राजनीति

आखिर कब तक चलता रहेगा जान लेने का सिलसिला?  दोषी हर बार सुरक्षित क्यों?

मलबे में दबते सपने और बिके  हुए सुरक्षा मानक 

डॉ घनश्याम बादल

दिल्ली में या कहीं भी जब कोई इमारत गिरती है तो कुछ घंटे के लिए लोगों की सांस थम जाती है। कैमरे मलबे पर टिक जाते हैं, राहतकर्मी ईंट-पत्थरों के बीच ज़िंदगी तलाशते हैं, नेता घटनास्थल पर पहुंचते हैं और प्रशासन सक्रिय दिखाई देने लगता है। फिर बयान आते हैं—’जांच होगी’, ‘दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा’, ‘मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा’। सवाल मगर वहीं खड़ा रहता है—जिस इमारत को गिरने से पहले बचाया जा सकता था, उसे गिरने ही क्यों दिया गया?

  दिल्ली में ढही इमारत कोई अकेली घटना नहीं है। राजधानी और देश के दूसरे शहरों में इमारतों के ढहने, आग लगने और अवैध निर्माण से होने वाली दुर्घटनाएं बार-बार बता रही हैं कि समस्या ईंट-पत्थर की नहीं, व्यवस्था की है। पुराना राजेंद्र नगर हो, जहां बेसमेंट में पानी भरने से तीन प्रतियोगी परीक्षार्थियों की जान गई थी, या राजकोट का गेम जोन, जहां आग ने कई परिवारों को उजाड़ दिया- हर घटना के बाद एक ही तस्वीर उभरती है: नियम मौजूद थे, जिम्मेदार विभाग मौजूद थे लेकिन जिम्मेदारी गायब थी। आखिर ऐसा क्यों है?

इमारतें अचानक नहीं गिरतीं। उनके गिरने की पटकथा महीनों और कई बार वर्षों में लिखी जाती है। कहीं नक्शे से खिलवाड़ होता है, कहीं मंजिलें बढ़ाई जाती हैं, कहीं घटिया सामग्री इस्तेमाल होती है, कहीं बेसमेंट का उपयोग बदल दिया जाता है। शिकायतें भी होती हैं। निरीक्षण भी होते हैं। कागज भी चलते हैं। फिर भी अवैध निर्माण खड़ा रहता है।

क्या हमारी व्यवस्था की आंखें तभी खुलती हैं जब मलबे में से कोई शव निकलता है? यही सवाल प्रशासन से है और उससे भी ज्यादा उस भ्रष्ट तंत्र से, जिसमें नियम कानून की किताब में रहते हैं और उनका उल्लंघन बाजार में खुलेआम चलता है। हर अवैध निर्माण के पीछे रिश्वत हो, यह बिना जांच के नहीं कहा जा सकता, लेकिन लगातार अनदेखी और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई न होना संदेह जरूर पैदा करता है। आखिर किसी अधिकारी की कलम से निकला एक प्रमाणपत्र इतना शक्तिशाली कैसे हो जाता है कि वह भवन की वास्तविक कमजोरियों को ढक देता है? और फिर आते हैं हमारे नेता।

हादसा हुआ नहीं कि संवेदना का बाजार सज गया। ट्वीट, बयान, दौरे, मुआवजे और जांच के आदेश। मगर जनता पूछती है – जांच हादसे के बाद ही क्यों?

क्या किसी नेता या अधिकारी को यह पता नहीं होता कि उसके क्षेत्र में कितने भवन अवैध हैं? कितने बेसमेंट में कोचिंग चल रही है? कितने पीजी में क्षमता से दोगुने-तीन गुने विद्यार्थी रह रहे हैं? कितनी इमारतों में अग्नि निकास केवल कागज पर है? यदि पता है तो कार्रवाई क्यों नहीं?  

यदि पता नहीं है तो फिर प्रशासन कर क्या रहा है? इस सवाल का एक दूसरा पहलू भी है जिसे अक्सर हादसे की सनसनी में भुला दिया जाता है- वे बच्चे और युवा, जो इन असुरक्षित इमारतों में रहने को मजबूर हैं।

गांव का किसान अपने बेटे को दिल्ली भेजता है। छोटा दुकानदार अपनी बेटी को प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए शहर भेजता है। परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करता है, क्योंकि उसे उम्मीद है कि पढ़ाई से अगली पीढ़ी की जिंदगी बदल जाएगी।

लेकिन शहर में पहुंचते ही यह सपना एक महंगे बाजार में प्रवेश कर जाता है। कोचिंग की फीस अलग, पीजी का किराया अलग, भोजन अलग, बिजली अलग, इंटरनेट अलग और लाइब्रेरी की फीस अलग। सुरक्षित आवास महंगा है तो विद्यार्थी सस्ता पीजी चुनता है। कमरे में चार की जगह आठ रह जाते हैं। पार्किंग के लिए बना बेसमेंट लाइब्रेरी बन जाता है। आवासीय भवन में कोचिंग शुरू हो जाती है।

विद्यार्थी को ज्ञान देने के नाम पर करोड़ों का कारोबार करने वालों के लिए उसकी सुरक्षा की कीमत इतनी कम क्यों है?

राजेंद्र नगर की घटना के बाद बेसमेंट में चल रहे कोचिंग और लाइब्रेरी परिसरों पर कार्रवाई हुई। कई संस्थान सील किए गए, नोटिस दिए गए और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की गई मगर सवाल फिर वही है—अगर नियम पहले से थे तो उन्हें लागू करने के लिए तीन जिंदगियों की बलि क्यों चाहिए थी?

    हमारी सबसे बड़ी विडंबना है। हम हादसों के बाद जागते हैं और कुछ समय बाद फिर सो जाते हैं। राजकोट की आग ने भी यही बताया। अग्नि सुरक्षा, निकास और निर्माण संबंधी नियमों की अनदेखी कितनी महंगी पड़ सकती है, देश ने देखा। लेकिन क्या हमने यह सुनिश्चित किया कि अगली दुर्घटना न हो?

हम हर बार मृतकों की गिनती करते हैं, दोषियों की नहीं; और दोषियों की पहचान भी हो जाए तो उस व्यवस्था की पहचान नहीं करते जिसने उन्हें ऐसा करने दिया।

अब समय है कि पीजी, छात्रावास, कोचिंग और लाइब्रेरी को केवल कारोबार की श्रेणी में न देखा जाए। जहां सैकड़ों युवा रहते या पढ़ते हैं, वहां सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। भवन की संरचनात्मक मजबूती, अग्नि सुरक्षा, विद्युत व्यवस्था, आपात निकास, क्षमता और बेसमेंट के उपयोग की नियमित स्वतंत्र जांच हो। जांच करने वाले अधिकारी की भी जवाबदेही तय हो और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। सबसे बढ़कर, विद्यार्थी को शिकायत करने का सुरक्षित और आसान अधिकार मिले। उसे यह डर न हो कि शिकायत की तो कमरा खाली करना पड़ेगा या कोचिंग से निकाल दिया जाएगा।

 बात केवल इमारतों की नहीं है। बात उस भरोसे की है जिसके सहारे गांव का एक पिता अपना बच्चा महानगर भेजता है।

मलबे से शव निकाल लेना राहत कार्य है। मलबा बनने से पहले इमारत को रोक देना शासन है।

मुआवजा देना संवेदना है। हादसा न होने देना ज़िम्मेदारी है।

इसलिए दिल्ली की आज की घटना पर केवल शोक मत कीजिए। सवाल पूछिए—किसने बनाया, किसने अनुमति दी, किसने जांच की, किसने अनदेखा किया और किसने लाभ उठाया? इमारत के गिरने की आवाज कुछ सेकंड की होती है, लेकिन उसके नीचे दबे परिवारों का दुख पूरी जिंदगी चलता है और याद रखिए, इमारतें अचानक नहीं गिरतीं। पहले नियम गिरते हैं, फिर ईमानदारी, फिर जवाबदेही और अंत में छत।

डॉ. घनश्याम बादल