प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह अत्यंत रोचक है दादरा नगर हवेली का इतिहास

मुक्ति दिवस २ अगस्त पर विशेष :अवधेश कुमार सिंह

केंद्रशासित प्रदेश दादरा नगर हवेली प्राकृतिक सौन्दर्य जितना खूबसूरत है इसका इतिहास भी उतना ही गौरवशाली है। महाराष्ट्र और गुजरात के मध्य स्थित ४९१ वर्ग किलोमीटर भूभाग पर फैले ७१ गांवो का यह शांत, हरे-भरे वनों से अच्छादित, सर्पीली नदियों एवं सुन्दर पहाड़ो, विभिन्न नयनाभीराम छवि तथा हृदय को छू लेने वाले वनस्पतियों से सुसज्जित यह केन्द्रशासित प्रदेश प्रकृति का बहुमूल्य धरोहर है। कूदरत से सुन्दरता का खजाना यहां दोनो हाथों से जी भर कर लुटाया है। यही कारण है कि प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण संघ प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली स्वच्छ भूमि, अविस्मरणीय एवं मनोरम पर्यटन केन्द्र तथा औद्योगिक क्षेत्रों का सरताज के रूप में जाना जाता है। वही दानह के बीते हुए समय की ओर नजर डाले तो पता चलता है कि यह प्रदेश कई ऐतिहासिक दस्तावेजों, धरोहरों को अपने अंतःकरण में समेटे हुए है।

 २ अगस्त को अपनी मुत्ति की ६७ वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहा केंद्रशासित प्रदेश दादरा नगर हवेली आज विकास के पथ पर अग्रसीत होते हुए देश के मुख्य धारा के साथ कदमताल मिलाकर चल रहा है। संघ प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली के ६७ वें मुक्ति दिवस के शुभ अवसर पर सर्वप्रथम समस्त क्रांतिवीरों, स्वतंत्रता सेनानियों, आजादी के मतवालों और मुक्तिदूतों को  कोटि – कोटि नमन तथा  हार्दिक अभिनंदन जिनके निःस्वार्थ कार्यों, त्याग, तपश्या एवं बलिदान के दम पर हम सभी इस मुक्ति के माहौल में स्वच्छंद सांसे ले रहे है। 

उल्लेखनीय है कि १६ वीं सदी के आखिर में यूरोपीय देशों के बीच उपनिवेश और साम्राज्य को लेकर जंग छिडी हुई थी। नए साम्राज्यों और उपनिवेशों की तलाश में  जहां अंग्रेजों ने बंगाल की खाडी के सीने चीरते हुए कलकत्ता में प्रवेश किया वहीं अनन्त लिप्सा लिए पूर्तगाली नाविक गोवा, पांडेचरी होते हुए दमण-दीव व दादरा नगर हवेली पहूंचे और उसके बाद की गतिविधियों से इतिहास उछूता नहीं है।

इतिहासकारों के अनुसार १७ वीं सदी के अंतिम हिस्से में मराठा गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज को परास्त करने के लिए अंग्रेजों ने एक संधि के तहत पूर्तगालियों को संघ प्रदेश ’दादरा एवं नगर हवेली उपहार स्वरूप भेंट दिया। इस प्रसंग में कुछ इतिहासकारों का मानना है कि दानह से सटे दमण, दीव, गोवा आदि जगहों पर अपना प्रभुत्व जमाने के बाद पूर्तगालियों ने तत्कालीन शासक रामसिंह तथा उनके उत्तराधिकारी जयदेव सिंह का मराठा अधिपति शिवाजी महाराज से विवाद हो जाने के बाद दानह पर अपना प्रभुत्व कायम किया किन्तु अन्य इतिहासकारों के मतानुसार राजा जयदेव सिंह के शासन को छिन्न-भिन्न कर देने के बाद मराठा अधिपति छत्रपति शिवाजी ने दादरा एवं नगर हवेली को अपने शासन के अधीन कर लिया। इसी क्रम में महाराष्ट्र के वसई के पास एक मराठा सेना नायक ने पूर्तगालियों पर हमला बोलते हुए उसके कई बेडों को तहस-नहस कर दिया। पूर्तगालियों ने इसे समझौते  का उल्लंघन करार देते हुए मराठों से हर्जाना की मांग की। पूर्तगालियों की मांग मानते हुए तत्कालीन मराठा शासकों ने पूरे दादरा नगर हवेली को हरजाने के रूप में पूर्तगालियों को सौंप दिया और यहीं से शुरू हुई स्वर्णिम इतिहास को संजोने वाली दादरा नगर हवेली की गुलामी की कहानी..!

पूर्तगालियों के बंधन में जकडे-जकडे, प्राकृतिक आपदाओं को झेलते-झेलते तथा पूर्तगालियों की अन्यायपूर्ण कर प्रणाली से त्रस्त दादरा नगर हवेली की आदिवासी जनता पूरी तरह से दिशाहीन, शत्तिहीन होकर अपने नसीब से समझौता करने को मजबूर हो गए थे। इस दौरान पूर्तगालियों ने दादरा नगर हवेली की जनता पर कई कठिन कर प्रणाली तथा नियम-कानून थोप दिए । जानकारी के अनुसार इसी क्रम में १८ वीं सदी के अंत में दादरा नगर हवेली में भयंकर सूखा पडा किन्तु कर वसूलने में पूर्तगालियों के और सख्ती बरतनी शुरू की। इस दोहरे मार से प्रदेश की तथाकथित आदिवासी जनता घबडा कर प्रदेश से पलायन करने लगे। इसी दौरान १९ वीं सदी के शुरूआत में ब्रिटेन की महारानी ने एक विधेयक पास कर भारतीयों को कुछ स्वातंत्रता देने का निर्णय लिया।

ब्रिटेन द्वारा अपने उपनिवेशों में लोगों को कुछ स्वायत्तता दिये जाने के विधेयक के संदर्भ में पूर्तगाली संसद में भी इस बात की चर्चा हुई कि पूर्तगाल द्वारा कब्जा किए गए भारतीय क्षेत्रों के लोगों को पूर्तगाली सरकार की तरप से कुछ मौलिक अधिकार तथा स्वायत्तता प्रदान की जाय। इसको अमल में लाने के लिए पूर्तगाली संसद में एक विधेयक पास कर क्षेत्र से एक जनप्रतिनिधि को पूर्तगाली संसद में बैठने का प्रावधान किया गया ताकि वे अपने क्षेत्र की समस्याओं को पूर्तगाली संसद में उठाए।

इस क्रम में पूर्तगालियों द्वारा तय की गई कर प्रणाली में थोडी ढालाई भी दी गई, किन्तु उसका विशेष फ़ायदा दानह की आदिवासी जनता को नहीं मिल पाया। पूर्तगालियों द्वारा कर वसूलने के लिए नियुक्त  किए गए पटेलों का रवैया आदिवासी जनता के प्रति पूर्ववत ही रहा। एकबार बदलाव की आस में पुनः दादरा नगर हवेली आए आदिवासियों को पूर्ववत गुलामी की मार झेलनी पडी। स्वाधीनता के  क्रांतिवीरों द्वारा भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुडा लेने के बाद स्वतंत्रता प्रिय लोगों ने दानह को भी पूर्तगालियों के चंगुल से मुक्त  कराने की मुहीम छेड दी, जिसकी परिणति २ अगस्त १९५४ को दानह के मुक्ति  के रूप में हुई। इस संग्राम में दो महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान था। एक थीं श्रीमती हेमवतीबाई नाटेकर, जिनका भारत की सीमा में सिलवासा के नजदीक एक सेवाश्रम था, जिन्होंने श्री वाकणकर, श्री काजरेकर, श्री नरवणे को पूर्व तैयारी हेतु आश्रम से सभी प्रकार की सहायता दी। यह स्थान क्रांतिकारियों के लिए आश्रय स्थान था। श्रीमती नाटेकर ने सभी प्रकार के खतरे उठाते हुए सहायता की थी। आज वह नहीं है, किन्तु उनका नाम अन्य क्रांतिकारियों के साथ अजर-अमर हो गया है। दूसरी महिला जिनका अतुलनीय योगदान इस संग्राम में था, वह हैं श्रीमती ललिता फड़के, जो श्री सुधीर फड़के की धर्मपत्नी हैं। इस संग्राम के दौरान वह अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर अपने सहयोगियों की मदद करती थीं। उन्होंने श्री सुधीर फड़के के साथ निरन्तर कठिन प्रवास किया। आज सम्पूर्ण प्रदेश उन क्रांतिवीरो के समक्ष नतमस्तक है। अंत में हमे उम्मीद है कि संघ प्रदेश दानह का प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों का सम्यक रूपे निर्वहन करते हुए प्रदेश के विकासोन्मुखी प्रक्रिया में अपनी अहम भूमिका अदा करते हुए कार्य करेंगे। आज हमें लगता है कि हमारे शहीद मुक्तिदूतों की आत्मा हमसे यही कहती होगी…

रोशनी में भी चिरागों को जलाए रखना,

ये बातें हवाओं को भी बताए रखना,

लहू देकर भी जिसकी हिफाजत की हमने ,

ऐसे प्रदेश की आन को बनाए रखना।

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