रामस्वरूप रावतसरे
सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ग्रह नक्षत्र ख़राब ही चल रहे हैं। इजरायल ने बुलाया अमेरिका को कि ईरान पर हमला करना है। जंग अमेरिका और ईरान की और क्रॉसफायर में आ गया सऊदी अरब, वो सऊदी अरब जिसके पास तेल की ताकत है। वो सऊदी अरब जो ट्रंप के भरोसे बैठा था कि उसकी रक्षा अमेरिका करेगा और जब लगा कि नहीं कर पा रहा तो तुर्की और पाकिस्तान को ले आया था इस्लामी नाटो जैसे समझौते के नीचे लेकिन यह नाटो भी कुछ काम नहीं आ रहा। यमन के हूती लड़ाकों ने नाकों चने चबवा रखे हैं और वो एक-एक करके प्रिंस के सारे सपने तोड़ते जा रहे हैं।
अब दम्माम के एयरपोर्ट पर हमला हो गया। पहले रियाद के एयरपोर्ट पर हमला हो गया था। उसके तेल के कुओं पर हमले हो रहे हैं। उसकी तेल की रिफाइनरियों पर हमले हो रहे हैं। उसकी तेल की पाइपलाइन पर हमला हो चुका है। पाकिस्तान, तुर्की, अमेरिका कह रहे है हम संभाल लेंगे, लेकिन संभाल कोई नहीं रहा। मोहम्मद बिन सलमान चोट पर चोट खाए जा रहा है। बहुत जतन किए थे प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अपनी ताकत मजबूत करने के लिए। 2015 में जब उनके पिता किंग सलमान राजा बने तो उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया। तब से उन्होंने धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथ में ली। 2017 में उन्होंने अपने चचेरे भाई मोहम्मद बिन नायेफ को हटाकर खुद को क्राउन प्रिंस बना लिया। उसी साल रिट्ज-कार्लटन होटल में बड़े-बड़े राजकुमारों और व्यापारियों को गिरफ्तार करके ऐंटी-करप्शन अभियान चलाया। इससे विरोधियों को साफ संदेश गया कि अब उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता।
प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने तेल पर निर्भरता कम करने के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए थे। नीओम नाम का दुनिया का सबसे आधुनिक शहर बनाने जा रहे थे। लाल सागर पर टूरिज्म प्रॉजेक्ट लॉन्च किए ताकि टूरिज्म सिर्फ हज और उमराह वाला ही ना हो। सिनेमाघर खोले, कॉन्सर्ट शुरू किए, महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाजत दी और वहां की धार्मिक पुलिस की सख़्ती कम की। जानकारों के अनुसार विदेश नीति में भी उन्होंने कई दांव खेले। पहले तो सारे दांव सही पड़ते गए। 2015 में यमन में हूती लड़ाकों के ख़िलाफ अभियान शुरू किया। कतर के खिलाफ नाकाबंदी लगाई। अमेरिका के साथ, खासकर ट्रंप के समय में, बहुत करीबी रिश्ते बनाए और भारी हथियार खरीदे। 2023 में चीन की मदद से ईरान के साथ भी समझौता कर लिया। इस्लामी देशों का लीडर कौन होगा शिया ईरान या सुन्नी सऊदी अरब, पहले यही तनाव चलता रहता था। वो तनाव कम करने के लिए ईरान के साथ भी समझौता कर लिया था क्योंकि उनको स्थिरता चाहिए थी ताकि उनका विजन 2030 साकार हो। दुनिया भर में बड़े-बड़े निवेश किए। फ़ुटबॉल क्लब खरीदे, गॉल्फ लीग शुरू की और खेलों के ज़रिए देश की छवि बदली।
यही नहीं, मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब को सुरक्षित करने के लिए तुर्की और पाकिस्तान के साथ सिक्योरिटी पैक्ट किया। हूतियों के प्रचंड प्रहार के सामने कथित इस्लामिक नाटो की भी धज्जियां उड़ चुकी हैं।
एमबीएस के नाम से प्रिंस दुनिया भर के चहेते होते जा रहे थे लेकिन 2026 में किसी की ऐसी नजर लगी कि सब दांव उल्टे पड़ते चले गए। ईरान अमेरिका युद्ध ने सब बदल दिया है। एमबीएस ने सोचा था कि सऊदी अरब को सिर्फ तेल से नहीं बल्कि टूरिज्म, मनोरंजन, नए शहरों और विदेशी निवेश से आगे बढ़ाएंगे। इसके लिए उन्होंने देश को सुरक्षित, आधुनिक और खुला दिखाने पर पूरा ज़ोर लगाया था। एयरपोर्ट्स को दुनिया से जोड़ने वाले गेटवे बनाया, बड़े सम्मेलन बुलाए, निवेशकों को बुलाया लेकिन अब रियाद और दम्माम जैसे एयरपोर्ट बार-बार निशाने पर आ रहे हैं, फ्लाइटें रद्द हो रही हैं, लोग डरे हुए हैं। जब राजधानी में मिसाइलें गिरें और विदेशियों की जान जाए तो निवेशक और टूरिस्ट कैसे आएंगे? वो चमक जो उन्होंने बनाई थी, अब धुंधली पड़ रही है।
एमबीएस को उम्मीद थी कि ट्रंप के साथ रिश्ते और हथियारों की खरीद से सऊदी अरब को ईरान और उसके समर्थन वाले गुटों से पूरी सुरक्षा मिलेगी। उन्होंने सोचा था कि अमेरिका आगे खड़ा रहेगा लेकिन जब हूती विद्रोहियों के हमले बढ़े तो अमेरिका ने अपने स्टाफ और उनके परिवारों को सबसे पहले वहां से निकाल लिया।
तीसरा दांव यमन में चला था प्रिंस ने कि हूतियों के खिलाफ लंबे समय से चल रही लड़ाई से उनका दक्षिणी बॉर्डर सुरक्षित रहेगा लेकिन सऊदी अरब के ट्रंप के साथ होने से ईरान ने हूती लड़ाकों को मदद और बढ़ा दी। जो बैलेंस एमबीएस बनाने की कोशिश कर रहे थे कि एक तरफ अमेरिका के साथ खड़े रहना और दूसरी तरफ ईरान के साथ शांति बनाए रखना, जब मुख्य लड़ाई छिड़ी तो ये संतुलन टूट गया। अमेरका से हथियार ख़रीदने का दांव भी फ़ेल हो गया। बताया जा रहा है जो सैकड़ों करोड़ों खर्च करके पेट्रियट जैसे एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे अमेरिका से, वो काम नहीं आ पा रहे। ट्रंप अपने चुनावों में बिज़ी हैं। वो इस वक़्त सिर्फ़ ज़बानी मदद पहुंचा रहे हैं
जानकारों की माने तो मोहम्मद बिन सलमान का रक्षा समझौता था तुर्की और पाकिस्तान के साथ लेकिन वो भी काम नहीं आ रहा। पाकिस्तान और तुर्की दोनों सीधे लड़ाई में नहीं उतर रहे। कहने को तो पाकिस्तान समझौते को इस्लामिक नाटो बोल रहा था लेकिन जब लड़ने की बारी आई तो दोनों अपने हित देख रहे हैं। तुर्की ने साफ कह दिया है कि वो आक्रामक लड़ाई में नहीं उतरेगा। उसके विदेश मंत्री ने कह दिया कि तुर्की किसी दूसरे देश की जमीन पर जाकर हमला करने के लिए फौज नहीं भेजेगा। समझौता रक्षा के लिए है, हमले के लिए नहीं। वो एयर डिफेंस, तकनीकी मदद, ड्रोन या निगरानी जैसी चीजें दे सकता है लेकिन यमन में हूती लड़ाकों के खिलाफ सीधे लड़ने नहीं जाएगा। तुर्की को संसद की मंजूरी चाहिए बड़ी फौज भेजने के लिए और वो ईरान से पूरी तरह उलझना नहीं चाहता। लाल सागर में उसके अपने हित भी हैं और वो कूटनीति पर ज्यादा भरोसा करने की बात कर रहा है। इसलिए अभी तक उसकी मदद सिमटी हुई है।
जानकारों के अनुसार पाकिस्तान की स्थिति थोड़ी अलग बताई जा रही है। उसके तो पुराने समझौतों के तहत पहले से सऊदी अरब में हजारों सैनिक हैं लेकिन वो सिर्फ़ एयर डिफेंस और समर्थन वाली भूमिका निभा रहा है। उसके रक्षा मंत्री ने कहा है कि लड़ाई मुख्य रूप से सऊदी अरब की फौज कर रही हैं, पाकिस्तान सहयोग दे रहा है लेकिन वो भी पूरी ताकत से यमन में जमीन पर नहीं उतर रहा। वजह साफ है कि पाकिस्तान ईरान का पड़ोसी है और उसके साथ उसके संबंध हैं। वो हूती लड़ाकों के खिलाफ पूरी खुली लड़ाई में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि इससे ईरान से तनाव बढ़ सकता है। वो भी रक्षा में मदद कर रहा है लेकिन आक्रामक अभियान से बच रहा है। यानी सऊदी अरब के सुख के तो सब साथी थे लेकिन संकट में मोहम्मद बिन सलमान अकेले खड़े दिख रहे हैं।