दास्ताने – दर्द हम किसको सुनाते

दास्ताने – दर्द हम किसको सुनाते

पत्थरों के शहर में किसको बसाते !

 

आबे – हयात नहीं है पास में मेरे

दो घूँट पानी की किसको पिलाते !

 

शहर चले गये थे कमाने के वास्ते

लौट आये, शक्ल किसको दिखाते !

 

हवा बेवफ़ाई की ही बह रही थी

क़सम वफ़ा की किसको दिलाते !

 

अपने ख़त में तुमने लिखा था मुझे

महावर रचे पावों को चूम तो जाते !

 

क्या करें ख़ुद से ही परेशान थे हम

अपनी बेबसी क्या तुमको बताते !

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