कृषि आधारित स्टार्ट-अप में अपार संभावनायें

दुलीचन्द रमन
हरित-क्रांति के प्रथम दौर का सबसे ज्यादा असर उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के क्षेत्रों में देखा गया। देश की खाद्यान्न आयात पर निर्भरता को दूर करने के लिए नये बीज, उर्वरक, मशीनरी, खरपतवार नाशक दवाईयों का थोक में इस्तेमाल किया गया। देश खाद्यान्न के मामले में तो आत्मनिर्भर हो गया लेकिन इस क्षेत्र में फसल निविधता विलुप्त सी हो गई। गेहूँ व धान ही मुख्य फसल बनकर रह गई। भूमिगत जल का संकट खड़ा हो गया। जमीन जहरीली हो गई तथा उसके कारण कैंसर जैसी बिमारियों में अचानक बढ़ोतरी इस क्षेत्र की सच्चाई बन चुकी है।
समय के साथ-साथ कृषि लागत मूल्य बढ़ता चला गया। मशीनों के उपयोग ने बैलों पर निर्भरता कम कर दी। बैलों की घटती मांग ने गाय का अप्रांसगिक बना दिया। अब ग्रामीण परिवेश में गाय गौशालाओं और शहर की सड़कों पर यहां-वहां घूमती दिखाई देती है। कृषि जोत घटने तथा लागत-मूल्य बढ़ने के कारण किसानों को कृषि घाटे का सौदा लगने लगा। जितनी भी सरकारें आई सबको सिर्फ किसानों को ऋण देने और ऋण माफी की राजनीति के सिवाय उनके मूल प्रश्नों का हल करने की कोशिश नही की गई। फलस्वरूप किसान ऋणग्रस्त होता चला गया तथा उनकी आत्महत्याओं की खबरें राष्ट्रीय मीडिया की डिबेट में जगह बनाने लगी।
अगर वर्तमान कृषि की समस्याओं से पार पाना है तो सबसे पहले गेहूँ व धान की फसलों पर निर्भरता कम करनी होगी। इससे भूमिगत जलस्तर को भी नियंत्रित किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ”पर ट्राॅप-मोर क्राॅप“ का नारा दिया है जो कृषि में पानी की बचत के महत्व को रेखांकित करता है। भूमिगत जल-प्रबंधन में स्टार्ट-अप की अपार संभावनायें है। इस मामले में हम अपने मित्र देश इजराइल से सीख सकते है।
एक अन्य समस्या फसलों के अवशेष से संबंधित है। एक फसल लेने के बाद दूसरी फसल की बुआई के लिए खेत तैयार करने के लिए किसान खेत में बचे अवशेषों में आग लगा देते है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण को इसका कारण माना गया। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी सख्त हिदायतें राज्य सरकारों को दी है यदि यही फसल अवशेष उचित तकनीक के माध्यम से उपयोग में लाया जायेगा तो इसमें रोजगार की असीम संभावनायें है तथा इससे किसान की आय भी बढ़ेगी। केन्द्र सरकार ने फसल अवशेष (पराली) से जैव-इंधन उत्पादन के एक हजार संयन्त्र लगाने की घोषणा की है जिनमें से 100 संयंत्र हरियाणा में लगाये जाने की योजना है। यह कदम पर्यावरण हितैषी होने के साथ-साथ हमारी विदेशी मुद्रा भी बचायेगा। हमारी खाड़ी देशों पर कच्चे तेल के आयात की निर्भरता में भी कमी आयेगी।
वर्तमान में महाराष्ट्र में इसी जैव-इंधर से 55 वाल्वों बसें चल रही है। अगर यह परियोजना सफल होती है तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। किसान सहकारी-आधार पर इस प्रकार के संयंत्र लगा सकते है। बैंकों द्वारा उनकों पूँजी उपलब्ध करवाई जा सकती है। इससे किसानों को बाजार से डीजल खरीदने की जरूरत नहीं होगी तथा उसका लागत मूल्य भी कम हो सकता है। इसी से जुडे़ कई अन्य उपयोगी कृषि आधारित स्टार्ट-अप कृषि अवशेष से पैकिंग मैटरियल, कागज़ तथा अन्य बायो-डिग्रेडेबल उत्पाद बनाये जा सकते है।
एक अन्य प्रयास जैविक खेती, प्राकृतिक खेती या जीरो-बजट खेती की तरफ करना होगा। पूर्वोतर राज्य सिक्किम ने इस दिशा में पहल की है। हिमालय प्रदेश व उत्तराखंड भी इस दिशा में प्रयास कर रहे है। हरियाणा व पंजाब में भी कुछ प्रगतिशील किसान इस दिशा में प्रयास कर रहे है। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत व स्वदेशी जागरण मंच इस क्षेत्र में किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे है। इसके साथ-साथ किसानों को अपने जैविक उत्पादों के प्रमाणिकरण तथा विपणन जैसी समस्याओं को लेकर सरकार को भी गंभीरता से प्रयास करने होेंगे। जैविक कृषि के साथ-साथ एक अन्य पक्ष मूल्य संवर्धन का है जिससे फसलों व उत्पादों का उचित व लाभकारी मूल्य मिल सके।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी 2022 तक किसानों की आय के दो गुणा करने का वायदा किया है। लेकिन यह सिर्फ सरकार के स्तर पर ही संभव नहीं है। कृषि क्षेत्र में युवाओं में कौशल विकास एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। जिसमें डेयरी फार्मिग, घी व पशु-चारा बनाने की छोटी-छोटी इकाईयाँ स्थापित की जा सकती है। जिससे क्षेत्रीय ब्राँड खड़े हो सकते है। देश भर में फैले कृषि विश्ववि़द्यालय को गांवों को गोद लेकर अपने स्तर पर इस दिशा में पहल करनी चाहिए। अक्सर हमने आलू तथा दूसरी सब्जियों को उचित मूल्य न मिलने के कारण मंड़ियों व सड़को पर सड़ते मीडिया में जरूर देखा होगा। इस समस्या से बचने के लिए ग्रामीण स्तर पर सहकारिता पर आधारित कोल्ड-स्टोर की सुविधाये इस समस्या को हल कर सकती है। इससे बेरोजगारी की समस्या भी हल होगी और किसानों को लाभकारी मूल्य भी मिल सकते है।
प्रायः यह देखने में आया है कि किसान अपने परम्परागत ज्ञान के दम पर कृषि क्षेत्र में ऐसे अविष्कार कर लेते है जिसे कृषि-वैज्ञानिक असंभव करार देते है। अभी तक हम कृषि वैज्ञानिकों से संबंधित ज्ञान को ही अधिक प्रमाणिक मानते है। सरकारी स्तर पर भी परंपरागत ज्ञान को मान्यता दी जाये। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विकास अधिकारियों की भूमिका को फिर से तय करने की जरूरत है उन्हें परियोजना आधारित दायित्व सौंपे जाने चाहिए तथा उनकी पदोन्नति किसानों व परियोजना की सफलता पर आधारित फीड बैंक के माध्यम से हो।
जिस प्रकार बैंकों को औद्योगिक क्षेत्र में स्टार्ट-अप में सहायता के लिए बाध्य किया जाता है उसी तर्ज पर कृषि-विश्वविद्यालय, बैंकों को भी इस दिशा में उनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। इसके लिए युवाओं को कौशल-विकास, विपणन जैसी ट्रैनिंग स्थानीय स्तर पर ही मुहैया की जानी चाहिए।
कृषि क्षेत्र में विश्व-व्यापार संगठन की ब्यूनेस आयर्स में 11वीं मंत्री स्तरीय बैठक में कृषि सबसिडी को लेकर अमेरिका व अन्य विकसित देश भारत पर लगातार दबाव डाल रहे है। इसे देखते हुए किसानों की उपज का लागत मूल्य कम करना तथा गुणवता व मूल्य संवर्धन वक्त की मांग  बन चुकी है। जिससे किसानों की आय बढ़े तथा उनके उत्पाद विश्व-स्तर पर अपनी पहचान बना सकें।
महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाकर फलों व सब्जियों के क्षेत्र में खाद्य प्रंसस्करण उद्योगों में स्टार्ट-अप की असीम संभावनायें बन सकती है। आखिर क्या कारण है कि सहकारिता आधारित ‘लिज्जत पापड़’ व ‘अमूल’ के बाद कोई ब्राडं इतना नहीं उभर पाया है। इसके लिए मुख्य समस्या गुणवता, पैकिंग व ब्रांड़िग की है। भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान जैसी संस्थाओं को इसके लिए भारतीय जरूरतों के हिसाब से मशीनें उपलब्ध करवाने की दिशा में प्रयास करने होगें।
वास्तव में भारत की 60 प्रतिशत जनसंख्या का जीवन कृषि पर निर्भर है। आज का समय कृषि संकट का समय है। कृषि क्षेत्र में उद्यमिता विकास एक नया आयाम सिद्व हो सकती है। जिससे इस क्षेत्र की काया-कल्प हो सकती है। तथा देश भी उन्नति के रास्ते पर अग्रसर हो सकता है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: