जाटलैण्ड की “खाप” बंद नहीँ कर पाएगी “हुक्का- पानी”  ? 

प्रभुनाथ शुक्ल

सर्वोच्च न्यायलय ने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय पर कानूनी चाबुक चला जातीय फैसलों के खिलाफ खाप को सोचने पर मजबूर कर दिया है। फैसले पर सरकार और खाप कितनी संवेदनशील होंगी यह तो वक्त तय करेगा। लेकिन खाप पंचायतों और उनके अस्तित्व को खतरा खड़ा हो गया है। उनकी मनमर्जी अब नहीँ चलेगी। जातीय फैसलों के चलते खाप कभी लड़कियों के जींस पहनने और मोबाइल रखने पर तालिबानी फैसला सुनाती हैं। इसके अलावा आनर किलिंग को लेकर चर्चाओं में रहती हैं ।सर्वोच्च अदालत का यह फैसला गैर सरकारी संगठन शक्ति वाहिनी की उस याचिका पर आया है, जिसके तहत ऑनर किलिंग की घटनाओं को बढ़ावा देने में खाप पंचायतें कथित भूमिकाएँ निभाती रही हैं । पंचायतों पर मानवीय अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगता रहा है। इस फैसले से क्या जातीय पंचायतों यानी खाप अब लोगों के हुक्के – पानी नहीँ बंद कर पाएगी ?

अदालत के इस फैसले से जाटलैण्ड के प्रेमी और युवा जोड़ों को बड़ी राहत मिली है। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि जाति या धर्म कोई भी हो, अगर दो बालिग अपनी मर्जी से विवाह करने का निर्णय करते हैं तो तीसरा पक्ष इसमें दखल नहीं दे सकता। ऑनर किलिंग मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने किसी भी बालिग जोड़ों की शादी पर खाप के पंचायती फैसलों पर रोक लगा दिया है। खाप को ख़त्म करने का भी फैसला सुनाया है । खाप अब किसी भी युवा जोड़े के प्रेम और विवाह के फैसले पर जातीय समूह के फैसलों को नहीँ लाद सकती। जबकि जाट समुदाय में एक ही गोत्र में शादियां नहीँ हो सकती। हालांकि यह प्रतिबंध सिर्फ जाट समुदाय में ही नहीँ बल्कि दूसरे जाति समूहों में भी है। इस फैसले से पंचायतों की जहाँ नींद उड़ी है , वहीँ युवाओं ने चैन की सांस ली है। सरकार के लिए भी फैसला गले की
हड्डी बनता दिखता है। सुप्रीमकोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि कोई भी संगठन शादी को रोकने की कोशिश करता है, तो वह पूरी तरह से गैर कानूनी है। जबकि ऑनर किलिंग मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना बचाव करते हुए कहा है कि ऑनर किलिंग, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में हत्या है। उसी के तहत किसी मामले में करवाई होती है। सरकार ने बात रखते हुए कहा कि

ऑनर किलिंग पर लॉ कमिशन की सिफारिशों पर विचार हो रहा है।  इस संबंध में 23 राज्यों के विचार मिल चुके हैं जबकि बाकि राज्यों के विचार आने बाकी हैं।  कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से कानून बनाए जाने तक गाइडलाइन जारी की है जिसमें दस खास बिंदुओं का उल्लेख किया गया है। यहीं नहीं अदालत
ने राज्यों में पिछले पांच साल के दौरान जिन गांवों और जिलों में ऑनर किलिंग की घटनाएं हुईं हैं उनकी पहचान करने का भी निर्देश दिया है। हालांकि आत्म सम्मान के लिए आनर किलिंग की घटनाएं हमारे समाज के लिए कलंक हैं। जब भी जाति, गोत्र, परिवार की इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं की बात होती है तो खाप पंचायत का उल्लेख बार-बार होता है। खाप पंचायत को युवक और युवती को अलग करने और परिवार का समाजाकि बहिष्कार करने या फ़िर गाँव से निकाल देने का भी आरोप लगता रहा है।
हरियाणा और पश्चिमी यूपी में जाटलैण्ड का खासा
दबदबा है। सामजिक और जातीय मज़बूती के साथ आर्थिक सम्पन्नता भी है। दोनों राज्यों के जाट सरकार हिलाने की तागत रखते हैं। जाटलैण्ड में आरक्षण पर चला आंदोलन जग जाहिर है । किसान आंदोलन से तो दिल्ली हिल जाती है। जिसकी वजह से सरकारें भी नतमस्तक रहती हैं। खाप पंचायत पाँच गाँव
या और बड़ी  25 गाँवों की भी होती हैं। कम जनसंख्या वाले गोत्र भी पंचायत में शामिल होते हैं।  लेकिन प्रभावशाली गोत्र की ही खाप पंचायत चलाती है। पंजाब-हरियाणा के ग्रामीण इलाक़ों में जाटों के पास बड़े – बड़े फॉर्म हाऊस हैं। प्रशासन और राजनीति में इनका ख़ासा प्रभाव है। खाप में औरतें शामिल नहीं होती हैं, केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं। दलित और युवा वर्ग को भी खाप पंचायत की बैठकों में बोलने का हक नहीं होता।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2015 के आंकड़ों  के अनुसार 2014 में ऑनर किलिंग के 28 मामले सामने आए थे, जो 2015 में बढ़कर 251 हो गए।  ऑनर किलिंग के सबसे ज्यादा 168 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए।  इसके बाद गुजरात में 25 और मध्य प्रदेश में 14 मामले सामने आए।  दिलचस्प बात यह है कि 2014 में ऑनर किलिंग के मामलों में दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों के नाम नहीं थे।  लेकिन 2015 में ऐसा नहीं हुआ। 2015 में प्रेम प्रसंग और अवैध संबंधों की वजह से क्रमशः 1,379 और 1,568 लोग मारे गए।  उत्तर प्रदेश और गुजरात प्रेम संबंधों के चलते हत्या के मामले में सबसे ऊपर रहे।  2015 में इस वजह से उत्तर प्रदेश में 383 और गुजरात में 122 लोग मारे गए। जबकि बिहार में प्रेम संबंधों की वजह
से 140 लोगों की हत्या हुई । चौंकाने वाली बात यह है कि यहां पर ऑनर किलिंग का एक भी मामला सामने नहीं आया। संयुक्त राष्ट्र का दावा है कि विश्व स्तर पर 5,000 हत्याओं में 1,000 भारत में होती हैं।  हालांकि गैरसरकारी संगठनों का कहना है कि दुनिया भर में इनकी संख्या 20,000 तक है। आम तौर पर भारत के छोटे शहरों और गांवों में इज्जत के नाम पर हत्या कर दी जाती है। भारत में प्यार या इससे जुड़े कारणों की वजह से हर दिन 7 हत्याएं, 14 आत्महत्याएं और 47 अपहरण की घटनाएं होती हैं। ऑनर किलिंग के आधिकारिक आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एक रिसर्च के अनुसार हर साल हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में कम से कम 900 हत्याएं होती हैं। हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने खाप से अधिक हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर और यूपी की योगी सरकार के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। क्योंकि एक तरफ़ सरकारों के सामने जहाँ कानून – व्यवस्था से निपटने की चुनौती होगी। वहीँ बड़े वोट बैंक के खिसकने का भी भय बना रहेगा। क्योंकि अदालती फैसले सत्ता को कभी पसंद नहीँ आते। इसका मुख्य कारण होता है वह सीधे वोट बैंक को प्रभावित करते हैं। दलित एक्ट पर सर्वोच्च न्यायलय
की तरफ़ से आए फैसले पर भूचाल मच गया है। संसद से लेकर सड़क तक राजनेता आंसू बहा रहे हैं। जिसकी वजह से मोदी सरकार इस फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने पर विचार कर रही है। अदालत का फैसला कर उसी पर कायम रहा तो सरकार विपक्ष के दबाव में कानून भी बना सकती है। सवाल उठता है की अदालत का फैसला जितना खाप पर उचित है उतना ही दलित एक्ट पर खरा है। किसी पीड़ित की बात पर ही फैसला सुनाया गया है। दलित उत्पीड़न पर जितना शोर मचाया जाता है उतना जमीनी हकीकत नहीं  इस तरह की घटनाएं हैं जिसमें पैसे और अंगडी जातियों को परेशान करने के लिए फर्जी मुक़दमें दर्ज़ करवाए जाते हैं। इस कानून का दहेज की तरफ़ दुरुपयोग हो रहा है। गुनाहगार जेल जाएं तो अच्छी बात लेकिन जब कानून का हथकंडा अपना एक बेगुनाह को साजिश और जातिवाद बस जेल भेजा जाता है , वहीँ यह गलत साबित होता है। फ़िर समाज में ऊंच नीच की खाई क्या पाटी जा सकती है, बल्कि यह फांसला और बढ़ता है। अब देखना होगा कि दलित एक्ट की तरह खाप पर भी विधि आयोग की सिफारिशें कितनी शामिल हो पाती हैं। वैसे अदालत के फैसले पर टिप्पणी नहीँ की जा सकती है , लेकिन यह भी सत्य है कि कुछ एक फैसलों को छोड़ समाज के निर्माण में खाप की भूमिकाएं अहम रही हैं। यह आदेश बड़े सामजिक बदलाव से भले जुड़ा हो , लेकिन उससे कहीं अधिक जातीय समूह के खोते अस्तित्व और राजनीति के नफे – नुकसान से जुड़ा है। देखना यह होगा की अदालत के फैसले पर खाप , सरकारें और समाज कितना अमल करती हैं ।

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