लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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(१)जापान ने अपनी उन्नति कैसे की?

जापानी विद्वानों ने जब उन्नीसवीँ शती के अंत में, संसार के आगे बढे हुए, देशों का अध्ययन किया; तो देखा, कि पाँच देश, अलग अलग क्षेत्रों में,विशेष रूप से, आगे बढे हुए थे।

 

(२) वे देश कौन से थे?

वे थे हॉलंड, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, और अमरिका।

 

(३) कौन से क्षेत्रो में, ये देश आगे बढे हुए थे?

देश और उन के उन्नति के क्षेत्रों की सूची

जर्मनी{ जर्मनी से जपान सर्वाधिक प्रभावित था।}:

भौतिकी, खगोल विज्ञान, भूगर्भ और खनिज विज्ञान, रसायन, प्राणिविज्ञान, वनस्पति शास्त्र, डाक्टरी, औषध विज्ञान, शिक्षा प्रणाली, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र.

Germany: physics, astronomy, geology and mineralogy, chemistry, zoology and botany, medicine, pharmacology, educational system, political science, economics;

फ्रान्स:

प्राणिविज्ञान, वनस्पति शास्त्र, खगोल विज्ञान, गणित, भौतिकी, रसायन, वास्तुविज्ञान (आर्किटेक्चर), विधि नियम, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, जन कल्याण.

France: zoology and botany, astronomy, mathematics, physics, chemistry, architecture, law, international relations, promotion of public welfare;

ब्रिटैन:

मशीनरी, भूगर्भ और खनन(खान-खुदाई) विज्ञान, लोह निर्माण , वास्तुविज्ञान, पोत निर्माण, पशु वर्धन, वाणिज्य, निर्धन कल्याण.

Britain: machinery, geology and mining, steel making, architecture, shipbuilding, cattle farming, commerce, poor-relief;

हॉलंड:

सींचाई, वास्तुविज्ञान, पोत निर्माण, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, निर्धन कल्याण.

Holland: irrigation, architecture, shipbuilding, political science, economics, poor-relief

संयुक्त राज्य अमरिका:

औद्योगिक अधिनियम, कृषि, पशु-संवर्धन, खनन विज्ञान, संप्रेषण विज्ञान, वाणिज्य अधि नियम.

U.S.A.: industrial law, agriculture, cattle farming, mining, communications, commercial law

(Nakayama, 1989, p. 100).

फिर जापान ने इन देशों से उपर्युक्त विषयों का ज्ञान प्राप्त करने का निश्चय किया। अधिक से अधिक जापानियों को ऐसे ज्ञान से अवगत कराना ही उसका उद्देश्य था। जिससे अपेक्षा थी कि सारे जापान की उन्नति हो।

 

(४) तो फिर क्या, जापान ने सभी जापानियों को ऐसा ज्ञान पाने के लिए अंग्रेज़ी पढायी?

उत्तर: नहीं, यह अंग्रेज़ी पढाने का प्रश्न भी शायद जापान के, सामने नहीं था। क्यों कि जिन ५ देशों से जापान सीखना चाहता था, वे थे हॉलंड, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, और अमरिका।

मात्र अंग्रेज़ी सीखने से इन पाँचो, देशों से, सीखना संभव नहीं था।

दूसरा सभी जापानियों को पाँचो देशों की भाषाएं भी सीखना असंभव ही था।

 

५) क्या जर्मनी, फ्रांस, और हॉलंड में, अंग्रेज़ी नहीं बोली जाती ? अंग्रेज़ी तो अंतर राष्ट्रीय भाषा है ना?

उत्तर: नहीं। जर्मनी में जर्मन, फ्रांस में फ़्रांसीसी, हॉलण्ड में डच भाषा बोली जाती थी। पर, इंग्लैंड और अमरिका में भी कुछ अलग अंग्रेज़ी का चलन था। उस समय अमरिका भी विशेष आगे बढा हुआ नहीं था, यह अनुमान आप उसके उस समय के, उन्नति के क्षेत्रों को देखकर भी लगा सकते हैं।

 

६) तो फिर जापान ने क्या किया?

जापान ने बहुत सुलझा हुआ निर्णय लिया। उसके सामने दो पर्याय थे।

 

७) कौन से दो पर्याय थे?

एक पर्याय था:

सारे जापानियों को परदेशी भाषाओं में पढाकर शिक्षित करें, उसके बाद वे जपानी, परदेशी विषयों को पढकर विशेषज्ञ होकर जपान की उन्नति में योगदान देने के लिए तैय्यार हो जाय।

 

(८) दूसरा पर्याय क्या था? {जो जापान नें अपनाया }

कि कुछ गिने चुने मेधावी युवाओं को इन पाँचो देशों में पढने भेजे। ये मेधावी छात्र वहाँ की भाषा सीखे, और फिर अलग अलग विषयों के निष्णात होकर वापस आएँ। वापस आ कर उन निष्णातों नें, जो मेधावी तो थे ही, सारे ज्ञान को जापानी में अनुवादित किया, या स्वतंत्र रीति से लिखा। सारी पाठ्य पुस्तकें जापानी में तैय्यार हो गयी।

 

(९) इसमें जापान का क्या लाभ हुआ?

जापान की सारी जनता को, उन पाँचो देशों की ज्ञान राशि सहजता से जापानी भाषा में उपलब्ध हुयी।

 

(१०) तो क्या हुआ?

तो प्रत्येक जापानी का किसी विशेष विषय में विशेषज्ञ होने में लगने वाला समय बचा।

करोडों छात्र वर्ष बचे, उतने वर्ष उत्पादन की क्षमता बढी। समृद्धि भी इसी के कारण बढी। छात्र वर्ष बचने के कारण शिक्षा पर शासन का खर्च भी बचा। उतनी ही शीघ्रता से जापान प्रगति कर पाया। जापान का प्रत्येक नागरिक का जीवन मान भी ऊंचा हो पाया। जापानी शीघ्रता से कम वर्ष लगा कर विशेषज्ञ हो गया। अनुमानतः प्रत्येक जापानी के ५-५ वर्ष बचे, तो उतने अधिक वर्ष वह प्रत्यक्ष उत्पादन में लगाता था।

 

११) एक और विशेष बात हुयी जापान अपनी चित्र लिपि युक्त भाषा भी बचा पाया।

अपनी अस्मिता, राष्ट्र गौरव भी बढा पाया। भाषा राष्ट्र की संस्कृति का कवच कहा जा सकता है। उसके बचने से जापान की अस्मिता भी अखंडित रही होगी।

 

(१२) मुझे एक प्रश्न सताता है। जब जापान अपनी कठिनातिकठिन चित्रलिपि द्वारा प्रगति कर पाया, तो हम अपनी सर्वोत्तम देव नागरी लिपि के होते हुए भी आज तक कैसे अंग्रेज़ी की बैसाखी पर लडखडा रहे हैं? हमारा सामान्य नागरिक क्यों आगे बढ नहीं पाया है?

10 Responses to “हिंदी हितैषि जापान से क्या सीखें ? –डॉ. मधुसूदन”

  1. ken

    we all praise Hindi but don’t want to take these mini steps to promote it globally.

    1-Simplify Hindi script by writing in India’s simplest Shirorekhaa and Nuktaa free Gujarati Script.If borrowed words from English language can be written the way we want why not Urdu words?Why create special letters for Urdu words?Do they change their script to adopt Hindi words?
    2-Try to convert Hindi in easily readable Roman script.
    3-Make Hindi instantly translatable in English.
    4-constantly try to translate all general and scientific knowledge in to Hindi.
    5-Borrow simple words from other Indian languages that keeps Hindi less Sanskritized.
    6-Reduce the use of Chandrabindu /Anuswar words for simple Roman transliteration.
    7-Focus more on translatable words but not on local dialect- ed words.
    8-Teach Hindi to others in their state language script through script converter by following two language script formula through out India.

    See the links.
    http://www.5minuteenglish.com/why-learn-english.htm
    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_English-speaking_population

    Reply
  2. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    प्रतिभा सक्सेना

    जब तक हीनता की ग्रंथि से मुक्त नहीं होंगे हम किसी से कैसे कुछ सीखेंगे !अपनी भाषा बोलने में हमारे लोगों को लज्जा आती है ,हर जगह अंग्रेज़ी झोंकते हैं.स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही ,जो नेतृत्व मिला वह देश का स्वाभिमान जगाने और अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना जगाने से उदासीन रहा .उसके बाद से स्थितियाँ और बिगड़ती गईँ .आज देश पर विदेशी तंत्र पूरी तरह हावी है .
    ‘यथा राजा तथा प्रजा’
    हमारे युवा जिनका अँधानुकरण कर रहे हैं ,उन देशों की उपयोगी बातों और श्रेष्ठ गुणों की ओर से आँखें मूँदे रहते हैं . अपनी मातृभूमि के प्रति निष्ठा ,दृढ़ संकल्प एवं कठिन अध्यवसाय से जापानियों ने ने युद्ध की भयानक विभीषिका से उबर कर विश्व में अपना विशेष स्थान बनाया है .
    विद्वानों और चिन्तकों की उपेक्षा, नीति निर्विधारण में अदूरदर्शिता और भी जाने क्या क्या .कहाँ तक कहा जाय
    भाषा ही भ्रष्ट हो गई तो संस्कृति कहाँ बची रह सजायेगी ?
    !

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr Madhusudan

      बहन प्रतिभा जी आपके प्रत्येक शब्द से सहमति.
      चारों ओर से प्रमाणित करने की ठानी है. इश्वर इस कार्य में सहायता करे.
      प्रयास करते रहेंगे.
      मुझे जापान के प्रति कभी नहीं था, इतना अहोभाव जाग्रत हो गया.
      “आ नो भद्रः क्रतवो यन्तु विश्वतः|” सिखा गए हमारे पुरखे, हमें किसी से भी सीख लेने में क्या लज्जा?
      बहुत बहुत धन्यवाद.

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  3. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    प्रिय अवनीश
    –निम्न अंतिम वाक्य ही, इस आलेख का,निष्कर्ष माना जाए।
    (१)==>”जब जापान अपनी कठिनातिकठिन चित्रलिपि द्वारा प्रगति कर पाया, तो हम अपनी सर्वोत्तम देव नागरी लिपि के होते हुए भी आज तक कैसे अंग्रेज़ी की बैसाखी पर लडखडा रहे हैं? हमारा सामान्य नागरिक क्यों आगे बढ नहीं पाया है?”वैसे जपान ने जर्मन,फ्रान्सीसी, डच और अंग्रेज़ी भाषाओं में, इने गिने जपानी छात्रों को प्रशिक्शित करके, परदेश भेजकर, इन भाषाओं के ग्रंथों को, अनुवादित करवा के सारे जापान के लिए वह ज्ञान राशि उपलब्ध कराई थी।, केवल अंग्रेजी की नहीं।
    (३)उस समय जपान में, (भारत में भी) जर्मनी सबसे ऊपर माना जाता था। अमरिका, या इंग्लैंड नहीं।
    (४) इतिहास बताता है, कि कभी जर्मनी, कभी इंग्लैण्ड, कभी रूस, कभी अमरिका ऊपर रहे हैं।

    प्रश्न: तो क्या भारत हर बार अलग अलग भाषाओं के माध्यम बदल बदल कर, पढाया करेगा?
    आशीष सहित।

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  4. अवनीश सिंह

    यानि जापान में सिर्फ उन्हें ही कोट (अंग्रेजी भाषा) पहनाया गया जो इसे पहनने के लायक थे या पहनना चाहते थे पर हमारे यहाँ तो हालत बड़ी विचित्र है | आपके दिमाग और शरीर को क्या अच्छा साबित हो सकता है, इन सबको कोई परवाह नहीं है| व्यवसायी हो तो भी कोट (अंग्रेजी), कर्मचारी हो तो भी , विद्यार्थी हो तो भी | जबरदस्ती है बस|

    //अपनी भाषा में कोई काम करने में जो समय लगता है, किसी अन्य भाषा से उसी कार्य में लगभग पांच से छह गुना समय लगता है|

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  5. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    प्रिय विपिन जी—सही कहा “हमें एक राष्ट्रीय आन्दोलन के द्वारा हिन्दी को व्यवहारिक रूप में राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रयास करना होगा। हिन्दी और संसकृत जैसी सक्षम भाषाओं के प्रचार-प्रसार से भारत ही नहीं, पूरा विश्व लाभान्वित होगा।”—

    मेरी भी दृढ मान्यता, धारणा, संकल्पना Conviction यही है,
    (१) हिंदी राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति करती है।
    (२) संस्कृत हमारी आध्यात्मिकता की परिचायक ही नहीं, हमारे सारे आध्यात्मिक ज्ञान का कोष केवल संस्कृत में है। हमारे शत्रु मॅक्समूलर भी यह जानते थे। जर्मनी की सारी प्रगति भी हमारे यहाँसे हडप लिए गए ग्रंथों से हुयी है। इसी लिए भी संस्कृत को इन्डो-जर्मेनिक कहकर हमसे नाता जोडने का असफल प्रयास जर्मनों ने, किया था। नाज़ी स्वस्तिक भी इसी कारण से लिया गया माना जाता है।
    ====> जपान भी जर्मनी को ही सर्वोन्नत मानता था।<===
    १९४५ के, हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम्ब स्फोट के बाद भी जपान स्मशानवत बना था, फिनिक्स पक्षी की भाँति उठ खडा हुआ, और १५-२० वर्षॊं में फिर से आगे? चमत्कार से कम नहीं।
    केवल राष्ट्र भक्ति के कारण!

    इतिहास की पंक्तियों के बीच का अलिखित पढने का अध्ययन करना पडेगा। पर्याप्त तेजो महालय, ताज महलों के नीचे दबे पडे लगते हैं। सम्प्रति जापान पर और एक आलेख बनाने का विचार है।
    फिर हिंदी पर सोच रहा हूँ।
    प्रेम बनाए रखिए–आप की असहमति भी गलत दिशा कि सोचसे सावधान ही करेगी।धन्यवाद।

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  6. bipin kishore sinha

    आपने अपने लेख में कारण और समाधान, दोनों दिया है। एक स्वाभिमानी राष्ट्र की पहचान उसकी अपनी भाषा से होती है। भारत की १४ भाषाएं संविधान के अनुसार को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त है। हिन्दी भी उनमें से एक है। व्यवहारिक रूप में इस देश की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। देश की स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दी का उपयोग राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक था, परन्तु उसके बाद लार्ड मेकाले की मानसिकता वाले हमारे काले अंग्रेजों ने अंग्रेजी को भारत में इस तरह प्रतिष्ठित किया कि यह शासन की भाषा बन गई। भारतीय संसद की कार्यवाही का कभी सजीव प्रसा्रण देखा है? लगता है हम ब्रिटिश पार्लियामेन्ट का प्रसारण देख रहे हों। जानबूझकर यह भ्रान्ति फैलाई गई कि बिना अंग्रेजी के ज्ञान के उच्च शिक्षा, विशेष रूप से इन्जीनियरिंग, मेडिकल, प्रबन्धन या विज्ञान की पढाई नहीं की जा सकती। अच्छी नौकरी के लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य माना गया। इस भ्रान्ति को सच समझकर आज की तिथि में सभी अभिभावकों और बच्चों ने सत्य मान लिया है। लोग अपने नवजात बच्चे से भी अंग्रेजी में बात करते हैं। मातृभाषा का प्रचलन पूरे भारत में लुप्त होता जा रहा है। यह एक खतरनाक संकेत है, लेकिन यह हो रहा है। स्वार्थ के लिए अंधे राजनीतिज्ञों ने देश की अस्मिता गिरवी रख दी है, राष्ट्रीय स्वाभिमान को बेच दिया है। भारत में राष्ट्रीय स्वाभिमान के पुर्जागरण में आपके लेखों की शृंखला निश्चित रूप से आंखें खोलने वाली है। हमें एक राष्ट्रीय आन्दोलन के द्वारा हिन्दी को व्यवहारिक रूप में राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रयास करना होगा। हिन्दी और संसकृत जैसी सक्षम भाषाओं के प्रचार-प्रसार से भारत ही नहीं, पूरा विश्व लाभान्वित होगा।

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  7. T raj relan

    आपके प्रश्न १२ का उत्तर- काले अंग्रेजों से प्रभावित व्यवस्था में अपने माता पिता के बारेमे भी अपनी राय विदेशी चश्मे से देख कर ही बनाते हैं. तब यही सब तो मिलेगा. जैसा बोया वैसा पाया . तिलक संपादक युगदर्पण मीडिया समूह ९९१११११६११.

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