-सुनील कुमार महला।
स्वतंत्रता का संघर्ष केवल देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए ही नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समानता और अधिकारों की रक्षा के लिए भी था। इस संघर्ष में अनेक क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इन्हीं महान क्रांतिकारियों में अमर शहीद जतिन दास का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। देश की आजादी और राजनीतिक बंदियों के सम्मान के लिए उनका 63 दिनों का ऐतिहासिक अनशन तथा अदम्य राष्ट्रप्रेम सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा।
जतीन्द्र नाथ दास, जिन्हें जतिन दास के नाम से जाना जाता है, का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देशप्रेम, स्वाभिमान और अन्याय के प्रति विरोध की भावना थी। बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया था। बाद में वे भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों से प्रभावित हुए तथा देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के उद्देश्य से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। जतिन दास अनुशीलन समिति और भगत सिंह के संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) से जुड़े एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी थे। वे बम बनाने की कला में कुशल थे। भगत सिंह के आग्रह पर उन्होंने आगरा में क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने का काम किया। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में जो बम फेंके थे, उन्हें तैयार करने में भी जतिन दास की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यहां पाठकों को बताता चलूं कि जतिन दास का संघर्ष केवल अंग्रेजों से देश को आजाद कराने तक सीमित नहीं था। वे जेल में बंद भारतीय राजनीतिक कैदियों के सम्मान और अधिकारों के लिए भी आवाज उठा रहे थे। वर्ष 1925 में राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार करके मैमनसिंह जेल भेजा गया था, जो अब बांग्लादेश में है। वहां उन्होंने राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विरोध में 20 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन को उनकी मांगों पर ध्यान देना पड़ा था।
भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी गतिविधियों के बाद अंग्रेजी सरकार ने कई अन्य क्रांतिकारियों पर भी कार्रवाई की। 14 जून 1929 को जतिन दास को लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार करके लाहौर सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। उस समय भारतीय कैदियों के साथ भेदभाव किया जाता था। उन्हें घटिया भोजन दिया जाता, साफ-सफाई की उचित व्यवस्था नहीं मिलती और पढ़ने-लिखने के लिए पुस्तकें तथा समाचारपत्र जैसी सुविधाओं से भी वंचित रखा जाता था। इसके विपरीत, यूरोपीय कैदियों को बेहतर सुविधाएं दी जाती थीं। भारतीय राजनीतिक बंदियों के साथ होने वाला यह व्यवहार अन्यायपूर्ण और अमानवीय था,जिसका जतिन दास ने विरोध किया।वास्तव में, जेल में भारतीय राजनीतिक बंदियों के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में जतिन दास ने 13 जुलाई 1929 को भूख हड़ताल शुरू की। भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी भी इस संघर्ष में शामिल थे। उनकी मांग थी कि राजनीतिक बंदियों को सम्मानजनक व्यवहार और उचित सुविधाएं दी जाएं। वे चाहते थे कि कैदियों को पौष्टिक भोजन, साफ कपड़े, स्वच्छ वातावरण, पुस्तकें और समाचारपत्र उपलब्ध कराए जाएं। उनकी मांगों का उद्देश्य व्यक्तिगत सुख-सुविधाएं प्राप्त करना नहीं था, बल्कि जेल में बंद सभी राजनीतिक कैदियों को सम्मानजनक जीवन और समान अधिकार दिलाना था। यह अनशन अंग्रेजी शासन की भेदभावपूर्ण नीतियों के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण, लेकिन दृढ़ विरोध था। जतिन दास जानते थे कि लंबे समय तक भोजन त्यागने से उनके जीवन को खतरा हो सकता है, फिर भी वे अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे। उनके लिए व्यक्तिगत जीवन से अधिक महत्वपूर्ण देश का सम्मान और राजनीतिक बंदियों के अधिकार थे।
अनशन के दौरान अंग्रेजी प्रशासन ने जतिन दास का अनशन समाप्त कराने के लिए कई प्रयास किए। उन्हें जबरन भोजन और दूध पिलाने के लिए नाक के रास्ते नली डालने की कोशिश की गई। इस प्रक्रिया के दौरान दूध उनके फेफड़ों में चला गया, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई। लगातार भोजन न मिलने और जबरन भोजन कराने के प्रयासों के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया। उनका शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनका संकल्प नहीं डगमगाया। जेल की चारदीवारी के भीतर शुरू हुआ यह संघर्ष धीरे-धीरे पूरे देश का मुद्दा बन गया। जतिन दास का अनशन केवल जेल में बंद क्रांतिकारियों के अधिकारों का प्रश्न नहीं रह गया था, बल्कि यह भारतीयों के आत्मसम्मान, समानता और अंग्रेजी शासन की अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था। लगातार 63 दिनों तक भूख हड़ताल करने के बाद 13 सितंबर 1929 को जतिन दास ने अंतिम सांस ली। उस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष थी। उन्होंने राजनीतिक बंदियों के सम्मान और अधिकारों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनकी शहादत का समाचार फैलते ही पूरे देश में शोक और आक्रोश की लहर दौड़ गई। स्वतंत्रता सेनानियों, राजनीतिक नेताओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों ने उनके बलिदान को श्रद्धापूर्वक याद किया। उनकी मृत्यु ने अंग्रेजी शासन की जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए और स्वतंत्रता आंदोलन को नई नैतिक शक्ति प्रदान की।
जतिन दास का पार्थिव शरीर उनके भाई किरण चंद्र दास को सौंपा गया। उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया। बहुत कम लोग जानते होंगे कि लाहौर में उनकी अंतिम यात्रा का नेतृत्व प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी दुर्गावती देवी, जिन्हें दुर्गा भाभी के नाम से जाना जाता है, ने किया था। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोगों के शामिल होने का उल्लेख मिलता है। यह जनसमर्थन उनके बलिदान के प्रति देशवासियों के सम्मान और अंग्रेजी शासन के प्रति उनके आक्रोश का प्रमाण था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जतिन दास के सर्वोच्च बलिदान की तुलना पौराणिक काल के महर्षि दधीचि से की थी। महर्षि दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान किया था। इसी प्रकार जतिन दास ने एक महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। जतिन दास की शहादत का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदेशों में भी उनके बलिदान को सम्मान मिला। यहां पाठकों को बताता चलूं कि आयरलैंड के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी टेरेंस मैकस्विनी ने ब्रिटिश शासन के विरोध में भूख हड़ताल की थी और 74 दिनों के अनशन के बाद उनका निधन हुआ था। जतिन दास की शहादत पर मैकस्विनी के परिवार की ओर से आयरलैंड से भारत शोक संदेश भेजे जाने का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार जतिन दास का बलिदान दुनिया भर में स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वालों के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गया।
जतिन दास का जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका संघर्ष हमें सिखाता है कि अन्याय के सामने चुप रहना उचित नहीं है। अपने अधिकारों की रक्षा करने के साथ-साथ दूसरों की गरिमा और सम्मान की रक्षा करना भी हमारा कर्तव्य है। सच्चा राष्ट्रप्रेम केवल नारों और भाषणों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह त्याग, साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा में दिखाई देता है। आजादी के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ियों को यह समझना चाहिए कि स्वतंत्रता हमें आसानी से प्राप्त नहीं हुई। इसके लिए अनगिनत देशभक्तों ने यातनाएं सहीं, अपने परिवारों से दूर रहे और अपने प्राणों तक का बलिदान दिया। जतिन दास की शहादत हमें लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता और मानवीय अधिकारों का सम्मान करने की प्रेरणा देती है।
निष्कर्षतः, अमर शहीद जतिन दास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने मात्र 24 वर्ष की आयु में अपने अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और आत्मसम्मान से इतिहास में अमिट स्थान बना लिया। लाहौर जेल में 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद दिया गया उनका बलिदान अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और मानवीय गरिमा की रक्षा का प्रतीक है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि महान उद्देश्य के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। शरीर नश्वर है, लेकिन देश, समाज और मानवता के लिए किया गया बलिदान पीढ़ियों तक लोगों के हृदय में जीवित रहता है। जतिन दास का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता रहेगा। अमर शहीद जतिन दास को शत-शत नमन!