रामस्वरूप रावतसरे
गुजरात के उत्तर और मध्य जिलों में चाँदीपुरा वायरस की दस्तक से राज्य का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह अलर्ट हो गया है। संक्रमण से एक महीने में अब तक 12 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें से तीन बच्चे चांदीपुरा वायरस से संक्रमित थे। अन्य 9 बच्चों की मौत भी इसी वायरस से होने की आशंका है हालांकि, इनकी रिपोर्ट आना अभी बाकी है। संक्रमण के मामले गांधीनगर, साबरकांठा, खेड़ा, अरावली और पंचमहल जिलों में सामने आए हैं।
गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया के अनुसार इस घातक वायरस के संक्रमण के कारण अब तक 3 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें से 2 बच्चों की मौत गोधरा और राजस्थान के एक बच्चे की मौत हिम्मतनगर में हुई। प्रभावित क्षेत्रों में रोकथाम के लिए व्यापक स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी गई है। हिम्मतनगर सिविल अस्पताल में चांदीपुरा के संदिग्ध लक्षणों वाले बच्चों की कुल 6 मौतें दर्ज की गई हैं। जबकि तीन बच्चों की मौत गोधरा के सिविल अस्पताल में हुई। इनमें दो बच्चों की मौत 11 जुलाई को हुई। इन दोनों बच्चों में एक बच्चे की उम्र 1 साल और दूसरे की उम्र दो साल थी।
जानकारी के अनुसार अब तक 27 संदिग्ध मरीजों के नमूने गांधीनगर भेजे गए हैं, जिनमें से 19 की जांच हो चुकी है। इनमें से 7 पॉजिटिव पाए गए हैं। पॉजिटिव पाए गए 7 मरीजों में से 3 बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि 4 बच्चों का इलाज चल रहा है। शेष 8 नमूनों की जांच अभी जारी है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में शनिवार को एक बैठक आयोजित की गई थी। जिसमें स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से चर्चा कर रोक थाम के आवष्यक निर्देष दिये गये।
स्वास्थ्य विभाग ने जनता से अपील की है कि इस वायरस के संबंध में सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों और गलत सूचनाओं के कारण घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए सभी आधिकारिक दिशा-निर्देशों पर ही यकीन करें। अफवाहें लोगों की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें एहतियाती उपाय कर रही हैं।
प्रशासन ने राज्य के सभी 61 स्थानों पर गहन सर्वेक्षण करने और दवाओं का छिड़काव करने के आदेश दिए हैं। इनमें से कई जगहों पर 2024 में भी चांदीपुरा वायरस के मामले सामने आए थे। यह वायरस सैंडफ्लाई नाम की मक्खी से फैलता है। यह मक्खी गोधरा और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाई जाती है। इसलिए उन क्षेत्रों में कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा दिया गया है।
जानकारों के अनुसार चाँदीपुरा एक बहुत ही तेजी से फैलने वाला संक्रामक वायरस है। यह वायरस मुख्य रूप से ‘रैब्डोवायरस’ परिवार से ताल्लुक रखता है। जब यह वायरस किसी के शरीर में जाता है, तो यह खून के रास्ते सीधे दिमाग पर हमला करता है। दिमाग पर असर होने के कारण यह वहाँ सूजन पैदा कर देता है। डॉक्टरों की भाषा में इस गंभीर स्थिति को ‘एन्सेफलाइटिस’ या ‘एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम’ कहा जाता है। यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि इसमें लक्षण बहुत तेजी से उभरते हैं। कई बार तो मरीज की हालत महज 24 से 48 घंटे के भीतर ही बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती है।
विषेषज्ञों के अनुसार यह कोई बिल्कुल नया वायरस नहीं है। भारत में सबसे पहले साल 1965 में इस वायरस की पहचान की गई थी। महाराष्ट्र में एक जगह है जिसका नाम चाँदीपुरा है। सबसे पहली बार इसके मरीज इसी चाँदीपुरा गाँव में मिले थे। इसी वजह से डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस जगह के नाम पर ही इस वायरस का नाम ‘चाँदीपुरा वायरस’ रख दिया था। तब से लेकर अब तक देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं। इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर देखने को मिलता है।
चाँदीपुरा वायरस मुख्य रूप से ‘सैंड फ्लाई’ यानी रेतीली मक्खी के काटने से इंसानों में फैलता है। यह बहुत ही छोटी और खून चूसने वाली मक्खी होती है। कुछ जाँचों में यह भी सामने आया है कि टिक्स और मच्छरों के जरिए भी यह आगे बढ़ सकता है। राहत की बात यह है कि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। यानी अगर कोई मरीज खाँसता या छींकता है, तो पास बैठे दूसरे व्यक्ति को इससे कोई खतरा नहीं होता है। चूंकि यह मक्खियों और मच्छरों के काटने से होता है, इसलिए मानसून के मौसम में जब नमी बढ़ती है, तब इसका खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार चाँदीपुरा वायरस के लक्षण अचानक और बहुत तेजी से दिखाई देते हैं। इसमें बच्चे को बहुत तेज बुखार आता है, जो 102 डिग्री से भी ऊपर जा सकता है। इसके साथ ही तेज सिर दर्द, लगातार उल्टी होना, बहुत ज्यादा कमजोरी और सुस्ती आना इसके शुरुआती लक्षण हैं।
जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, बच्चे को दौरे पड़ने लगते हैं, शरीर में अकड़न आ जाती है और वह बेहोश भी हो सकता है। कुछ मामलों में बच्चों को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगती है। अगर बच्चे में ऐसा कोई भी लक्षण दिखे, तो बिना देर किए उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।
इसका इलाज और बचाव के तरीके –
चाँदीपुरा वायरस के लिए अभी तक दुनिया में कोई विशेष टीका या पक्की दवा नहीं बनी है। अस्पताल में डॉक्टर मरीज के लक्षणों को देखकर ही उसका इलाज करते हैं। बुखार कम करने की दवा दी जाती है और दौरे को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाते हैं।
शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए ग्लूकोज चढ़ाया जाता है और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन भी दी जाती है। इससे बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम अपने आसपास सफाई रखें। बच्चों को पूरी आस्तीन के कपड़े पहनाएँ, सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और घर के आसपास पानी या कचरा जमा न होने दें।