राजनीति

भाजपा का अगला अध्याय: क्या उत्तराधिकार की आहट सुनाई दे रही है?

कुमार कृष्णन

भारतीय राजनीति में सबसे कठिन लड़ाई विपक्ष से नहीं, उत्तराधिकार से होती है। चुनावी जीत, संगठन का विस्तार और सत्ता का स्थायित्व किसी भी दल को मजबूत बना सकते हैं लेकिन नेतृत्व परिवर्तन का दौर अक्सर उसकी सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है। कांग्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण रही है। क्षेत्रीय दल भी इस चुनौती से जूझते रहे हैं। अब प्रश्न उठने लगा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी भी उसी मोड़ की ओर बढ़ रही है, जहाँ भविष्य के नेतृत्व को लेकर भीतर ही भीतर नई रेखाएँ खिंच रही हैं?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा में खुला शक्ति-संघर्ष शुरू हो चुका है। इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है लेकिन राजनीति केवल घटनाओं से नहीं, संकेतों से भी पढ़ी जाती है। पिछले कुछ समय में पार्टी और सरकार से जुड़ी जिन घटनाओं ने राजनीतिक हलकों में चर्चा पैदा की है, उन्होंने इस सवाल को अवश्य जन्म दिया है कि क्या भाजपा अपने अगले नेतृत्व की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में प्रवेश कर चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता, चुनाव जिताने की क्षमता और संगठन पर उनकी पकड़ निर्विवाद है। इसलिए जब तक वे सक्रिय हैं, किसी वैकल्पिक नेतृत्व की औपचारिक चर्चा की संभावना कम दिखाई देती है लेकिन बड़े राजनीतिक दल केवल वर्तमान के भरोसे नहीं चलते; वे भविष्य की तैयारी भी साथ-साथ करते हैं। यही कारण है कि भाजपा के भीतर संभावित उत्तराधिकार को लेकर समय-समय पर राजनीतिक अटकलें सामने आती रहती हैं।

इन अटकलों के केंद्र में प्रायः दो चेहरे दिखाई देते हैं—अमित शाह और योगी आदित्यनाथ। दोनों की राजनीतिक ताकत अलग-अलग है और यही उन्हें चर्चा का विषय बनाती है।

अमित शाह संगठन के रणनीतिकार हैं। पिछले एक दशक में भाजपा के चुनावी विस्तार, बूथ प्रबंधन और राजनीतिक अभियानों की सफलता में उनकी भूमिका व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है। वे सत्ता और संगठन के बीच तालमेल बैठाने वाले ऐसे नेता माने जाते हैं जिनकी राजनीतिक शैली अत्यंत व्यवस्थित और परिणामोन्मुख है।

इसके विपरीत योगी आदित्यनाथ की पहचान जननेता की है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में उनकी राजनीतिक पकड़, प्रशासनिक सख्ती की छवि और वैचारिक स्पष्टता ने उन्हें भाजपा के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में स्थापित किया है। पार्टी का एक बड़ा समर्थक वर्ग उन्हें भविष्य के राष्ट्रीय नेतृत्व की संभावनाओं के साथ भी जोड़कर देखता है।

यहीं से विश्लेषण शुरू होता है। क्या संगठन की शक्ति और जनाधार की शक्ति भविष्य में समान दिशा में रहेंगी, या कभी उनके बीच प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनेगी? इसका उत्तर आज किसी के पास नहीं है लेकिन राजनीति में संभावनाएँ ही आगे चलकर वास्तविकता का आधार बनती हैं।

हाल के दिनों में शिक्षा, संगठन, राज्यों के नेतृत्व, केंद्रीय मंत्रियों के बयानों और कुछ राजनीतिक विवादों को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश की गई है। यह जरूरी नहीं कि हर घटना का संबंध उत्तराधिकार की राजनीति से हो। प्रशासनिक मतभेद और राजनीतिक विवाद किसी भी सरकार का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन जब अनेक घटनाएँ एक साथ घटती हैं, तो राजनीतिक विश्लेषक उनके बीच संबंध तलाशने लगते हैं। यही लोकतांत्रिक राजनीति का स्वभाव भी है।

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत अब तक उसका अनुशासन रहा है। पार्टी ने सार्वजनिक रूप से नेतृत्व विवादों को कभी खुलकर सामने नहीं आने दिया। यही कारण है कि अन्य दलों की तुलना में भाजपा का संगठन अधिक नियंत्रित और केंद्रीकृत दिखाई देता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जितना बड़ा संगठन होता है, उसके भीतर नेतृत्व की आकांक्षाएँ भी उतनी ही स्वाभाविक होती हैं। उन्हें हमेशा टकराव नहीं कहा जा सकता।

अगले वर्ष होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं होगा। उसके परिणाम राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित करेंगे। यदि भाजपा शानदार प्रदर्शन करती है तो योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद और बढ़ेगा। यदि अपेक्षित सफलता नहीं मिलती तो रणनीति और नेतृत्व दोनों पर सवाल उठेंगे। दूसरी ओर संगठनात्मक फैसलों और राष्ट्रीय राजनीति में अमित शाह की भूमिका भी लगातार निर्णायक बनी रहेगी। इसलिए आने वाले वर्षों में दोनों नेताओं की राजनीतिक सक्रियता पर स्वाभाविक रूप से अधिक नजर रहेगी।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनी बढ़ती हुई राजनीतिक सफलता का प्रबंधन भी है। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली हर पार्टी के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व की आकांक्षा जन्म लेती है। यदि उस आकांक्षा को संस्थागत ढंग से दिशा दी जाए तो वह संगठन की शक्ति बनती है; यदि उसे अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा में बदलने दिया जाए तो वही कमजोरी का कारण भी बन सकती है।

भारतीय राजनीति में महाभारत का रूपक अक्सर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन हर राजनीतिक मतभेद महाभारत नहीं होता परंतु यह भी सच है कि नेतृत्व परिवर्तन का दौर किसी भी दल के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है। भाजपा के सामने भी भविष्य में यही परीक्षा आएगी।

फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि भाजपा के भीतर उत्तराधिकार का प्रश्न अभी सार्वजनिक संघर्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक चर्चा और विश्लेषण का विषय है। आने वाले चुनाव, संगठनात्मक फैसले और राष्ट्रीय राजनीति की परिस्थितियाँ तय करेंगी कि यह चर्चा यहीं समाप्त होती है या भारतीय राजनीति के अगले बड़े अध्याय का आधार बनती है।

लोकतंत्र में किसी भी दल की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसका करिश्माई नेतृत्व नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन की उसकी संस्थागत क्षमता होती है। भाजपा जब भी उस मोड़ पर पहुँचेगी, उसकी वास्तविक परीक्षा वहीं से शुरू होगी।

कुमार कृष्णन