स्थिति ‘माया मिली न राम’ जैसी होती है।

ये लोग न शारीरिक आनंद और भोग-विलास से तृप्त हो पाते हैं और न ही अपने कामों या कर्मस्थलों से। दूसरी किस्म उन लोगों की है जो अपने कत्र्तव्य कर्म और रोजमर्रा के निर्धारित दायित्वों को प्राथमिकता पर रखते हैं और इन लोगों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक कि कोई काम इनके पास पड़ा हुआ हो या लंबित रह जाए।

ये लोग जितना जल्द हो सके अपने पास के कामों को पूर्णता देने के बाद ही आनंद के मार्गो की ओर झाँकते हैं। या यों कहें कि इन लोगों को अपने कर्म की पूर्णता और लक्ष्य समूह की कार्यपूर्णता से ही आनंद की प्राप्ति हो पाती है।

ये लोग पहले अपने काम पूरे करते हैं और उसके बाद दूसरे किन्हीं कामों की ओर रुख करते हैं। ऐसे लोगों को प्राप्त होने वाला आनंद बहुगुणित होता है। एक तो कार्यपूर्णता का आनंद, दूसरा कामों का बोझ होने के तनाव से मुक्ति का आनंद।

वास्तव में देखा जाए तो ये लोग काम-काज के बोझ और दूसरे तनावों से मुक्त रहकर जो आनंद पाते हैं वही शाश्वत और दीर्घकालीन अनुभवों की प्राप्ति कराने वाला होता है। इसलिए जीवन में पहले अपने निर्धारित दायित्वों को पूरा करें और उसके बाद दूसरे कामों में हाथ डालें, तभी जीवन के असली आनंद की प्राप्ति हो सकती है।

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