‘ईश्वर के सच्चे पुत्र व सन्देशवाहक वेदज्ञ महर्षि दयानन्द’

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-मनमोहन कुमार आर्य-  dayanand-saraswati

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन में जो कार्य किया, उससे वह ईश्वर के सच्चे पुत्र व ईश्वर के सन्देशवाहक कहे जा सकते हैं। स्वयं महर्षि दयानन्द की विचारधारा के अनुसार संसार में जन्म लेने वाला हर प्राणी व इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी जीवात्मायें हैं, वह सब ईश्वर की पुत्र व पुत्रियों के समान हैं। स्वामी दयानन्द के अनुसार यह सब ईश्वर के पुत्र व पुत्रियां अपने ज्ञान, कर्म व स्वभाव की योग्यताओं के अनुसार कोई ईश्वर के कुछ निकटतम है, कुछ निकट व अधिकांश दूर या बहुत दूर हैं। ईश्वर से निकटता व दूरी का कारण जीवों के अपने जन्म-जन्मान्तरों व वर्तमान जन्म के कर्म हुआ करते हैं। जो जीवात्मा अपने मनुष्य जीवन में अच्छे कर्म करता है, वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता है और वेदानुसार जीवन व्यतीत करता है वह ईश्वर के सबसे निकटतम पहुंच जाता है और इसके विपरीत आचरण करने वाले मनुष्यों व पशु आदि योनियों की ईश्वर से दूरी बनी रहती है। इसी प्रकार जो मनुष्य वेद ज्ञान की प्राप्ति में श्रम व पुरूषार्थ करता है और अर्जित ज्ञान का अन्य मनुष्यों में, मत-मतान्तर के आग्रह से रहित होकर उनके उपकार व भलाई के लिए, प्रचार-प्रसार करता है, वह ईश्वर का सन्देशवाहक होता है। अन्य व्यक्ति कहने को कुछ भी कहें परन्तु वास्तविकता यही है कि जो पूर्व पंक्ति में बताई गई है। जन्म-मरणधर्मा जीवात्माओं के अतिरिक्त ईश्वर का न तो कोई पृथक से पुत्र ही है और न अन्य प्रकार का कोई सन्देशवाहक या ईश्वर व जीव के बीच में किसी प्रकार से मध्यस्थ। आईये, ईश्वर के पुत्र व सन्देशवाहक के विषय में और विचार करते हैं।

ईश्वर के पुत्र की चर्चा करने से पहले ईश्वर के स्वरूप को जान लेते हैं। ईश्वर कैसा है? यह वेद और आर्य समाज के विद्वानों, स्वाध्यायशील, प्रवचन व उपदेश में रूचि रखने वाले सदस्यों को पता है परन्तु ईश्वर के स्वरूप से भारत से बाहर व भारत के भी ९० से ९५ प्रतिशत वा इससे भी अधिक लोग अनभिज्ञ हैं। ऐसा इसलिये है कि उन्हें सत्योपदेश देने वाला कोई नहीं है। आजकल हमारा देश गुरूडम व धर्म-गुरूओं से भरा हुआ है। क्या इन धर्म गुरूओं से इनके अनुयायियों में सद्गुरू ईश्वर का सत्य स्वरूप पहुंचता है? हमारा विवेक इसका उत्तर ‘न’ में देता है। हमारा तो यह मानना है जिस गुरू के पास अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक सम्पत्ति है, वह सच्चा गुरू नहीं हो सकता। कहीं न कहीं धर्म की आड़ में व्यापार किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह गुरूजन ईश्वर के बारे में केवल असत्य कथन ही करते हैं। इनके कथनों का कुछ या बड़ा भाग सत्य होता है परन्तु उसमें असत्य के मिले हुए होने से वह विष सम्पृक्त अन्न के समान होता है। यह गुरू अच्छे कार्य भी करते हैं परन्तु इनके सारे कार्य अच्छे कार्यों की श्रेणी में ही आते हों, ऐसी बात नहीं है। यह जो धन अपने भक्तों व अन्य साधनों से प्राप्त करते हैं वह सारा व्यय कहां-कहां होता है, वह मुख्य बात है। यदि वह सारा धन केवल निर्धनों व देशवासियों के केवल व केवल कल्याण पर ही व्यय होता है तो उसकी आलोचना उचित नहीं है, परन्तु विवेक से ज्ञात होता है कि सारे धन का सदुपयोग न होकर व्यक्तिगत कार्यो के लिए भी होता है और एक-एक गुरू ने व्यक्तिगत रूप से इतने साधन व सुविधायें एकत्रित कर लिये हैं कि हमारे धनिक गृहस्थ भी उनसे सुख-सुविधाओं के मामले में पीछे हैं। आस्था का अर्थ यह नहीं होता कि चीनी में नमक व नमक में चीनी की आस्था कर ली जाये। स्कूल का विद्यार्थी अपनी आस्था के अनुसार अपने शिक्षक को शिक्षक न मानकर कुछ और मानता हो, ऐसी-ऐसी बातें सत्य आस्था नहीं होती। आस्था यदि सत्य नहीं है तो फिर वह आस्था न होकर अन्धविश्वास होता है। कुछ ऐसा ही तथाकथित धर्म, धार्मिक संस्थाओं व संगठनों में भी होता है। मत-मतान्तरों व भारतवर्षीय मतों के बारे में एक आपत्ति यह भी है कि यह गुरू अपने भक्तों को यह नहीं बताते कि “वेद” सर्वव्यापक, निराकार, सर्वशक्तिमान तथा सृष्टि को रचने व पालन करने वाले परमात्मा का सृष्टि के आरम्भ में दिया गया ज्ञान है। वेदानुकूल मान्यतायें ही धर्म है और वेदानुकूल जो मान्यता या सिद्धान्त नहीं है वह अकर्तव्य होने से धर्म न होकर अ-धर्म है। यह गुरूजन बतायें भी तो कैसे? पहली हानि तो ऐसा कहने से अपने भक्त व अनुयायी या तो बनेगें ही नहीं या फिर नाममात्र ही बनेंगे। दूसरा कारण यह बतायें तब जब यह जानें। इन्होंने तो वेदों का अध्ययन किया ही नहीं हैं। अत: अज्ञानता व स्वार्थ, यह दो बातें इनमें दृष्टिगोचर होती हैं। चिन्तन व अध्ययन से यह भी तथ्य सामने आता है कि गुरू का काम ईश्वर के बारे में ज्ञान देकर अपने भक्त व अनुयायी को ईश्वर उपासना की विधि सिखाए, आव’यकता पड़ने पर उनकी शकाओं का समाधान भी करता रहे। ऐसा करके गुरू का काम समाप्त। भक्त को सारे जीवन अपने विचारों से बांध कर रखना उचित नहीं है। यह एक प्रकार की जालससाजी है। हमने अनेक मत-मतान्तरों व गुरूओं के ६० से ८० वर्ष तक की आयु वाले चेलों को देखा है जो अध्यात्मिक ज्ञान से शून्य होते हैं। इनके भविष्य की चिन्ता गुरू महाराज को नहीं होती है। एक बात यह भी कहनी है कि अधिकांश गुरू पुराणों की बहुतायत में चर्चा करते हैं, यह सप्रमाण जनता को बतायें कि यह पुराण किसने बनायें, क्यों बनाये, कब बनायें, इनकी आव’यकता क्या थी? वेद और पुराणों में किसका महत्व अधिक है और क्यों है, आदि आदि।

ईश्वर का स्वरूप कैसा है? यह धर्म प्रेमियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका उत्तर महर्षि दयानन्द ने चारों वेदों का अध्ययन, मनन, योगाभ्यास, ईश्वर का साक्षात्कार, वेदों का आलोडन व नाना प्रकार से परीक्षा करके दिया है। उनके अनुसार ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। इन गुणों विशेषणों से युक्त ईश्वर ही सारी मनुष्य जाती के लिए उपासनीय है। ईश्वर में असंख्य गुण व कर्म हैं, अत: उसके नाम भी एक नहीं अपितु उसके गुणों की संख्या के बराबर व समान हैं। अजन्मा होने के कारण ईश्वर का कभी जन्म नहीं होता न हुआ है। जिनका जन्म हुआ है वह ईश्वर नहीं थे। भगवान राम व भगवान कृष्ण महान आत्मायें, महापुरूष व युगपुरूष थे। उनके जीवन में अनेक दैवीय गुण थे जिन्हें हमें अपने जीवन में अपनाना है। दिव्यगुणों को धारण करने वाले हमारे महापुरूष व प्रेरणापुरूष तो हो सकते हैं, परन्तु ईश्वर नहीं। कई बार कुछ असाधारण कार्य करने के लिए इन्हें ईश्वर माना जाता है परन्तु जो कार्य इन्होनें किए वह तो ईश्वर बिना अवतार लिए ही आसानी से कर सकता है। जब वह बिना अवतार लिये प्रकृति के परमाणुओं को इकट्ठा कर उनसे आवश्यकता के अनुरूप नये परमाणु बनाकर सृष्टि अर्थात् सूर्य, पृथिवी, चन्द्र एवं अन्य गृह व उपग्रह, जिनकी संख्या असंख्य है तथा परस्पर की दूरी भी इतनी है कि उसे नापा नहीं जा सकता, बना सकता है तो वह अवतारों द्वारा कहे जाने वाले सभी कार्यो को भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त इन सूर्य, पृथिवी आदि पिण्डों का परिमाण इतना है कि जिसका अनुमान लगाना भी कठिन वा असम्भव है। फिर सभी प्राणियों को जन्म देना, समय आने पर उनकी मृत्यु का होना, उन्हें कर्म फल देना आदि कार्य ईश्वर कर सकता है तो फिर वह ईश्वर रावण, कंस व हिरण्यक’यप आदि को बिना अवतार लिए, यदि मारना आव’यक है तो, मार भी सकता है।

ईश्वर हमारा माता व पिता दोनों है। इसका प्रमाण यह है कि उसने हमें जन्म दिया है। महर्षि दयानन्द को भी जन्म देने से ईश्वर उनका माता व पिता दोनों है। इस जन्म के माता-पिता तो सन्तान को जन्म देने के लिए ईश्वर के साधन हैं। यदि ईश्वर माता के गर्भ में सन्तान का निर्माण न करें तो माता-पिता चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। हम जो भी अन्न-फल-दूध-जल-वायु आदि का सेवन करते हैं वह भी ईश्वर ने बनाये हैं। हमारा पोषण करने के कारण भी ईश्वर ही हमारा माता-पिता सिद्ध होता है। वृद्ध, रोगी व अयोग्य हो चुके शरीरों से जीवात्माओं को निकालना और उन सभी जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार नया जन्म देने से भी ईश्वर हमारा माता-पिता दोनों ठहरता है। हमारे भौतिक माता-पिता हमें ज्ञान देते हैं अथवा हमें ज्ञान प्राप्ति का साधन व कारण बनते हैं। ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में आदि मनुष्यों व भावी सन्ततियो को “वेद” ज्ञान दिया, हममें जो स्वाभाविक ज्ञान है, वह भी उसी का दिया हुआ होने से वह हमारा माता व पिता दोनों है। ईश्वर से हमारा सम्बन्ध गुरू व शिष्य तथा स्वामी व सेवक आदि का भी सिद्ध होता है। माता-पिता सन्तान को आश्रय हेतु घर बना कर देते हैं, परमात्मा ने हमारे व सभी जीवात्माओं के लिए इस सृष्टि व इसके सभी पदार्थों को बनाया है। यह सृष्टि और शरीर ही हमारा मुख्य आश्रय है जो ईश्वर की कृपा व उसकी हमें बहुमुल्य देन है। स्वामी दयानन्द सदाचारी, सच्चे ज्ञानी, सच्चे ईश्वर भक्त, प्राणी मात्र के हितैषी, सच्चे देश भक्त, सच्चे आचार्य व गुरू थे, अत: वह ईश्वर के सच्चे व योग्यतम पुत्र थे।

अब महर्षि दयानन्द सरस्वती के सच्चे सन्देशवाहक होने पर भी विचार कर लेते हैं। स्वामी दयानन्द ने वेदाध्ययन व योगाभ्यास कर ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के स्वरूप, कर्तव्य-अकर्तव्य, धर्म-अधर्म, बन्धन-मुक्ति, जीवन-मृत्यु, धर्म व मत-मतान्तरों के यथार्थ स्वरूप व उनमें अन्तर व भेद, स्वदेशीय राज व विदेशी राज में भेद, सच्ची ईश्वरोपासना, मूर्तिपूजा-अवतारवार-मृतक श्राद्ध व फलित ज्योतिषद का मिथ्यात्व, गुण-कर्म-स्वभावानुसार वर्ण व्यवस्था, जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था का मिथ्यात्व, विवाह का पूर्ण युवावस्था में गुण-कर्म-स्वभावानुसार होना वेद सम्मत अन्यथा वेदविरूद्ध आदि जीवनोपयोगी आचरणों को यथार्थ रूप में जानकर संसार के उपकार की भावना से उनका प्रचार किया जिससे वह सच्चे ईश्वर के सन्देश वाहक सिद्ध होते हैं। ईश्वर के पैगाम को संसार में फैलाने व मनवाने के कारण लोगों ने उनके प्राण ले लिये और उन्होंने उफ तक भी न की। उनके समान अन्य कोई सन्देशवाहक इतिहास में उपलब्ध नहीं होता। यदि हुए हैं तो उनका कार्य सत्य व सर्वांगीण न होकर एकांगी व सत्यासत्य मिश्रित होने से वह ईश्वर का सीमित सन्देश दे सके और साथ में अहित की बातें भी उसमें सम्मिलित हैं। वेद ज्ञान से शून्य होने के कारण पूर्व के सभी सन्देश वाहक समाज पर ईश्वरेच्छा के अनुरूप प्रभाव नहीं डाल सके। इन सब से भिन्न महर्षि दयानन्द सरस्वती ईश्वर के एक ऐसे सन्देशवाहक हैं जिन्होंने समाज, देश व वि’व को जो दिव्य आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति का सन्देश दिया जो उनसे पूर्व अन्यों द्वारा नहीं दिया गया, इस कारण उनका स्थान सर्वोपरि है। हमारा यह मूल्यांकन निष्पक्ष है। इस विषय में हम प्रमाण व तर्कपूर्ण आलोचनाओं का स्वागत करेगें।

हम समझते हैं कि हमने लेख के विषय के अनुरूप अपने विचार प्रस्तुत कर दिये हैं। सत्य का ग्रहण व असत्य के त्याग की भावना से ही हम लेख लिखते हैं। मनुष्य जीवन का उद्दे’य सत्यासत्य का निर्णय कर सत्य को स्वीकार करने के लिए है, वितण्डा या असत्य विचारों पर स्थिर व्यक्तिया व्यक्तिसमूह अपनी व अपने समूह की हानि करते हैं। ऐसा करना मनुष्यपन से बहि: है। इसी भावना से युक्त यह लेख है। ईश्वर करे कि सत्य मान्यतायें संसार के सभी लोगों के हृदय में स्थान पायें।

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