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    नशे की चपेट में पहाड़ी गांव

    सीमा मेहता

    पोथिंग, कपकोट

    बागेश्वर, उत्तराखंड


    देश का भविष्य युवाओं को माना जाता है. भारत को युवाओं का देश कहा जाता है. दुनिया में सबसे अधिक युवा आबादी भारत में है. इसलिए देश की प्रगति के लिए युवाओं का सही कदम पर चलना बहुत ही जरूरी होता है. लेकिन पिछले कुछ सालों से नशा युवाओं को अपना आदी बना रहा है. वह चोरी छुपे भांग और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन कर अपना भविष्य बर्बाद करने पर तुले हुए हैं. देश के कुछ राज्य ऐसे हैं जहां आधिकारिक रूप से भांग की खेती होती है. इसके लिए सरकार की ओर से लाइसेंस जारी किये जाते हैं. इसका उपयोग कई प्रकार की दवाइयां बनाने में किया जाता है. मेडिकल दृष्टिकोण से जहां इसकी खेती बहुत ज़रूरी है वहीं सामाजिक रूप से इसके भयानक परिणाम सामने आ रहे हैं.


    पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी वर्ष 2018 में पहली बार भांग की खेती के लिए लाइसेंस जारी किया गया है. राज्य के कुछ गांवों में इसकी खेती होती है. जिसमें बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक का गनीगांव भी शामिल है. यह गांव ब्लॉक गरुड़ से करीब 35 किमी दूर है. इस गांव में कोरोना काल के दौरान बड़ी मात्रा में भांग की खेती की गई. लेकिन ज़्यादा आमदनी की लालच में इसकी खेती करने वाले भूल गए कि यह सिर्फ पैसे कमाने का साधन बन कर सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह आने वाली युवा पीढ़ी का भविष्य भी खराब करेगा. अच्छी कमाई को देखते हुए कई किसान अपने पूरे परिवार को इसकी खेती में झोंक रहे हैं. हालांकि कुछ युवा इसके दुष्परिणाम से अच्छी तरह वाकिफ हैं और इसकी खेती बंद कराना चाहते हैं ताकि गांव की युवा पीढ़ी बर्बाद न हो.


    इस संबंध में गांव के एक युवा रोहित का कहना है कि “भांग और चरस का हमारे भविष्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है. लेकिन हमें भांग के खेतों में जबरदस्ती काम करना पड़ता है. अगर यहां काम नहीं करेंगे तो हमारे मम्मी-पापा हमें डांटेंगे. उनका कहना है कि पढ़-लिख कर क्या करोगे? बाद में तो यही काम करना है. हम तो समझ जाते है कि यह चीज अच्छी नहीं है, लेकिन जो हमसे छोटी उम्र के लड़के है, वह नहीं समझ पाते हैं. उन्हें नहीं पता है कि इसका बाद में कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा. हम उन्हें समझाते हैं पर वह समझना नहीं चाहते हैं.” वहीं गांव की एक किशोरी पूजा का कहना है कि “जब से गांव में भांग की खेती की जा रही है. इसके नकारात्मक परिणाम ही देखने को मिल रहे हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसकी वजह से घर में कलेश होता है, मेरे पिता हर रोज नशा करके आते हैं और झगड़ा करते हैं, जिसका सीधा असर हमारी पढ़ाई पर पड़ रहा है. इस झगड़े की वजह से हम स्कूल में भी नहीं जा पाते हैं.”


    नशा के कारण घरों में कलेश इस गांव में आम होती जा रही है. युवाओं के साथ साथ आम ग्रामीण भी इसकी ज़द में आ रहे हैं. इसके कारण पत्नी के साथ मारपीट की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है. नशा के कारण पति के अत्याचारों का शिकार हुई गांव की एक महिला द्रोपदी देवी (बदला हुआ नाम) का कहना है कि “मेरा पति रोज नशा करके घर आता है और मेरे साथ मारपीट और गाली गलौज करता है. हर रोज के इस झगड़े से बच्चे भी बहुत परेशान हैं.” वहीं गांव के एक पुरुष अजय (बदला हुआ नाम) का कहना है कि यहां लोग नशा करके अपनी पत्नी को मारते हैं. कई बार तो उन्हें घर से बाहर भी निकाल देते हैं. वह महिला पूरी रात घर के बाहर बैठी रहती है. अगर कोई उसकी मदद करता भी है तो उसका नशेड़ी पति उन्हीं के साथ गाली गलौज करता है. आखिर कब तक ऐसा चलेगा? कब हमारे देश को नशे से छुटकारा मिलेगा? इसकी वजह से न जाने कितने परिवार टूट कर बिखर चुके हैं. कितनी मौतें हो चुकी हैं, लेकिन लोग सबक लेने की जगह इसकी आदत नहीं छोड़ रहे हैं. हैरत है कि व्यक्ति मरना पसंद करता है पर नशा छोड़ना नहीं. 


    इस संबंध में प्राथमिक विद्यालय, गनीगांव के शिक्षक चंद्र प्रकाश का कहना है कि ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिन्होंने भांग की खेती और नशा करने के लिए स्कूल छोड़ा है. वो बच्चे अक्सर स्कूल में नशे की हालत में आते थे. वह खुद तो नशा करते थे दूसरे बच्चों को भी इसके लिए उकसाते थे. इस संबंध में उनके घर वालों से शिकायत भी की, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. इसलिए कुछ छात्रों को स्कूल से बाहर निकल दिया गया. गांव में नशे की बढ़ती लत से पंचायत भी चिंतित है. गांव के प्रधान नरेंद्र रावत का कहना है कि “गांव में भांग की खेती नहीं करने के लिए मैंने कई बार लोगों को समझाया भी है. लेकिन कुछ लोगों की रोजी रोटी इसी से चलती है. मैं कई बार बच्चो को देखता हूं कि वह जंगलों में छिपकर भांग का सेवन करते हैं. ज़्यादा पैसे की लालच में इसकी खेती करने वाले उनके माता पिता को इसका दुष्परिणाम समझना जरूरी है. इस संबंध में कई बार पंचायत भी बुलाई गई और इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा की गई, परंतु लोग अब इसके आदि हो चुके हैं.


    इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रेंडी का कहना है कि नशा के कारण न केवल गांव का सामाजिक ताना बाना बिखर रहा है और युवा बर्बाद हो रहे हैं बल्कि घरों में भी कलेश बढ़ता जा रहा है. बच्चे और युवा जहां स्कूल और कॉलेज जाने की जगह खुद को नशे में लिप्त कर रहे हैं वहीं आम ग्रामीण इसका सेवन कर पत्नी के साथ मारपीट करने लगा है. इस प्रकार की पारिवारिक हिंसा का सबसे अधिक शिकार महिलाएं हो रही हैं. वहीं घर की किशोरियों पर भी इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है. वह मानसिक रूप से हिंसा का शिकार हो रही हैं और इसके कारण उनकी शिक्षा भी प्रभावित हो रही है. यदि जल्द से जल्द इस पर कार्यवाही नहीं की गई तो गांव बिखर जाएगा.


    वास्तव में, नशा किसी भी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता है. यह न केवल घरों को बर्बाद करती है बल्कि युवा पीढ़ी को भी खोखला कर देती है. यदि मेडिकल और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भांग या किसी नशीले पदार्थों की खेती ज़रूरी भी है तो इसके लाइसेंस जारी करने के साथ साथ इस बात को भी सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि यह अवैध रूप से युवाओं तक न पहुंचे. यदि ऐसा नियम पहले से है तो इसकी दुबारा समीक्षा की ज़रूरत है. ज़रूरत इस बात की है कि जिस गांव में भी इसकी खेती के लिए लाइसेंस जारी किये जाएं वहां के युवाओं को इसके सेवन से होने वाले नकारात्मक पहलुओं के प्रति लगातार जागरूक किया जाए. चरखा फीचर

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