वीरेन्द्र सिंह परिहार
मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा उप चुनाव के संदर्भ में नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने के क्या मायने हो सकते हैं ? शायद यह बहुत लोगो की समझ में न आये। वजह स्पष्ट है कि नरोत्तम मिश्रा पूर्व में जहाँ प्रदेश सरकार में कद्दावर मंत्री रह चुके हैं, यहाँ तक कि वह गृह विभाग भी संभाल चुके हैं, वहीं उनकी गिनती प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं में होती थी। प्रदेश में विधानसभा का पिछला चुनाव वह भले हार गये हों लेकिन कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती को न्यायालय से 3 वर्ष की सजा होने और दतिया से उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द होने के बाद यह एक तरह यह सुनिश्चित माना जा रहा था कि नरोत्तम ही विधानसभा उप चुनाव में दतिया से प्रत्याशी होंगे, खास कर उस स्थिति में जब गत दिनों सम्पन्न हुये राज्यसभा चुनाव में उनका नाम जोर-शोर से चला था पर ऐसा माना जाता रहा कि भाजपा उन्हें विधानसभा भेजकर प्रदेश में कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय देना चाहती है, इसीलिए उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा गया।
लेकिन लोग तब हतप्रभ रह गये जब उनकी जगह 10 जुलाई को भाजपा द्वारा नरोत्तम की जगह आसुतोष तिवारी का नाम घोषित कर दिया गया। आसुतोष तिवारी विगत कई वर्षों तक संगठन मंत्री का दायित्व निभा चुके हैं और एक तरह से उन्हें संगठन का आदमी कहा जा सकता है। इसको लेकर नरोत्तम के समर्थकों ने काफी बवाल काटा, कई भाजपाइयों के इस्तीफे की भी खबरे हैं लेकिन इतना तय है कि ऐसे लोगो को भाजपा का विचारनिष्ठ कार्यकर्ता नहीं कहा जा सकता। एक तरह से तो इन्हें भाजपा का कार्यकर्ता भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यदि यह भाजपा के सच्चे कार्यकर्ता होते तो भाजपा का निर्णय स्वीकार करते। आशंका इस बात की है कि यह ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें नरोत्तम ने अपने मत्रित्व-काल में सही-गलत तरीके से उपकृत किया हो। इसीलिए इनके पेट में इतना दर्द हो रहा है।
वस्तुतः भाजपा जब यह कहती है कि यह नया भारत है तो उसी तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि यह नयी भाजपा है जो बने बनाये प्रतिमानों पर काम नहीं करती। वह पार्टी में भी नये-नये प्रयोग करने की पक्षधर है ताकि पार्टी पर किसी क्षेत्र-विशेष में ही सही किसी को यह भ्रम न हो कि उसका एकाधिकार है। टिकट और कुर्सी पर उसका विशेषाधिकार है। इसको कुछ इस तर्ज पर भी समझा जा सकता है कि पद्म पुरूस्कारों को लेकर मोदी सरकार ने जिस ढंग से ग्लैमर और पहुँच के मापदण्ड को समाप्त करते हुये मिट्टी से जुडे़ खांटी सामाजिक कार्यकर्ताओं और कलाकारों को उक्त पुरूस्कार से नवाजा है। कुछ इसी तर्ज पर भाजपा में भी पार्टी को गतिशील एवं मजबूत बनाने, नया नेतृत्व विकसित करने और भाजपा को सही अर्थों में कैडर आधारित पार्टी बनाने के लिये पार्टी नई दिशाओं में काम कर रही है जो बनी-बनाई लीक से सर्वथा अलग है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नितिन नवीन जैसे व्यक्ति हैं, जो प्रदेश सरकार में मंत्री होते हुये अचानक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाते हैं। भजन लाल शर्मा जैसे लोग पहली बार विधायक होते हुये भी मुख्यमंत्री बन जाते हैं।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना भी इसी संदर्भ में लिया जाना चाहिए। इसका आशय स्पष्ट है कि यदि कोई अपने को बड़ा नेता एवं स्थापित नेता मानकर यह चलता है कि भाजपा में उसकी जगह सुरक्षित है तो उसे यह भ्रम तोड़ देना चाहिए। परिवारवादी और वंशवादी प्रवित्तियों के लिये वहाँ कोई कोई जगह तो है ही नहीं। इसके अलावा वहाँ व्यक्तिवादी राजनीति के लिये भी कोई जगह नहीं है। भाजपा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिये वैचारिक प्रतिबद्धता अनिवार्य शर्त है और उसमें किसी तरह का स्खलन स्वीकार करने का भाजपा का नेतृत्व तैयार नहीं है। यह इस बात की स्पष्ट मुनादी है कि भाजपा में एकाधिकार के लिये कोई जगह नहीं है और संगठन सर्वोपरि है। यह इस बात की भी उद्घोषणा है कि भाजपा को अधिक पारदर्शी, प्रमाणित और नेशन फ्रस्ट की अवधारणा को अपनी जीवन पद्धति मानने वालों को ही प्राथमिकता मिल सकेगी।
वीरेन्द्र सिंह परिहार